निकोबार बंदरगाह का कोई ‘सामरिक लक्ष्य’ नहीं, 2024 में वित्त मंत्रालय की संस्था ने कहा था
ग्रेट निकोबार द्वीप के गैलाथिया खाड़ी में प्रस्तावित ₹81,000 करोड़ की 'अंतर्राष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट पोर्ट' (आईसीटीपी) परियोजना के 'सामरिक उद्देश्य' को लेकर सरकार की दो प्रमुख संस्थाओं में गंभीर विरोधाभास सामने आया है. अगस्त 2024 में वित्त मंत्रालय के 'पब्लिक इन्वेस्टमेंट बोर्ड' (पीआईबी) ने इस परियोजना को "सामरिक उद्देश्यों से रहित" बताया था और संबंधित मंत्रालय को इसमें सामरिक दृष्टिकोण जोड़ने की सलाह दी थी. हालांकि, ठीक एक साल बाद रक्षा मंत्रालय ने इसे औपचारिक रूप से "सामरिक परियोजना" घोषित कर दिया.
‘द हिंदू’ में जैकब कोशी की रिपोर्ट है कि वित्त मंत्रालय की एक संस्था, पीआईबी—जो बड़े सार्वजनिक निवेशों का मूल्यांकन करती है—ने अगस्त 2024 में आईसीटीपी को "सामरिक उद्देश्यों" से रहित बताया था. अगस्त की उस बैठक में, इसने पत्तन, पोत परिवहन और जलमार्ग मंत्रालय (एमओपीएसडब्ल्यू) को अपने प्रस्ताव में एक सामरिक दृष्टिकोण शामिल करने की सलाह दी थी.
मार्च 2026 की एक बैठक के रिकॉर्ड के अनुसार, इसके एक साल से कुछ अधिक समय बाद, इसी परियोजना को रक्षा मंत्रालय द्वारा औपचारिक रूप से एक "सामरिक परियोजना" के रूप में अधिसूचित किया गया था. ₹81,000 करोड़ की प्रस्तावित ग्रेट निकोबार परियोजना का "सामरिक" होना ही केंद्र सरकार का एक बहाना रहा है, जिसके तहत वह कम से कम 2022 से इस परियोजना के संचयी पर्यावरणीय प्रभाव पर एक उच्च अधिकार प्राप्त समिति (एचपीसी) की रिपोर्ट की सामग्री को सार्वजनिक करने से बचती रही है. इस परियोजना में आईसीटीपी के अलावा एक टाउनशिप, हवाई अड्डा, गैस आधारित बिजली संयंत्र और एक पर्यटन क्षेत्र शामिल है. सरकार ने इसी आधार पर परियोजना को मिली पर्यावरणीय मंजूरियों से जुड़ी सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत मांगी गई याचिकाओं को भी खारिज कर दिया है.
पीपीपीएसी की बैठक में सामने आई बात
पीआईबी का यह रुख वित्त मंत्रालय की ही एक अन्य संस्था—'पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप अप्रेजल कमेटी' (पीपीपीएसी)—द्वारा 17 और 19 मार्च 2026 को आयोजित बैठकों के रिकॉर्ड में सामने आया है. इस कमेटी का काम निजी हितधारकों की भागीदारी वाली ₹500 करोड़ और उससे अधिक मूल्य की परियोजना प्रस्तावों की जांच करना है.
यह प्रस्ताव पत्तन, पोत परिवहन और जलमार्ग मंत्रालय द्वारा प्रायोजित किया गया था, जिसमें चेन्नई का कामराजार पोर्ट लिमिटेड (केपीएल) इसकी कार्यान्वयन एजेंसी है. इस प्रस्ताव के जरिए दो चरणों में बंदरगाह के निर्माण के लिए पीपीपीएसी की मंजूरी मांगी गई थी. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस व्यावसायिक रूप से कमजोर परियोजना को बैंक-योग्य (वित्तीय रूप से व्यावहारिक) बनाने के लिए वायबिलिटी गैप फंडिंग (वीजीएफ) के रूप में ₹12,230 करोड़ की मंजूरी मांगी गई थी.
पीपीपीएसी ने प्रस्ताव को "सर्वसम्मति" से मंज़ूरी दे दी, लेकिन उसने वीजीएफ देने से इनकार कर दिया और इसके बजाय सिफारिश की कि पत्तन, पोत परिवहन और जलमार्ग मंत्रालय इसके लिए अपने आंतरिक बजट का उपयोग करे.
इस सप्ताह की शुरुआत में, कांग्रेस सांसद जयराम रमेश ने पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव को पत्र लिखकर कहा था कि: "...ग्रेट निकोबार द्वीप परियोजना पर सरकार का रुख अचानक बदल गया है... इसके अत्यधिक प्रतिकूल पारिस्थितिक (पर्यावरणीय) प्रभावों के अकाट्य प्रमाणों का सामना करने के बाद, केंद्र सरकार अब इसके तथाकथित सामरिक औचित्य पर ज़ोर दे रही है." उन्होंने आगे कहा कि "...वर्तमान में जिस रूप में परिकल्पना की गई है, उसके अनुसार ग्रेट निकोबार द्वीप परियोजना मुख्य रूप से एक व्यावसायिक उद्यम है."
परियोजना द्वारा उत्पन्न पर्यावरणीय खतरों का व्यापक दस्तावेज़ीकरण करने वाले शोधकर्ता और लेखक पंकज सेकसरिया ने बताया: "नवंबर 2022 में मिली पर्यावरणीय मंज़ूरी तक, सरकार द्वारा इसके सामरिक परियोजना होने का कोई वास्तविक संदर्भ नहीं दिया गया था... और तब भी यह केवल हवाई अड्डे (नागरिक और सैन्य उपयोग वाले) के संदर्भ में था."
यह आईसीटीपी बहुत बड़ी ग्रेट निकोबार द्वीप विकास परियोजना का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है और यह गृह मंत्रालय की एक पहल है. इसमें 'अंडमान और निकोबार द्वीप समूह एकीकृत विकास निगम लिमिटेड' समग्र परियोजना का प्रस्तावक और पर्यावरणीय मंज़ूरी का धारक है.
2021 के दस्तावेज़, जिनमें ग्रेट निकोबार कार्यक्रम की परिकल्पना की गई थी, और बंदरगाह के लिए जनवरी 2023 की 'अभिरुचि की अभिव्यक्ति' में इसे कोलंबो, सिंगापुर और पोर्ट क्लैंग के माध्यम से वर्तमान में जाने वाले ट्रांसशिपमेंट कार्गो को आकर्षित करने के एक साधन के रूप में वर्णित किया गया था. सरकार ने इससे लगभग 200 मिलियन डॉलर की वार्षिक विदेशी मुद्रा बचत का अनुमान लगाया था, जो संचयी रूप से 2047 तक लगभग 1 बिलियन डॉलर तक पहुंच जाएगी.
पिछले एक साल या उससे अधिक समय में, इस परियोजना को समुद्री सुरक्षा के नज़रिए से पेश किया जा रहा है—जिसके केंद्र में चीन से खतरा है. ग्रेट निकोबार मलक्का जलडमरूमध्य के पास स्थित है, जहाँ से चीन का अधिकांश ऊर्जा आयात गुज़रता है. बीजिंग (चीन) की इस कमज़ोरी को "मलक्का दुविधा" कहा जाता है. इसलिए, इस परियोजना को हिंद महासागर में चीनी नौसेना के विस्तार के प्रतिकार के रूप में पेश किया गया है.
होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर अमेरिका-इरान टकराव और जलमार्गों पर सैन्य प्रभुत्व के नए खतरों ने इस तर्क को और हवा दी है. हालांकि, एकीकृत अंडमान और निकोबार कमान के पूर्व चीफ ऑफ स्टाफ, रियर एडमिरल सुधीर पिल्लई ने बिना समुद्री सिद्धांत के वहां बनाए गए बुनियादी ढांचे को "बिना सिद्धांत का एक मंच" कहा है. वहीं, पूर्व नौसेना प्रमुख एडमिरल अरुण प्रकाश ने तर्क दिया है कि परियोजना से होने वाले पारिस्थितिक नुकसान के बिना भी मौजूदा सैन्य उपस्थिति को मजबूत किया जा सकता है.
पीपीपीएसी के रिकॉर्ड यह भी दिखाते हैं कि अंतिम मंज़ूरी मिलने के बावजूद, बैठक में शामिल वित्त मंत्रालय, नीति आयोग और सरकार की कई शाखाओं के प्रतिनिधियों ने मंज़ूरी देने से पहले यह सवाल उठाया था कि इस परियोजना के लिए भुगतान कैसे किया जाएगा. अंग्रेजी में जैकब कोशी की इस विस्तृत रिपोर्ट को यहां पढ़ सकते हैं.

