‘गंगा नदी में चिकन खाने पर कोई कानूनी रोक नहीं’: सुप्रीम कोर्ट के जज ने नाव पर बिरयानी खाने पर गिरफ्तारी की आलोचना की

सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस उज्ज्वल भुयान ने कहा है कि गंगा नदी के ऊपर चिकन खाने से किसी को रोकने वाला कोई कानून नहीं है. उन्होंने कुछ महीने पहले उत्तर प्रदेश में नाव की सवारी के दौरान इफ्तार में चिकन बिरयानी खाने को लेकर मुस्लिम छात्रों की गिरफ्तारी की कड़ी आलोचना की.

‘एचटी न्यूज़ डेस्क’ के अनुसार, भोपाल स्थित नेशनल लॉ इंस्टीट्यूट यूनिवर्सिटी (एनएलआईयू) में जस्टिस जी.पी. सिंह के चौथे स्मृति व्याख्यान में बोलते हुए जस्टिस भुयान ने इस बात पर जोर दिया कि उन युवाओं को एक ऐसे काम के लिए तीन महीने जेल में बिताने पड़े, जो कोई अपराध ही नहीं है.

उन्होंने कहा, “मुझे पूरा यकीन है कि चिकन बिरयानी खाना कोई अपराध नहीं है. यह अपराध हो भी नहीं सकता… उन्हें केवल इसी वजह से गिरफ्तार किया गया, और उन्हें तीन महीने तक जेल में रहना पड़ा.”

वाराणसी पुलिस ने मार्च में 14 मुस्लिम युवकों को धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने, दुश्मनी को बढ़ावा देने, सार्वजनिक उपद्रव पैदा करने और जल प्रदूषण नियंत्रण अधिनियम के उल्लंघन के आरोप में भारतीय न्याय संहिता की धारा 298 और 299 के तहत गिरफ्तार किया था.  शिकायतकर्ताओं का आरोप था कि युवक चिकन बिरयानी खा रहे थे और मांस की हड्डियों तथा बचे हुए भोजन को सीधे पवित्र नदी में फेंक रहे थे, जो सनातन धर्म में गहरी आध्यात्मिक आस्था का केंद्र है.

शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन लोकतंत्र का मूल आधार

शीर्ष अदालत के न्यायाधीश ने यह भी कहा कि शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन लोकतंत्र का मूल आधार (केंद्र) है, लेकिन असंतोष की सामान्य गतिविधियों को भी अब तेजी से आपराधिक आचरण माना जा रहा है.

उन्होंने आगे कहा, “अपने विचार व्यक्त करने और शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने का अधिकार नागरिकों की मौलिक स्वतंत्रता है. बहस और असहमति ही लोकतंत्र का सार हैं. दुर्भाग्य से, सामान्य गतिविधियों का भी अपराधीकरण किया जा रहा है.”

जस्टिस भुयान ने ध्यान दिलाया कि पर्यावरण के प्रति चिंता जताने वाले लोगों के साथ अपराधियों जैसा व्यवहार किया जाता है, और छात्रों को परिसर में विरोध प्रदर्शन करने के लिए एक महीने से अधिक समय जेल में बिताना पड़ता है.

न्यायाधीश ने कहा, “जो लोग पर्यावरण के क्षरण पर अपनी पीड़ा व्यक्त करने आते हैं — जो कि एक कड़वी सच्चाई है — उन्हें ऐसे खदेड़ा जाता है जैसे वे अपराधी हों. परिसरों में विरोध प्रदर्शन करने वाले छात्रों को गिरफ्तार कर लिया जाता है, और उन्हें 30-40 दिनों तक जमानत नहीं मिलती.” उन्होंने आगे कहा कि छात्रों को अक्सर निलंबित भी कर दिया जाता है, जिससे उन्हें अपनी पढ़ाई दोबारा शुरू करने के लिए अदालतों का रुख करने पर मजबूर होना पड़ता है.

क्या अदालतें असहमति को हतोत्साहित कर रही हैं?

जस्टिस भुयान ने सवाल उठाया कि क्या अदालतें भी जमानत की सख्त शर्तों के जरिए असहमति (विरोध) को हतोत्साहित कर रही हैं.

उन्होंने कहा, “हालांकि अदालतें संवेदनशील हैं और जमानत देती भी हैं, लेकिन कई बार इसमें बहुत देरी हो जाती है. लेकिन सबसे बड़ी चिंता की बात वे सख्त शर्तें हैं जो जमानत देते समय थोपी जाती हैं. ऐसे प्रतिबंधात्मक आदेशों के जरिए क्या अदालतें अप्रत्यक्ष रूप से नागरिकों से यह कह रही हैं या उन्हें हतोत्साहित कर रही हैं कि वे अपना विरोध दर्ज न कराएं?”

दंडात्मक "बुलडोजर न्याय" के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट के 2024 के फैसले का हवाला देते हुए जस्टिस भुयान ने कहा कि यह फैसला स्वागत योग्य था, लेकिन यह "दो साल बहुत देर से" आया. उन्होंने उन मामलों का भी जिक्र किया जिनमें जमानत पाए अभियुक्तों को जनसभाओं में शामिल होने या सोशल मीडिया पर पोस्ट करने से रोक दिया गया था. उन्होंने कहा कि ऐसी शर्तें "उनकी मौलिक स्वतंत्रताओं और नागरिक अधिकारों को गंभीर रूप से कमजोर करती हैं."

उन्होंने फ़िलिस्तीन के समर्थन में प्रदर्शन की अनुमति देने से इनकार करने वाले बॉम्बे हाई कोर्ट के रुख की भी आलोचना की और कहा कि उन्हें अदालत की टिप्पणियां "बेहद हास्यास्पद" लगीं. उन्होंने याद दिलाया कि याचिकाकर्ताओं से पूछा गया था कि वे भारत के भीतर के मुद्दों के बजाय गाजा की घटनाओं पर विरोध प्रदर्शन क्यों करना चाहते हैं, जबकि भारत ने पारंपरिक रूप से फ़िलिस्तीन को मान्यता दी है और वहां फ़िलिस्तीनी दूतावास भी मौजूद है.

Previous
Previous

समझौते का पूरी तरह उल्लंघन, यदि अमल नहीं तो हम फिर बैठने को मजबूर होंगे : सीजेपी

Next
Next

यह प्रधान के इस्तीफे से शुरू हुआ है और प्रधानमंत्री के इस्तीफे पर ही खत्म होगा