कॉरपोरेट जिहाद" का नैरेटिव: नासिक टीसीएस मामले की सच्चाई और और पुलिसिया कार्रवाई पर सवाल
‘आर्टिकल 14’ की रिपोर्ट के अनुसार, हाल के वर्षों में भारत में 'जिहाद' शब्द का प्रयोग किसी भी सामाजिक या व्यक्तिगत मुद्दे को सांप्रदायिक रंग देने के लिए एक हथियार की तरह किया जाने लगा है. महाराष्ट्र के नासिक में स्थित भारत की सबसे बड़ी सॉफ्टवेयर कंपनी, टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (टीसीएस) की एक शाखा में हुई घटना इसका सबसे ताज़ा और चिंताजनक उदाहरण है. यह मामला दिखाता है कि कैसे एक व्यक्तिगत विवाद और पुलिस की गुप्त कार्रवाई ने मिलकर 'इस्लामोफोबिया' का एक नया रूप गढ़ा, जिसे मुख्यमंत्री द्वारा "कॉरपोरेट जिहाद" का नाम दिया गया.
इस पूरे विवाद की जड़ें किसी कानूनी शिकायत में नहीं, बल्कि एक राजनैतिक कार्यकर्ता की 'सूचना' में छिपी थीं. फरवरी 2026 में, एक राजनैतिक दल के कार्यकर्ता ने नासिक पुलिस को बताया कि टीसीएस की एक हिंदू महिला कर्मचारी रमजान के रोजे रख रही है. एक नागरिक की निजी धार्मिक पसंद पर पुलिस की प्रतिक्रिया चौंकाने वाली थी. पुलिस ने बिना किसी प्रारंभिक जांच के कार्यालय के भीतर महिला अधिकारियों को भेष बदलकर तैनात कर दिया.
यह एक राज्य-प्रायोजित 'स्टिंग ऑपरेशन' था, जिसका उद्देश्य कर्मचारियों को मुस्लिम सहकर्मियों के खिलाफ बोलने के लिए उकसाना था. हालांकि बाद में आठ महिलाओं ने यौन उत्पीड़न की शिकायत दर्ज कराई, जो निश्चित रूप से गंभीर जांच का विषय है, लेकिन जिस तरह से इस मामले को धार्मिक धर्मांतरण की अंतरराष्ट्रीय साजिश के रूप में पेश किया गया, उसने न्याय की मूल भावना को ही पीछे छोड़ दिया.
जैसे ही पुलिस ने कार्रवाई शुरू की, मुख्यधारा के मीडिया ने इसे हाथों-हाथ लिया. बिना किसी ठोस सबूत के, "विदेशी फंडिंग", "अंतरराष्ट्रीय तस्करी" और "जबरन बीफ खिलाने" जैसे सनसनीखेज दावे किए जाने लगे. इस पूरी कहानी का केंद्र एक मुस्लिम महिला कर्मचारी को बनाया गया, जिसके पास न तो कोई एचआर अधिकार थे और न ही कोई संस्थागत शक्ति. उसे एक "धर्मांतरण रैकेट" का मास्टरमाइंड घोषित कर दिया गया.
दिलचस्प बात यह है कि एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट्स की एक तथ्य-खोज रिपोर्ट में यह स्पष्ट हुआ कि इतनी बड़ी 'साजिश' के बावजूद एक भी व्यक्ति का धर्मांतरण नहीं हुआ था. फिर भी, राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी और एटीएस जैसी संस्थाओं को एक कार्यस्थल विवाद में शामिल कर लिया गया.
17 अप्रैल 2026 को महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने "कॉरपोरेट जिहाद" शब्द का प्रयोग किया. यह उस 'टेम्पलेट' का हिस्सा है जहाँ लव जिहाद, लैंड जिहाद और अब कॉरपोरेट जिहाद के जरिए सामान्य मानवीय व्यवहारों चाहे वह प्रेम हो, व्यापार हो या नौकरी को संगठित धार्मिक आक्रामकता के रूप में दिखाया जाता है.
नासिक मामले में प्राथमिकी के विश्लेषण से पता चलता है कि कई शिकायतों में भाषा बिल्कुल एक जैसी (शब्द-दर-शब्द) थी, जो उनकी निष्पक्षता पर सवाल उठाती है. साथ ही, जिस रिश्ते को 'लव जिहाद' बताया गया, वह कॉलेज के दिनों से था जहाँ दोनों एक-दूसरे की धार्मिक पहचान जानते थे. यहाँ पहचान छिपाने या धोखा देने जैसी कोई बात नहीं थी, जो इस नैरेटिव की बुनियाद को ही ढहा देती है.
इस तरह के मामलों का सबसे बुरा प्रभाव समाज के ताने-बाने पर पड़ता है. इस घटना के बाद नासिक, पुणे और मुंबई जैसे शहरों में मुस्लिम पेशेवरों ने कार्यस्थल पर बढ़ती शत्रुता और भेदभाव की शिकायत की है. विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में कंपनियां विवादों से बचने के लिए एक विशेष समुदाय के युवाओं को नौकरी देने से हिचकिचा सकती हैं, जो आर्थिक असमानता को और गहरा करेगा.
इसके अतिरिक्त, यह महिलाओं की अपनी पसंद और स्वायत्तता पर भी हमला है. किसी महिला का उपवास रखना या किसी के साथ मित्रता करना अब राज्य की निगरानी का हिस्सा बन गया है.
कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न या किसी भी प्रकार का अपमानजनक व्यवहार कानूनन अपराध है और दोषियों को सख्त सजा मिलनी चाहिए. लेकिन जब पुलिस और मीडिया किसी व्यक्तिगत अपराध को "सभ्यता के खतरे" के रूप में पेश करने लगते हैं, तो न्याय की प्रक्रिया राजनीति की दासी बन जाती है. नासिक का टीसीएस मामला हमें चेतावनी देता है कि अगर कानून प्रवर्तन एजेंसियां और मीडिया तथ्यों के बजाय राजनैतिक नैरेटिव से संचालित होंगे, तो इसका खामियाजा पूरे देश के सामाजिक सद्भाव को भुगतना पड़ेगा.

