अंडमान-निकोबार के मुख्य सचिव ने कहा था कि शोम्पेन जनजाति को ‘आधुनिक जीवनशैली अपनानी होगी’: जनजातीय परिषद का आरोप
ग्रेट और लिटिल निकोबार की जनजातीय परिषद ने अंडमान एवं निकोबार द्वीप प्रशासन पर ₹91,000 करोड़ की 'ग्रेट निकोबार द्वीप' (जीएनआई) विकास परियोजना के ज़रिए स्थानीय जनजातियों की जीवनशैली और अधिकारों को अनदेखा करने का गंभीर आरोप लगाया है. उनमें चिंता इस बात की है कि जब ग्रेट निकोबार मेगा प्रोजेक्ट स्थायी रूप से शुरू हो जाएगा, तब बाहरी दुनिया से अलग-थलग रहने वाले शोम्पेन आदिवासियों की जीवनशैली का क्या होगा?
अभिनय लक्ष्मण की रिपोर्ट है कि 300 से भी कम आबादी वाली ‘विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह’ (पीवीटीजी) शोम्पेन जनजाति की बस्तियों के पास बिजली संयंत्र प्रस्तावित है. परिषद का आरोप है कि तत्कालीन मुख्य सचिव चंद्र भूषण कुमार ने कहा था कि शोम्पेन अपनी पारंपरिक शिकारी-संग्राहक जीवनशैली जारी नहीं रख सकते और उन्हें "आधुनिक जीवनशैली अपनानी होगी". यह बयान पर्यावरण मंत्रालय के उस पुराने वादे के विपरीत है, जिसमें किसी को विस्थापित न करने की बात कही गई थी.
16 जुलाई की बैठक में जनजातीय परिषद ने पैतृक गांवों में पुनर्वसन और वन्यजीव अभयारण्यों की अधिसूचना पर अपनी चिंताओं को उठाया था. हालांकि, प्रशासन के आधिकारिक निर्देशों में इन नए मुद्दों को पूरी तरह से दरकिनार कर दिया गया और केवल 2017 व 2019 की पुरानी मैपिंग का संदर्भ दिया गया.
परिषद के अनुसार अभयारण्य जनजातियों की बिना सहमति के अधिसूचित किए गए हैं. हालांकि प्रशासन ने शिकार के अधिकार बनाए रखने का आश्वासन दिया है, फिर भी विस्थापन और बुनियादी ढांचे से जुड़ी लंबे समय से लंबित मांगें अब भी अनसुलझी हैं.
याद दिला दें कि दुनिया भर के कुछ शिक्षाविदों ने चेतावनी दी है कि यह परियोजना शोम्पेन आदिवासियों के लिए "मृत्युदंड" के समान साबित हो सकती है. अमृत ढिल्लों ने इस बारे में विस्तार से लिखा था.

