जापान आमों को वापस लौटा रहा, चीन की चावल पर रोक और यूरोपीय निरीक्षक मसालों पर सवाल उठा रहे हैं, क्यों?

दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा कृषि उत्पादक होने के बावजूद, वैश्विक कृषि-निर्यात में भारत की हिस्सेदारी केवल 2.4 प्रतिशत है. हाल के दिनों में जापान, चीन, हांगकांग और यूरोपीय संघ (ईयू) जैसे प्रमुख अंतरराष्ट्रीय बाजारों ने भारतीय कृषि उत्पादों की गुणवत्ता, कीटनाशक अवशेषों और प्रमाणन प्रक्रियाओं पर सवाल उठाते हुए सख्त कदम उठाए हैं.

‘अलजज़ीरा’ में कामरान यूसुफ की रिपोर्ट है कि मार्च 2026 में लखनऊ स्थित 'वेपर हीट ट्रीटमेंट' (वीएचटी) सुविधा के निरीक्षण के बाद जापानी निरीक्षकों ने मानक प्रक्रियाओं पर सवाल उठाए और 25 मार्च के बाद के सभी भारतीय आम शिपमेंट पर रोक लगा दी. लगभग दो दशकों में यह पहला बड़ा व्यवधान है, जिससे अल्फांसो और केसर सहित छह प्रमुख किस्में प्रभावित हुई हैं. यद्यपि जापान का बाजार मात्रा में छोटा है, लेकिन यह वैश्विक व्यापार में विश्वसनीयता का प्रतीक माना जाता है.

चीन के सीमा शुल्क विभाग (जीएसी) ने जीएमओ के अंश मिलने का दावा करते हुए तीन भारतीय चावल निर्यातकों के लाइसेंस रद्द कर दिए, जबकि निर्यातकों और भारत सरकार का कहना है कि भारतीय धान पूरी तरह जीएमओ-मुक्त है.

हांगकांग ने कीटनाशक अवशेषों के कारण भारतीय मसालों पर रोक लगाई, और यूरोपीय संघ ने भारतीय जीरे के निरीक्षण की आवृत्ति बढ़ाकर 30% कर दी.

किसान से लेकर व्यापारी और प्रोसेसर तक फैली लंबी श्रृंखला में कीटनाशकों के उपयोग और छिड़काव का सटीक रिकॉर्ड गायब हो जाता है. अधिकांश कड़े जीएमओ और प्रोटीन परीक्षण केंद्र केवल दिल्ली और हैदराबाद में केंद्रित हैं, जिससे दूर-दराज के किसानों को परेशानी होती है.  थाईलैंड और वियतनाम जैसे प्रतिस्पर्धी देशों की तुलना में भारत में फार्म-टू-शिपमेंट ट्रेसेबिलिटी और कोल्ड-चेन नेटवर्क कमजोर है.

भारत के 86% से अधिक किसान 2 हेक्टेयर से कम भूमि वाले हैं, जिससे बड़े पैमाने पर एक समान गुणवत्ता मानक लागू करना कठिन हो जाता है. रिपोर्ट कहती है कि प्रतिबंधों के कारण किसानों और निर्यातकों को भारी वित्तीय नुकसान, रद्द अनुबंधों और गिरते स्थानीय दामों का सामना करना पड़ रहा है. हालाँकि, भारत सरकार ने प्रयोगशालाओं का विस्तार करने, डिजिटल ट्रेसेबिलिटी शुरू करने और जोखिम-आधारित निरीक्षण कड़े करने की दिशा में कदम बढ़ाए हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को केवल "उत्पादन बढ़ाने" के बजाय "खेत से निर्यात तक गुणवत्ता साबित करने" की रणनीति पर ध्यान केंद्रित करना होगा.

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