‘पुलिस ही जज और जल्लाद’: बंगाल की नागरिकता जांच व्यवस्था पर विशेषज्ञों की आपत्ति
'स्क्रोल' में रोकीबुज जमान ने लिखा है कि पश्चिम बंगाल में कथित बांग्लादेशी नागरिकों की पहचान और हिरासत को लेकर अपनाई जा रही प्रक्रिया पर कानूनी विशेषज्ञों ने गंभीर सवाल उठाए हैं. उनका कहना है कि राज्य की नई व्यवस्था में न्यायिक समीक्षा की पर्याप्त गुंजाइश नहीं है और पुलिस को नागरिकता तय करने तथा लोगों को हिरासत में लेने की व्यापक शक्तियां मिल गई हैं.
अगस्त के अंतिम सप्ताह में केरल से लौट रहे मुर्शिदाबाद के मजदूर असरुल शेख को रेलवे स्टेशन के पास पुलिस ने रोक लिया. पुलिस ने उस पर बांग्लादेशी होने का आरोप लगाया और करीब 15 किलोमीटर दूर लालगोला हिरासत केंद्र भेज दिया. उसकी भतीजी रोजिना खातून के मुताबिक, 20 दिन से अधिक समय बीतने के बावजूद पुलिस ने परिवार को यह बताने वाला कोई दस्तावेज या नोटिस नहीं दिया कि उसे बांग्लादेशी क्यों माना गया.
शेख हालिया विशेष गहन मतदाता पुनरीक्षण यानी एसआईआर में वैध मतदाता के रूप में शामिल था और विधानसभा चुनाव में मतदान भी कर चुका था. इसके बावजूद पुलिस ने उसके दस्तावेजों की जांच नहीं की. जून से पश्चिम बंगाल पुलिस ने कम से कम नौ मुस्लिम पुरुषों और दो बच्चों को रात में घरों से उठाकर बांग्लादेशी होने का आरोप लगाया है. इन मामलों में न तो पुलिस ने आरोप का आधार सार्वजनिक किया और न ही कोई प्राथमिकी दर्ज की.
नागरिकता की पहचान, नाम हटाना और निर्वासन
मई में भाजपा के सत्ता में आने के बाद पश्चिम बंगाल सरकार ने कथित अवैध प्रवासियों के लिए हिरासत केंद्र स्थापित करने और ‘पता लगाओ, नाम हटाओ, निर्वासित करो’ नीति लागू करने की घोषणा की. यह प्रक्रिया असम में विदेशी नागरिकों की पहचान की व्यवस्था से मिलती-जुलती है, लेकिन विशेषज्ञों के मुताबिक बंगाल की व्यवस्था में न्यायिक निगरानी और भी कम है.
वरिष्ठ अधिवक्ता संजय हेगड़े ने कहा कि यह प्रक्रिया पुलिस को एक साथ नागरिकता की ‘न्यायाधीश, निर्णायक और सजा देने वाली’ बना देती है. असम में संदिग्ध व्यक्ति को विदेशी न्यायाधिकरण के सामने पेश किया जाता है, जबकि बंगाल में पुलिस द्वारा पकड़े गए लोगों को सीमा सुरक्षा बल को सौंपकर निर्वासित करने या महीनों तक हिरासत केंद्र में रखने की बात सामने आई है. हालांकि अधिवक्ता तल्हा अब्दुल रहमान ने यह भी कहा कि असम के विदेशी न्यायाधिकरण खुद भी उचित कानूनी प्रक्रिया की कसौटी पर सवालों के घेरे में हैं.
मई 2025 का आदेश
बंगाल पुलिस ने कम से कम एक मामले में गृह मंत्रालय के 2 मई 2025 के आदेश का इस्तेमाल किया है. इस आदेश के तहत राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को संदिग्ध अवैध प्रवासियों को हिरासत केंद्रों में रखने और उनके घोषित गृह राज्य तथा जिले से 30 दिनों के भीतर नागरिकता की पुष्टि कराने का निर्देश दिया गया था. पुष्टि न होने पर व्यक्ति को निर्वासित किया जा सकता है.
मुर्शिदाबाद के नासिर मोल्ला को जून में उनके घर से उठाया गया. उनका नाम एसआईआर में मतदाता सूची से बाहर कर दिया गया था और इसके खिलाफ उनकी अपील लंबित है. कलकत्ता हाईकोर्ट ने उन्हें हिरासत केंद्र से रिहा करने से इनकार किया, जिसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा. उनके वकील ने कहा कि मोल्ला भारत में जन्मे हैं और उनके परिवार के जमीन के रिकॉर्ड 1950 के दशक तक मौजूद हैं.
सुप्रीम कोर्ट के 2024 के रहीम अली फैसले का हवाला देते हुए वकील ने कहा कि किसी व्यक्ति को विदेशी बताने के आरोप का आधार बनने वाली सामग्री उसे उपलब्ध कराना प्राकृतिक न्याय का हिस्सा है.
कानूनी चुनौती के घेरे में
कानूनी विशेषज्ञों ने मई 2025 के आदेश की संवैधानिक वैधता पर भी सवाल उठाए हैं. उनका कहना है कि हिरासत में लिए गए व्यक्ति को मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने जैसी सुरक्षा व्यवस्था आदेश में स्पष्ट नहीं है. अधिवक्ता दीपेश अग्रवाला ने कहा कि कथित विदेशी नागरिकों को भी संविधान के अनुच्छेद 21 और 22 के तहत संरक्षण प्राप्त है और उन्हें 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना जरूरी है.
सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता तल्हा अब्दुल रहमान ने आदेश में दिए गए मानक संचालन प्रक्रिया को मनमाना और अवैध बताया. उनके अनुसार, इसमें यह स्पष्ट नहीं है कि पुलिस किस आधार पर किसी व्यक्ति को बांग्लादेशी या म्यांमार का नागरिक मानेगी, जिससे कानूनी प्रक्रिया की जगह पूर्वाग्रह काम कर सकते हैं.
अधिवक्ता प्रसन्ना एस ने यह भी कहा कि मई 2025 का कार्यकारी आदेश बाद में लागू हुए इमिग्रेशन एंड फॉरेनर्स एक्ट, 2025 के तहत उपलब्ध सुरक्षा उपायों को खत्म नहीं कर सकता. उनके अनुसार, केवल विदेशी होने के संदेह के आधार पर किसी व्यक्ति को निर्वासित नहीं किया जा सकता. राष्ट्रीयता की पुष्टि कानूनी रूप से जरूरी है और पुलिस खुद जांचकर्ता तथा अंतिम निर्णयकर्ता नहीं बन सकती.

