वॉल्टर फर्नांडिस | एक खतरनाक शिकंजा

पूर्वोत्तर भारत में नागरिक समाज (सिविल सोसाइटी) समूह विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (एफसीआरए) में प्रस्तावित संशोधनों और 22 जून, 2026 के राजपत्र में प्रकाशित नियमों से बेहद चिंतित हैं.  नए नियमों के अनुसार, विदेशी धन प्राप्त करने के नवीनीकरण हेतु आवेदन करने वाले संगठनों को पिछले वर्ष के अपने तथा अपने प्रमुख अधिकारियों के सोशल मीडिया पोस्ट, पुस्तकों और लेखों का ब्योरा देना होगा. साथ ही, अपनी सटीक गतिविधियों को भी स्पष्ट करना होगा.

हालाँकि, विधेयक को संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) के पास भेजे जाने से यह खतरा फिलहाल टल गया है, लेकिन यह सही समय है यह पूछने का कि स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक कल्याण के लिए भारतीय धन क्यों उपलब्ध नहीं है.

मूलभूत सुविधाओं का अभाव और जातीय संघर्ष

वॉल्टर फर्नांडिस के अनुसार, पूर्वोत्तर के पहाड़ी क्षेत्रों के अध्ययन बताते हैं कि दयनीय स्वास्थ्य व शैक्षणिक ढांचा आदिवासी भूमि के हस्तांतरण और तज्जनित जातीय संघर्षों का एक प्रमुख कारण है. बेहतर अस्पताल और स्कूल केवल गुवाहाटी व शिलॉन्ग जैसे बड़े शहरों में केंद्रित हैं. इन तक पहुँचने या आपातकालीन चिकित्सा के लिए गरीब परिवारों को अपनी पुश्तैनी ज़मीन कौड़ियों के भाव बेचनी पड़ती है. आजीविका और पहचान के इस एकमात्र साधन के छिन जाने से जो ग़रीबी आती है, वही आगे चलकर जातीय तनाव का रूप ले लेती है.

हालिया अध्ययनों से पता चलता है कि दो-तिहाई आदिवासी आबादी पारंपरिक चिकित्सा पर निर्भर है, क्योंकि प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र बदहाल हैं. अधिकांश केंद्रों में बिजली, दवाओं और परीक्षण सुविधाओं का अभाव रहता है. शिक्षा की स्थिति भी अलग नहीं है; स्कूलों में सिंगल-टीचर व्यवस्था है, और मिड-डे मील योजना अक्सर कागज़ों तक सीमित रहती है.

नागरिक समाज का योगदान और सरकारी उपेक्षा

राज्य द्वारा छोड़े गए इस खालीपन को नागरिक समाज संगठन भरते हैं. वे दुर्गम इलाकों में स्कूल, अस्पताल और औषधालय चलाते हैं. चूंकि इन्हें सरकार से कोई वित्तीय सहायता नहीं मिलती, इसलिए वे विदेशी अंशदान पर निर्भर रहते हैं. इसके बावजूद, प्रस्तावित एफसीआरए  संशोधनों के तहत एक 'नामित प्राधिकारी' बनाने का प्रावधान है, जो अनुमति रद्द होने पर 1976 के बाद से विदेशी धन से बनी संपत्तियों को जब्त कर सकेगा.

वर्ष 2020-22 के आंकड़ों के अनुसार, जिन 15,000 से अधिक संगठनों की अनुमति रद्द की गई, उनमें से केवल एक दर्जन पर ही वित्तीय अनियमितता के आरोप थे. बाकी को केवल तकनीकी गलतियों या खातों में देरी के कारण खारिज किया गया. ऐसे कड़े प्रावधान इन संस्थाओं को काम बंद करने पर मजबूर करेंगे, जिससे अंततः गरीब ही मौलिक अधिकारों से वंचित होंगे.

सरकार की यह नीति 'डॉग-इन-द-मैंगर' (न खुद करेंगे, न करने देंगे) रवैये को दर्शाती है. इसके विपरीत, सरकार को सार्वजनिक-निजी भागीदारी और अनुदान योजना के ज़रिए इन गैर-सरकारी संगठनों की मदद करनी चाहिए. दक्षिण भारतीय राज्यों ने 1960 के दशक से शिक्षा क्षेत्र में यही मॉडल अपनाया है, जहाँ सरकार निजी स्कूलों के शिक्षकों का वेतन देती है. इससे गरीब बच्चे स्कूल से जुड़े रहते हैं और साक्षरता दर बढ़ती है.

पिछले एक दशक में नीति का रुझान नियमन के बजाय अत्यधिक नियंत्रण और प्रतिबंध की ओर रहा है. पारदर्शिता और जवाबदेही ज़रूरी है, लेकिन हर संगठन को संदेह की नज़र से देखना गलत है. असहमति या आलोचना को अनुमति खारिज करने का आधार नहीं बनाया जाना चाहिए.

वॉल्टर फर्नांडिस का कहना है कि पारदर्शी प्रक्रिया के अभाव में कड़े दमनकारी नियंत्रण विरोधी आवाज़ों के लिए मौत की घंटी साबित हो सकते हैं. इससे दूरदराज़ के क्षेत्रों में हाशिए पर पड़े समुदायों को मिल रही स्वास्थ्य और शिक्षा सेवाएँ ठप हो जाएँगी.

यह केवल एक प्रशासनिक या कानूनी मुद्दा नहीं, बल्कि एक गंभीर मानवाधिकार का प्रश्न है. नागरिक समाज को एकजुट होकर इस नीतिगत शिकंजे के खिलाफ आवाज़ उठानी होगी और एक संतुलित मार्ग की मांग करनी होगी.

(वॉल्टर फर्नांडिस गुवाहाटी स्थित एनईएसआरसी के निदेशक हैं. यह उनके लेख का हिंदी में अनूदित और संपादित अंश है.)

Previous
Previous

ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रदर्शन के बाद अभिनेता इमरान खान को 28 अक्टूबर तक भारत छोड़ने का नोटिस

Next
Next

सितंबर में भारत का व्यापार घाटा $30.21 अरब रहा, अगस्त से 4 अरब डॉलर ज्यादा