दिल्ली एसआईआर : ‘तार्किक विसंगतियों’ के नाम पर मुस्लिम मतदाताओं को अधिक निशाना बनाया

‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (एसआईआर) प्रक्रिया के तहत जारी दिल्ली की प्रारूप (ड्राफ्ट) मतदाता सूची के एक विस्तृत विश्लेषण से चौंकाने वाला खुलासा हुआ है. भारत निर्वाचन आयोग के केंद्रीकृत 'ERONET' सॉफ्टवेयर द्वारा रिकॉर्ड में "तार्किक विसंगतियों" की जाँच के दौरान मुस्लिम मतदाताओं को अनुपातहीन रूप से अधिक निशाना (फ्लैग) बनाया गया है.

दिलचस्प बात यह है कि किन्हें चिन्हित किया जाएगा, इसका फैसला वैधानिक संरक्षक माने जाने वाले मतदाता पंजीकरण अधिकारियों (ईआरओ) ने नहीं, बल्कि केंद्रीकृत सॉफ्टवेयर ने लिया है.

दिल्ली के आंकड़े और डेटा का अंतर

'द हिंदू' द्वारा दिल्ली के 97.54 लाख मतदाताओं की ड्राफ्ट सूची के किए गए डिजिटलीकरण से पता चलता है कि चुनाव आयोग ने 33.12 लाख लोगों को नोटिस के लिए चिन्हित किया:

13.79 लाख मतदाता "पिछले एसआईआर से अनमैप्ड" (अमानचित्रित) पाए गए. 9.33 लाख मतदाता आठ अलग-अलग कारणों के आधार पर "तार्किक विसंगतियों" श्रेणी में डाले गए.

दिल्ली की ड्राफ्ट सूची में मुसलमानों की कुल आबादी 13.6% (लगभग 13.3 लाख) है, जो 2011 की जनगणना (12.9%) के काफी करीब है.  'अनमैप्ड' सूची में मुस्लिम मतदाताओं का अनुपात केवल 7.6% था—यानी गैर-मुस्लिमों की तुलना में मुस्लिम मतदाता खुद को पिछली सूची से मैप कराने में अधिक सफल रहे.

लेकिन इसके विपरीत, "तार्किक विसंगतियों" की व्यापक श्रेणी में मुसलमानों की हिस्सेदारी उछलकर 20.3% हो गई. सरल शब्दों में कहें तो जहाँ प्रति 1,000 गैर-मुस्लिम मतदाताओं में से 197 को चिन्हित किया गया, वहीं प्रति 1,000 मुस्लिम मतदाताओं में से 318 को चिन्हित किया गया. इस प्रकार मुसलमानों के चिन्हित होने की संभावना 60% अधिक रही.

विसंगतियों के कारण और परिवार के आकार का पैमाना

सॉफ्टवेयर द्वारा चिन्हित करने के आठ कारणों को चार प्रमुख श्रेणियों में विभाजित किया गया है:

नाम में बेमेल: इसमें मुस्लिम हिस्सेदारी 15.5% रही. परिवार के आकार पर आधारित कारण: जैसे संतान >= 6, माता-पिता की उम्र में 50 वर्ष से अधिक का अंतर, या दो बच्चों के बीच 9 महीने से कम का अंतर आदि. अयोग्य माता-पिता: इसमें केवल 183 नाम थे. "कोई कारण नहीं बताया गया": इस श्रेणी के अंतर्गत लगभग 60,000 लोगों को चिन्हित किया गया, जिनमें भी मुसलमानों की हिस्सेदारी लगभग 20% थी.

सबसे बड़ा विषमतापूर्ण आँकड़ा परिवार के आकार से जुड़े पांच कारणों में सामने आया. इन कारणों से चिन्हित 6.75 लाख मतदाताओं में से 30% मुस्लिम थे—जो उनकी कुल आबादी के अनुपात से दोगुने से भी अधिक है.

विशेष रूप से, "संतान >= 6" वाले श्रेणी में 1.4 लाख मतदाताओं में मुसलमानों की हिस्सेदारी 58% तक पहुँच गई, जो उनकी आबादी के हिस्से का चार गुना से भी अधिक है. कुल मिलाकर, परिवार के आकार से जुड़े नियमों के तहत मुस्लिम मतदाताओं के चिन्हित होने की संभावना गैर-मुस्लिमों की तुलना में तीन गुना अधिक थी.

सॉफ्टवेयर एल्गोरिदम और प्रक्रिया पर सवाल

यह पैटर्न दर्शाता है कि सॉफ्टवेयर के पैमाने इस प्रकार तय किए गए थे जो मुस्लिम समुदाय में ऐतिहासिक रूप से रही उच्च प्रजनन दर से मेल खाते हों.हालाँकि, 'राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण' के आंकड़े बताते हैं कि 1992-93 से 2019-22 के बीच मुस्लिम महिलाओं की प्रजनन दर 4.41 से घटकर 2.36 पर आ चुकी है और हिंदू-मुस्लिम दरों का अंतर लगातार कम हुआ है.

इसके अलावा, भारत में बुजुर्गों की सटीक जन्म तिथियों के अभाव में यह सॉफ्टवेयर कैलकुलेशन किस आधार पर किए गए, इस पर भी गंभीर सवाल हैं.

दिशा-निर्देशों में अचानक बदलाव और चुप्पी

प्रशासनिक स्तर पर भी इस प्रक्रिया में अनिमितताएँ देखी गई हैं: जून 2025 (बिहार) और अक्टूबर 2025 (12 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों) के चुनाव आयोग (ईसीआई) आदेशों में विधिवत फॉर्म भरने वाले ड्राफ्ट मतदाताओं को "तार्किक विसंगतियों" पर नोटिस देने का कोई प्रावधान नहीं था. चरण-2 के दौरान बिना किसी औपचारिक घोषणा के सबसे पहले पश्चिम बंगाल में इस प्रक्रिया को लागू किया गया. आधिकारिक तौर पर इसका उल्लेख 14 मई 2026 को चरण-3 के निर्देशों में पहली बार एक अतिरिक्त खंड जोड़कर किया गया.

चुनाव आयोग ने अब तक यह स्पष्ट नहीं किया है कि ये 'तार्किक विसंगतियाँ' किसी नागरिक को मताधिकार से वंचित करने का आधार कैसे बन सकती हैं. आयोग को भेजी गई विस्तृत प्रश्नावली का भी कोई जवाब नहीं मिला.

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