केंद्रीय मंत्री, बेटा और ढहती हुई छवि: ईंट-दर-ईंट गिरती गई दीवार

‘द साउथ फर्स्ट’ के मुताबिक, तेलंगाना में केंद्रीय राज्य मंत्री के बेटे पर पॉक्सो कानून के तहत मामला दर्ज होने के बाद जो राजनीतिक और सामाजिक घटनाक्रम सामने आया, उसने सत्ता, पुलिस और राजनीतिक नैरेटिव की परतें खोल दीं. आठ दिनों तक चले भारी दबाव, सोशल मीडिया अभियान और कानूनी जद्दोजहद के बाद आखिरकार मंत्री पुत्र ने 16 मई की रात आत्मसमर्पण किया या यूँ कहें कि गिरफ्तारी दी. लेकिन इस पूरे प्रकरण ने सबसे बड़ा सवाल यह खड़ा किया कि क्या कानून सबके लिए बराबर है.

अगर मंत्री अपने बेटे को एफआईआर दर्ज होने के अगले दिन ही पुलिस के हवाले कर देते, तो शायद मामला इतना नहीं बिगड़ता. शुरुआती एफआईआर में पॉक्सो की धारा 11 और 12 लगी थीं, जिनमें राहत और जल्दी जमानत की संभावना थी. राजनीतिक रूप से भी मंत्री अपनी साख बचा सकते थे. लोग यह कह सकते थे कि पिता ने कानून का सम्मान किया.

लेकिन हुआ इसका उल्टा. मंत्री ने सार्वजनिक मंचों और सोशल मीडिया पर अपने विरोधियों को धमकाना शुरू किया, बेटे को निर्दोष बताया और पूरे मामले को राजनीतिक साजिश साबित करने की कोशिश की. इसी दौरान पीड़िता के खिलाफ सोशल मीडिया पर अभियान चलाया गया. उसकी उम्र पर सवाल उठाए गए, तस्वीरें और वीडियो फैलाए गए. बाद में यह साफ हो गया कि पीड़िता नाबालिग है.

मंत्री को कानूनी सलाह दी गई थी कि गिरफ्तारी से बचा जा सकता है. शायद इसी भरोसे में उन्होंने देरी की. लेकिन जब मामले में पॉक्सो की गंभीर धाराएँ 5 और 6 जोड़ दी गईं और अदालत में पीड़िता का बयान सामने आया, तब पूरा खेल बदल गया. हाई कोर्ट ने अंतरिम राहत देने से इनकार कर दिया.

इस दौरान बीजेपी और आरएसएस के कुछ वरिष्ठ नेताओं ने भी मंत्री को चुप रहने और संयम बरतने की सलाह दी. लेकिन वे लगातार बयान देते रहे. नतीजा यह हुआ कि वर्षों में बनाई गई उनकी राजनीतिक छवि धीरे-धीरे ढहती चली गई.

सबसे गंभीर सवाल पुलिस की भूमिका पर उठता है. आठ दिनों तक पुलिस “लोकेशन ट्रेस” और “स्पेशल टीम” की बातें करती रही, जबकि आरोप है कि मंत्री और उनका बेटा लगातार संपर्क में थे. अगर यही आरोप किसी आम नागरिक पर होता, तो क्या पुलिस इतना इंतजार करती.

आखिर में जिस तरह मंत्री के घर तक पुलिस पहुँची और गिरफ्तारी का नाटक हुआ, उसने यह साफ कर दिया कि सत्ता के भीतर भी समर्थन स्थायी नहीं होता. राजनीति में कई बार विरोधी नहीं, बल्कि अपनी रणनीति ही सबसे बड़ी दुश्मन साबित होती है.

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