निजी जगह पर जातिसूचक गाली देना एससी/एसटी अधिनियम के तहत अपराध नहीं: सुप्रीम कोर्ट
‘लाइव लॉ’ के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कहा कि निजी स्थान पर जातिसूचक गाली या अपमानजनक टिप्पणी करना अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत अपराध नहीं माना जा सकता, यदि वह घटना ऐसी जगह नहीं हुई हो जो आम लोगों की नजर में हो.
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें एक स्कूल प्रबंधक के खिलाफ एससी/एसटी अधिनियम के तहत चल रही कार्यवाही को समाप्त करने से इनकार किया गया था.
मामला जनवरी 2020 का है. शिकायतकर्ता ने प्राथमिकी में आरोप लगाया था कि वह अपने बेटे के घायल होने के बाद 24 जनवरी को स्कूल प्रबंधक से मिलने गया था. उसका आरोप था कि स्कूल प्रबंधक और कुछ अन्य कर्मचारियों ने उस पर लाठियों से हमला किया और उसके साथ जातिसूचक गालियां दीं.
अगले दिन दर्ज प्राथमिकी में दंगा, चोट पहुंचाने, गलत तरीके से बंधक बनाने और जानबूझकर अपमान करने के आरोपों के साथ एससी/एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम की धारा 3(1)(आर) और 3(1)(एस) भी लगाई गई थीं.
अधिनियम की धारा 3(1)(आर) के तहत किसी अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के व्यक्ति को सार्वजनिक दृष्टि में जानबूझकर अपमानित या प्रताड़ित करना अपराध है. वहीं धारा 3(1)(एस) सार्वजनिक दृष्टि में किसी व्यक्ति को उसकी जाति के नाम से अपमानित करने को दंडनीय अपराध बनाती है.
स्कूल प्रबंधक ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में दलील दी थी कि कथित घटना स्कूल के एक बंद कमरे में हुई थी. उसके अनुसार, कमरा अंदर से बंद था, उसमें कोई खिड़की नहीं थी और वह आम लोगों के लिए खुला स्थान नहीं था. उसने यह भी कहा कि जिन लोगों के बयान दर्ज किए गए, उन्होंने यह नहीं बताया था कि जातिसूचक टिप्पणियां किए जाने के समय वे कमरे के अंदर मौजूद थे.
अप्रैल 2023 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मामले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया. इसके बाद स्कूल प्रबंधक ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया.
सुप्रीम कोर्ट ने अपने पिछले फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि किसी स्थान को तभी "सार्वजनिक दृष्टि में" माना जा सकता है, जब वहां मौजूद आम लोग कथित जातिसूचक टिप्पणी को देख या सुन सकें.
पीठ ने कहा कि यदि कथित अपराध ऐसी जगह की चारदीवारी के भीतर हुआ है, जहां आम लोग मौजूद नहीं थे, तो उसे सार्वजनिक दृष्टि में हुई घटना नहीं माना जा सकता.
अदालत ने प्राथमिकी की सामग्री पर भी ध्यान दिया. पीठ ने कहा कि प्राथमिकी में स्कूल प्रबंधक के खिलाफ किसी विशेष जातिसूचक गाली का स्पष्ट आरोप नहीं लगाया गया था.
अदालत के अनुसार, जिन शिक्षकों के बयान दर्ज किए गए, उन्होंने केवल झगड़े और हाथापाई की बात कही थी. किसी भी शिक्षक ने यह नहीं कहा कि वह उस समय कमरे में मौजूद था जब कथित जातिसूचक टिप्पणियां की गईं या उसने उन टिप्पणियों को सुना था.
पीठ ने स्पष्ट किया कि केवल स्कूल परिसर में उनकी मौजूदगी से यह साबित नहीं होता कि कथित जातिसूचक टिप्पणी सार्वजनिक दृष्टि में की गई थी.
इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने स्कूल प्रबंधक के खिलाफ एससी/एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत चल रही कार्यवाही को समाप्त कर दिया. हालांकि, अदालत ने यह स्पष्ट किया कि मारपीट, दंगा, चोट पहुंचाने और अन्य कथित अपराधों से संबंधित मामला जारी रहेगा.
फैसले का महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि एससी/एसटी अधिनियम की संबंधित धाराओं के तहत केवल जातिसूचक टिप्पणी किए जाने का आरोप पर्याप्त नहीं है. अदालत को यह भी देखना होगा कि कथित अपमान सार्वजनिक दृष्टि में हुआ था या नहीं और आरोपी की भूमिका तथा घटना के संबंध में ठोस साक्ष्य मौजूद हैं या नहीं.

