अलीज़ा बानो का कोई अस्तित्व नहीं: कश्मीर सीमा पर दिव्यांग लोग सरकारी सहायता से क्यों हैं बाहर?

उरी में अलीज़ा बानो अपने भाई मुबाशिर के साथ, फोटो: साजिद हमीद. 

भारत और पाकिस्तान के बीच नियंत्रण रेखा (एलओसी) पर बसे जम्मू-कश्मीर के सीमावर्ती गांवों में रहने वाले लोगों की जिंदगी हमेशा अनिश्चितताओं से घिरी रहती है. गोलाबारी का डर, विस्थापन का खतरा और सीमित संसाधनों के बीच जीवन किसी चुनौती से कम नहीं. लेकिन इन चुनौतियों के बीच एक ऐसा वर्ग भी है जिसकी पीड़ा अक्सर सरकारी आंकड़ों, नीतियों और सार्वजनिक चर्चाओं से गायब रहती है, वो हैं दिव्यांग लोग.

‘आर्टिकल 14’ केलिए सजाद हमीद की रिपोर्ट के मुताबिक, उरी सेक्टर के पावडियन गांव में रहने वाली 16 वर्षीय अलीज़ा बानो की कहानी इस अदृश्य संकट की सबसे मार्मिक तस्वीर पेश करती है. जन्मजात शारीरिक विकलांगता से जूझ रही अलीज़ा सरकारी रिकॉर्ड में कहीं दर्ज नहीं है. उसके पास आधार कार्ड नहीं है, राशन कार्ड नहीं है, स्वास्थ्य बीमा नहीं है और न ही कोई आधिकारिक पहचान पत्र. उसकी उंगलियां बायोमेट्रिक स्कैनर पर सही तरीके से नहीं रखी जा सकीं, इसलिए पहचान पत्र बन ही नहीं पाया. एक तकनीकी असफलता ने उसे पूरे सरकारी तंत्र से बाहर कर दिया.

पहचान के अभाव का मतलब केवल एक दस्तावेज़ का न होना नहीं है. इसका अर्थ है कि अलीज़ा को दिव्यांग पेंशन नहीं मिल सकती, आयुष्मान भारत जैसी स्वास्थ्य योजनाओं का लाभ नहीं मिल सकता और वह उन सभी कल्याणकारी कार्यक्रमों से बाहर है जो विशेष रूप से उसके जैसे लोगों के लिए बनाए गए हैं. उसके पिता मुज़फ्फर हुसैन को अपनी बेटी और बेटे के दिव्यांगता प्रमाणपत्र बनवाने के लिए कई महीनों तक बार-बार जिला अस्पतालों के चक्कर लगाने पड़े, लेकिन व्यवस्था की जटिलताओं ने उनकी मुश्किलें और बढ़ा दीं.

सीमा पर रहने वाले दिव्यांग लोगों के लिए समस्या केवल सरकारी दस्तावेजों तक सीमित नहीं है. मई 2025 में भारत-पाकिस्तान तनाव के दौरान हुई गोलाबारी ने यह दिखा दिया कि आपदा की स्थिति में उनकी सुरक्षा लगभग पूरी तरह परिवार और पड़ोसियों की दया पर निर्भर है. उरी के सलामाबाद में रहने वाले अब्दुल रशीद, जो रीढ़ की चोट के कारण चल नहीं सकते, गोलाबारी शुरू होने पर खुद सुरक्षित स्थान तक नहीं पहुंच सके. उनके बेटों ने उन्हें कंधों पर उठाकर पहाड़ी रास्तों से बाहर निकाला. यदि परिवार साथ न होता तो उनका बचना मुश्किल हो सकता था.

यही स्थिति कश्मीर के अन्य सीमावर्ती इलाकों जैसे कर्नाह, तंगधार और पुंछ में भी देखने को मिलती है. वहां बने अधिकांश सामुदायिक बंकर दिव्यांगों की जरूरतों को ध्यान में रखकर नहीं बनाए गए हैं. कई बंकरों तक पहुंचने के लिए खड़ी और संकरी सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं. व्हीलचेयर उपयोग करने वाले लोगों के लिए उनमें प्रवेश करना लगभग असंभव है. भीतर शौचालय, रोशनी और अन्य बुनियादी सुविधाओं का भी अभाव है.

दिव्यांग अधिकार कानून 2016 समान अवसर और सुगम पहुंच की बात करता है, लेकिन सीमावर्ती कश्मीर की हकीकत इन वादों से काफी दूर दिखाई देती है. यहां सुरक्षा ढांचे का निर्माण तो हुआ है, लेकिन उसमें समावेशिता की सोच अक्सर गायब है. नतीजा यह है कि दिव्यांग लोगों को कई बार अपनी गरिमा और सुरक्षा के बीच चुनाव करना पड़ता है.

एक और गंभीर समस्या सरकारी आंकड़ों और वास्तविकता के बीच का अंतर है. जम्मू-कश्मीर हैंडीकैप्ड एसोसिएशन के अध्यक्ष अब्दुल रशीद भट का कहना है कि 2011 की जनगणना में प्रदेश में लगभग तीन लाख दिव्यांग लोगों का आंकड़ा दर्ज था, जबकि आज उनकी संख्या आठ लाख से अधिक हो सकती है. बड़ी संख्या में लोग अभी भी सरकारी रिकॉर्ड से बाहर हैं. इसका मतलब है कि नीति निर्माण और संसाधनों के आवंटन में भी उनकी वास्तविक जरूरतें प्रतिबिंबित नहीं हो पातीं.

सीमावर्ती गांवों में चेतावनी प्रणालियां भी दिव्यांगों के लिए पर्याप्त नहीं हैं. गोलाबारी या आपात स्थिति की सूचना अक्सर मस्जिदों के लाउडस्पीकरों या व्हाट्सऐप संदेशों के जरिए दी जाती है. ऐसे में सुनने में अक्षम व्यक्ति चेतावनी से वंचित रह सकते हैं. तंगधार में एक परिवार ने बताया कि उनका बधिर बेटा गोलाबारी शुरू होने के बाद भी भोजन करता रहा क्योंकि उसे खतरे का पता ही नहीं चला. अंतिम क्षणों में उसकी मां ने उसे घर से बाहर निकाला.

सरकार द्वारा उपलब्ध कराए जाने वाले सहायक उपकरण भी कई बार स्थानीय जरूरतों के अनुरूप नहीं होते. पहाड़ी और पथरीले इलाकों में साधारण व्हीलचेयर लगभग बेकार साबित होती है. पावडियन के मुबाशिर हुसैन कहते हैं कि उन्हें मिली व्हीलचेयर को हर समय कोई न कोई धक्का देता है, क्योंकि वह पहाड़ी रास्तों पर चल ही नहीं सकती. ऐसे में शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और रोजमर्रा के कामों तक पहुंच और कठिन हो जाती है.

इस संकट का एक सामाजिक पहलू भी है. रोजगार की तलाश में बड़ी संख्या में युवा सीमावर्ती गांव छोड़कर शहरों की ओर जा रहे हैं. पीछे बुजुर्ग माता-पिता और कमजोर सामाजिक ढांचा बच रहा है. ऐसे में आपदा या गोलाबारी के समय दिव्यांग लोगों को सुरक्षित निकालने वाले हाथ भी कम होते जा रहे हैं.

कश्मीर की सीमा पर रहने वाले दिव्यांग नागरिकों की कहानी केवल सुविधाओं की कमी की कहानी नहीं है. यह उस व्यवस्था पर सवाल है जो कागजों पर अधिकार तो देती है, लेकिन उन्हें जमीन पर लागू करने में असफल रहती है. जब किसी व्यक्ति का अस्तित्व ही सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज न हो, जब सुरक्षा ढांचा उसकी जरूरतों को न समझे और जब उसकी जिंदगी पूरी तरह दूसरों की मदद पर निर्भर हो जाए, तब यह केवल प्रशासनिक विफलता नहीं बल्कि मानवीय संकट बन जाता है.

अलीज़ा बानो जैसी लाखों आवाजें आज भी इसी इंतजार में हैं कि राज्य उन्हें देखे, पहचाने और नागरिक होने के उनके अधिकार को स्वीकार करे. क्योंकि किसी भी लोकतंत्र की असली परीक्षा उसकी सीमाओं पर नहीं, बल्कि उन सबसे कमजोर नागरिकों के प्रति उसके व्यवहार में छिपी होती है.

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