कैसे हिंदुत्व पश्चिम बंगाल में सत्ता-विरोधी लहर की भाषा बन गया
पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी.
‘मकतूब मीडिया’ के मुताबिक, 2026 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव ने राज्य की राजनीति का पूरा परिदृश्य बदल दिया. भाजपा ने 207 सीटें जीतकर पहली बार बंगाल में सरकार बनाई, जबकि ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस 80 सीटों पर सिमट गई. यह नतीजा सिर्फ एक सरकार के खिलाफ जनता के गुस्से का परिणाम नहीं था. यह उस राजनीतिक बदलाव का भी संकेत था जिसमें भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, भर्ती घोटालों और शासन से जुड़ी नाराज़गी को धीरे-धीरे हिंदू पहचान और हिंदुत्व की राजनीति की भाषा में बदल दिया गया.
बहुसंख्यकवादी संदेश और ध्रुवीकरण की राजनीति
भाजपा की जीत के बाद सुवेंदु अधिकारी ने पश्चिम बंगाल के पहले भाजपा मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली. चुनाव के बाद दिए गए उनके बयानों ने यह संदेश मजबूत किया कि यह सिर्फ सत्ता परिवर्तन नहीं बल्कि एक वैचारिक जीत भी है. मुस्लिम मतदाताओं और हिंदू मतदाताओं के अलग-अलग राजनीतिक रुझानों की चर्चा करते हुए भाजपा नेताओं ने चुनावी परिणाम को हिंदुत्व की जीत के रूप में पेश किया.
सरकार की शुरुआती प्रतीकात्मक कार्रवाइयों ने भी इसी संदेश को बल दिया. मायापुर में गौ-पूजा, पशु वध नियंत्रण कानून को लेकर सार्वजनिक संदेश और सड़कों पर नमाज को लेकर जारी निर्देशों को भाजपा समर्थकों ने तुष्टिकरण की राजनीति के अंत के रूप में देखा. आलोचकों के लिए यह राज्य की राजनीति में बहुसंख्यकवादी सोच के संस्थागत विस्तार का संकेत था.
जब बुलडोजर बना राजनीतिक प्रतीक
चुनाव के बाद कोलकाता के न्यू मार्केट इलाके में भाजपा समर्थकों की एक विजय रैली में बुलडोजर का इस्तेमाल हुआ. हाल के वर्षों में बुलडोजर प्रशासनिक कार्रवाई से अधिक राजनीतिक प्रतीक बन चुका है. कई भाजपा शासित राज्यों में यह राज्य शक्ति और कानून व्यवस्था के प्रदर्शन के रूप में इस्तेमाल हुआ है.
बंगाल में भी इसकी मौजूदगी केवल अतिक्रमण विरोधी कार्रवाई का संकेत नहीं थी. यह उस नई राजनीतिक भाषा का हिस्सा था जिसमें कानून, व्यवस्था और सांस्कृतिक पहचान को एक साथ जोड़ा जा रहा था. सोशल मीडिया पर कई लोगों ने इस कार्रवाई का स्वागत किया और इसे राजनीतिक परिवर्तन का प्रतीक बताया.
जब वास्तविक शिकायतों को मिला धार्मिक स्वर
भाजपा की सफलता को केवल धार्मिक ध्रुवीकरण के नजरिए से नहीं देखा जा सकता. तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ जनता की नाराज़गी वास्तविक थी. स्कूल सर्विस कमीशन भर्ती घोटाला, भ्रष्टाचार के आरोप, शिक्षक नियुक्तियों का रद्द होना और आरजी कर मेडिकल कॉलेज में महिला डॉक्टर के साथ हुई भयावह घटना ने सरकार की छवि को गहरा नुकसान पहुंचाया.
इन घटनाओं ने बड़ी संख्या में युवाओं, महिलाओं और मध्यवर्गीय मतदाताओं को राज्य सरकार के खिलाफ खड़ा किया. कई सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि 2021 के बाद बंगाल के प्रमुख जन आंदोलन केंद्र सरकार के बजाय राज्य सरकार के खिलाफ केंद्रित हो गए थे. इससे सत्ता-विरोधी भावना लगातार मजबूत होती गई.
लेकिन भाजपा की असली सफलता इस बात में थी कि उसने इन शिकायतों को एक बड़े वैचारिक ढांचे में समेट दिया. भ्रष्टाचार और प्रशासनिक विफलता के खिलाफ गुस्से को हिंदू अस्मिता और सांस्कृतिक असुरक्षा से जोड़ दिया गया.
कैसे ‘जय श्री राम’ एक राजनीतिक पहचान बन गया
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि बंगाल में "जय श्री राम" अब केवल धार्मिक उद्घोष नहीं रह गया है. यह एक राजनीतिक पहचान बन चुका है. भाजपा ने यह धारणा मजबूत की कि बंगाल के हिंदुओं को अपनी सांस्कृतिक पहचान खुलकर व्यक्त करने के लिए राजनीतिक संरक्षण की जरूरत है.
सोशल मीडिया, व्हाट्सऐप समूहों और सार्वजनिक कार्यक्रमों के जरिए यह संदेश लगातार फैलाया गया. धीरे-धीरे "जय श्री राम" का नारा धार्मिक आस्था से आगे बढ़कर राजनीतिक और सांस्कृतिक आत्म-पहचान का माध्यम बन गया.
विश्लेषकों के अनुसार भाजपा ने हिंदू पहचान को राज्य की राजनीति में प्रमुख राजनीतिक शक्ति के रूप में स्थापित करने की कोशिश की और बड़ी संख्या में मतदाताओं ने इसे स्वीकार भी किया.
बंगाल की धर्मनिरपेक्षता का मिथक और दबा हुआ सांप्रदायिक इतिहास
बंगाल को लंबे समय से धर्मनिरपेक्ष और प्रगतिशील राजनीति के गढ़ के रूप में देखा जाता रहा है. लेकिन इतिहासकारों का कहना है कि यह तस्वीर पूरी नहीं है. विभाजन, शरणार्थी संकट और बीसवीं सदी के सांप्रदायिक संघर्षों ने बंगाल के समाज पर गहरे प्रभाव छोड़े थे.
वामपंथी राजनीति ने लंबे समय तक इन तनावों को वर्ग संघर्ष और सामाजिक न्याय की राजनीति के भीतर समाहित रखा. लेकिन इसका मतलब यह नहीं था कि पहचान आधारित राजनीति पूरी तरह खत्म हो गई थी. समय के साथ वे भावनाएं फिर से उभरने लगीं और भाजपा ने उन्हें राजनीतिक रूप दिया.
शहरी मध्यवर्ग और हिंदुत्व की नई राजनीति
भाजपा की रणनीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा शहरी मध्यवर्ग था. बेरोजगारी, आर्थिक ठहराव और भ्रष्टाचार से नाराज़ मध्यम वर्ग के एक हिस्से ने भाजपा को बदलाव के विकल्प के रूप में देखना शुरू किया.
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि व्हाट्सऐप समूहों, सोशल मीडिया प्रभावकों और डिजिटल अभियानों ने इस प्रक्रिया में बड़ी भूमिका निभाई. निजी बातचीत में मौजूद पूर्वाग्रह और असंतोष धीरे-धीरे सार्वजनिक राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन गए.
इस दौरान तृणमूल कांग्रेस भी धार्मिक प्रतीकों का इस्तेमाल करती दिखाई दी, लेकिन आलोचकों का मानना है कि इससे भाजपा को ही फायदा हुआ क्योंकि धार्मिक पहचान की राजनीति भाजपा के लिए अधिक स्वाभाविक राजनीतिक क्षेत्र थी.
जब भाजपा ने ममता बनर्जी को ‘हिंदू-विरोधी’ बताया
भाजपा ने लगातार यह आरोप लगाया कि तृणमूल कांग्रेस अल्पसंख्यक तुष्टिकरण की राजनीति करती है. दुर्गा पूजा विसर्जन और मुहर्रम जुलूसों को लेकर पुराने विवादों को बार-बार चुनावी बहस का हिस्सा बनाया गया.
यह तब भी हुआ जब ममता बनर्जी के शासनकाल में दुर्गा पूजा को बड़े पैमाने पर सरकारी समर्थन मिला और उसे अंतरराष्ट्रीय पहचान भी प्राप्त हुई. इसके बावजूद भाजपा यह धारणा बनाने में सफल रही कि बंगाल के हिंदुओं की सांस्कृतिक भावनाओं की उपेक्षा की जा रही है.
आगे का रास्ता
पश्चिम बंगाल का चुनाव एक महत्वपूर्ण राजनीतिक सवाल छोड़ गया है. जनता ने भ्रष्टाचार, घोटालों और प्रशासनिक विफलताओं के खिलाफ वोट दिया, लेकिन जिस राजनीतिक माध्यम से यह बदलाव आया, उसने धार्मिक पहचान को राजनीति के केंद्र में ला दिया.
भाजपा की जीत केवल एक चुनावी सफलता नहीं है. यह इस बात का भी संकेत है कि सत्ता-विरोधी भावना को किस तरह सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान के साथ जोड़कर एक व्यापक राजनीतिक आंदोलन में बदला जा सकता है. आने वाले वर्षों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि यह बदलाव बेहतर शासन और जवाबदेही की ओर ले जाता है या फिर बंगाल की राजनीति को और अधिक ध्रुवीकृत करता है.

