मोदी क्यों जीतते हैं इतने सारे विदेशी पुरस्कार; कूटनीति के लिए नहीं खुद की छवि चमकाने का साधन 

‘अलजज़ीरा’ में सारा शमीम की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश यात्राओं के दौरान मिलने वाले अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों की श्रृंखला और उनकी प्रासंगिकता पर केंद्रित यह रिपोर्ट कूटनीति बनाम व्यक्तिगत छवि निर्माण के मुद्दे को उठाती है. पिछले 12 वर्षों के कार्यकाल में प्रधानमंत्री मोदी को 30 से अधिक वैश्विक सम्मान मिल चुके हैं, जिनमें से कई पुरस्कार विशेष रूप से केवल उनके लिए ही तैयार किए गए थे.

ताजा विवाद जून के अंत में हुई सेशेल्स यात्रा के दौरान सामने आया, जब राष्ट्रपति पैट्रिक हर्मिनी ने मोदी को देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान प्रदान किया. इस पुरस्कार को मोदी के आगमन से कुछ ही दिन पहले मंजूरी दी गई थी. विवाद तब बढ़ा जब इस पुरस्कार के प्रमाण पत्र में वर्तनी की गलतियाँ पाई गईं.

इस घटना पर प्रतिक्रिया देते हुए यूनाइटेड किंगडम की प्रोफेसर निताशा कौल ने इसे "जल्दबाजी में किया गया काम" बताया, जिसने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उपहास को आमंत्रित किया. कांग्रेस नेता सुप्रिया श्रीनेत सहित विपक्षी राजनेताओं ने भी तीखा तंज कसते हुए कहा कि दुनिया मोदी की पुरस्कारों के प्रति रुचि को समझ चुकी है.

शमीम की इस रिपोर्ट में मोदी को मिले कई अन्य प्रमुख पुरस्कारों का भी उल्लेख है: मसलन, इंडोनेशिया का सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'बितांग आदिपूर्णा' और स्लोवाक रिपब्लिक का 'ऑर्डर ऑफ द व्हाइट डबल क्रॉस, फर्स्ट क्लास'. इज़राइल का 'स्पीकर ऑफ द नेसेट मेडल' (जो उनकी यात्रा से ठीक पहले बनाया गया था).

संयुक्त राष्ट्र का 'चैंपियंस ऑफ द अर्थ' (2018), बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन का 'ग्लोबल गोलकीपर अवार्ड' (2019) और वर्ल्ड मार्केटिंग समिट का एकमात्र 'फिलिप कोटलर प्रेसिडेंशियल अवार्ड' (2019).

कूटनीतिक लाभ बनाम व्यक्तिगत छवि पर विशेषज्ञों की राय

इन सम्मानों को ग्रहण करते हुए प्रधानमंत्री हमेशा यह कहते हैं कि यह उनके बजाय पूरे भारत का सम्मान है. समर्थक इसे दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के बढ़ते वैश्विक प्रभाव और नई दिल्ली को खुश रखने की अन्य देशों की इच्छा के रूप में देखते हैं.

इसके विपरीत, विशेषज्ञ इसके वास्तविक कूटनीतिक मूल्य पर संदेह जताते हैं. ऑस्ट्रेलिया के प्रोफेसर इयान हॉल का मानना है कि इनसे देश को कोई सीधा आर्थिक या राजनयिक लाभ नहीं दिखता; बल्कि यह दर्शाता है कि प्रधानमंत्री का ध्यान व्यावहारिक कार्रवाइयों पर कम है. वहीं, प्रोफेसर कौल का स्पष्ट आरोप है कि ये पुरस्कार भारत की कूटनीति के लिए नहीं, बल्कि मोदी की व्यक्तिगत "शक्तिशाली नेता" वाली छवि और मिथक को मजबूत करने के साधन मात्र हैं.

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