चुनिंदा जनाक्रोश कैसे हिरासत में मौतों पर राज्य की जवाबदेही को कमजोर करता है

अनुप सुरेंद्रनाथ और सानिया रिज़वान के मुताबिक, भारत में पुलिस हिरासत में होने वाली मौतें कोई नई बात नहीं हैं, लेकिन हर घटना पर जनता की प्रतिक्रिया एक जैसी नहीं होती. कई मामलों में लोग चुप रहते हैं, जबकि कुछ मामलों में व्यापक विरोध देखने को मिलता है. तर्क यह है कि यह अंतर इस बात से तय होता है कि समाज पीड़ित या आरोपी को किस नजर से देखता है. यही चुनिंदा जनाक्रोश कई बार राज्य की जवाबदेही तय करने के बजाय उसकी दंडमुक्ति को और मजबूत कर देता है.

लेख में दो प्रमुख घटनाओं की तुलना की गई है. पहली घटना जून 2020 की है, जब तमिलनाडु के सथानकुलम में लॉकडाउन नियमों के कथित उल्लंघन के आरोप में गिरफ्तार किए गए पिता-पुत्र, जेयराज और बेनिक्स, पुलिस हिरासत में कथित यातनाओं के बाद मारे गए. इस घटना ने पूरे देश में गुस्सा पैदा किया. मद्रास हाईकोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया, मामले की निगरानी की और अपेक्षाकृत कम समय में मुकदमे की सुनवाई पूरी हुई. यह मामला इसलिए अलग माना गया क्योंकि पुलिस हिंसा के खिलाफ बड़े पैमाने पर सार्वजनिक प्रतिक्रिया सामने आई.

दूसरी ओर, नवंबर 2019 में हैदराबाद में एक महिला डॉक्टर से दुष्कर्म और हत्या के आरोपियों को पुलिस ने मुठभेड़ में मार गिराया. पुलिस ने दावा किया कि आरोपी हथियार छीनकर भागने की कोशिश कर रहे थे. इस कार्रवाई का देशभर में बड़े पैमाने पर स्वागत हुआ. लोगों ने पुलिस पर फूल बरसाए और इसे त्वरित न्याय बताया. बाद में सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित न्यायमूर्ति वी.एस. सिरपुरकर आयोग ने कहा कि यह मुठभेड़ फर्जी प्रतीत होती है और संबंधित पुलिसकर्मियों पर हत्या का मुकदमा चलना चाहिए. इसके बावजूद कानूनी कार्रवाई आगे नहीं बढ़ सकी.

दोनों मामलों में जनता की प्रतिक्रिया अपराध और अपराधियों को लेकर बनी सामाजिक धारणाओं से प्रभावित दिखाई देती है. जेयराज और बेनिक्स को निर्दोष, सामान्य नागरिक के रूप में देखा गया, इसलिए उनके साथ हुई पुलिस हिंसा ने लोगों को झकझोर दिया. वहीं हैदराबाद के आरोपियों को ऐसे अपराधी माना गया जिनके प्रति कठोर हिंसा को समाज ने स्वीकार कर लिया. इस सोच ने पुलिस की गैरकानूनी कार्रवाई को भी वैधता दे दी.

यह भी रेखांकित किया गया है कि भारत में हिरासत में हिंसा के अधिकांश मामलों पर जनता की चुप्पी बनी रहती है. हाल के वर्षों में कई अन्य मामलों में भी हिरासत में यातना के आरोप लगे, लेकिन उन पर व्यापक विरोध नहीं हुआ. इससे स्पष्ट होता है कि समाज पुलिस हिंसा का विरोध किसी सिद्धांत के आधार पर नहीं करता, बल्कि पीड़ित की छवि और अपराध की प्रकृति के आधार पर अपनी प्रतिक्रिया तय करता है.

इस दृष्टिकोण के अनुसार, इस तरह का जनाक्रोश राज्य को अपनी व्यवस्था सुधारने के लिए मजबूर नहीं करता. राज्य कुछ चर्चित मामलों में कार्रवाई करके यह संदेश देता है कि वह न्याय के पक्ष में है, लेकिन पुलिस की जवाबदेही बढ़ाने, हिरासत में हिंसा रोकने या अपनी असाधारण शक्तियों की समीक्षा करने जैसे संरचनात्मक सुधारों से बचता रहता है.

लेख का निष्कर्ष है कि जब जनता का आक्रोश सिद्धांतों के बजाय भावनाओं और सामाजिक धारणाओं पर आधारित होता है, तब वह लोकतांत्रिक जवाबदेही का माध्यम बनने के बजाय राज्य की शक्ति को और मजबूत कर सकता है. हिरासत में हिंसा को रोकने के लिए हर मामले में समान कानूनी मानकों और संस्थागत सुधारों की जरूरत है, न कि केवल चुनिंदा घटनाओं पर उभरने वाले भावनात्मक विरोध की.

यह लेख अनुप सुरेंद्रनाथ और सानिया रिज़वान के अंग्रेजी लेख का हिंदी में अनुदित अंश है.

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