अपूर्वानंद | सत्यनिकेतन हादसा छात्रों की उपेक्षा और व्यवस्था की विफलता का प्रतीक क्यों है?

‘हरकारा डीप डाइव’ के इस एपिसोड में निधीश त्यागी ने प्रोफेसर अपूर्वानंद के साथ दिल्ली के दक्षिण परिसर के पास सत्यनिकेतन में इमारत गिरने से हुई छात्रों की मौत पर चर्चा की. 6 दिसंबर को हुई इस घटना ने न केवल भवनों की सुरक्षा, बल्कि देश के विश्वविद्यालयों में छात्रों की स्थिति, उनके रहने की व्यवस्था और सरकारी जवाबदेही पर भी गंभीर सवाल खड़े किए हैं.

प्रोफेसर अपूर्वानंद के अनुसार, सत्यनिकेतन में इमारत का ढहना एक रूपक की तरह है. इसके मलबे में दबे छात्र उस व्यवस्था का प्रतीक हैं, जिसमें नागरिकों की सुरक्षा और सम्मान को लगातार नजरअंदाज किया जा रहा है. हादसे के बाद कई घंटों तक एंबुलेंस और जेसीबी के नहीं पहुंचने तथा लोगों द्वारा अपने हाथों से मलबा हटाने की बात इस व्यवस्था की असंवेदनशीलता को उजागर करती है. उनका कहना है कि जिस तंत्र की दक्षता मकानों और मस्जिदों को गिराने में दिखाई देती है, वही लोगों को बचाने के मामले में निष्क्रिय नजर आता है.

सत्यनिकेतन और दिल्ली विश्वविद्यालय के आसपास का इलाका छात्रों के लिए बेहद महंगा है. दक्षिण परिसर के मोतीलाल नेहरू कॉलेज, रामलाल आनंद कॉलेज, वेंकटेश्वर कॉलेज और अन्य संस्थानों में पढ़ने वाले हजारों छात्रों के लिए विश्वविद्यालयों के पास पर्याप्त आवास उपलब्ध नहीं हैं. इसके कारण निजी मकान मालिक कम जगह में अधिक छात्रों को ठूंसकर अधिक किराया कमाने की कोशिश करते हैं. कई इमारतों में सुरक्षा मानकों का पालन किए बिना मंजिल पर मंजिल बनाई जाती है. जांच और निरीक्षण करने वाले अधिकारी भी कथित तौर पर रिश्वत या स्थानीय मिलीभगत के कारण अपनी जिम्मेदारी से बचते हैं.

अपूर्वानंद का कहना है कि छात्रों को देश का भविष्य और डेमोग्राफिक डिविडेंड कहा जाता है, लेकिन उनके साथ व्यवहार सबसे अधिक लापरवाही और उपेक्षा वाला है. दूर-दराज के राज्यों से दिल्ली आने वाले छात्र अपने परिवारों की आर्थिक क्षमता से अधिक खर्च करके पढ़ाई करते हैं. उन्हें रहने के लिए असुरक्षित कमरे, महंगे किराए, अंधेरी सीढ़ियां और बुनियादी सुविधाओं से वंचित वातावरण मिलता है. कई छात्र इन परिस्थितियों के कारण पढ़ाई छोड़कर वापस लौट जाते हैं.

उनके अनुसार, विश्वविद्यालय लगातार नए कोर्स और सीटें बढ़ा रहे हैं, लेकिन यह नहीं सोच रहे कि छात्र रहेंगे कहां, पढ़ेंगे कैसे और उनके लिए पर्याप्त कक्षाएं, पुस्तकालय तथा बैठने की जगह कैसे उपलब्ध होगी. नई शिक्षा नीति में भी छात्रों के आवास की समस्या को प्राथमिकता नहीं दी गई है. विश्वविद्यालय किराए पर इमारत लेकर सस्ते हॉस्टल बना सकते हैं, लेकिन इस दिशा में गंभीर प्रयास नहीं किए गए हैं.

अपूर्वानंद ने कहा कि हादसे के बाद केवल अधिकारियों को डांटने से काम नहीं चलेगा. नगर निगम, दिल्ली सरकार, उपराज्यपाल और विश्वविद्यालय प्रशासन को जवाबदेह बनाना होगा. हर भवन का नियमित निरीक्षण, फायर सेफ्टी मानकों का पालन और छात्रों के लिए वैकल्पिक आवास की व्यवस्था जरूरी है. यदि अब भी ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो सत्यनिकेतन जैसी घटनाएं दोहराती रहेंगी और हर बार व्यवस्था केवल शोक और आश्चर्य व्यक्त करती रह जाएगी.

पूरी बातचीत यहां सुन सकते हैं.

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