मां का नाम काफी है, फिर भी सरकारी फॉर्म क्यों मांगते हैं पिता का नाम?
‘आर्टिकल 14’ में प्रीति सिंह की रिपोर्ट है कि भारत में हर साल हजारों एकल माताएं सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने को मजबूर होती हैं. वजह सिर्फ एक कॉलम होता है - “पिता का नाम”. जब वे इसे खाली छोड़ती हैं या बताती हैं कि बच्चे के जीवन में पिता मौजूद नहीं हैं, तब शुरू होती है पूछताछ, देरी, अपमान और बार-बार दस्तावेज जमा करने की प्रक्रिया.
देश की अदालतें पिछले एक दशक से साफ कह रही हैं कि बच्चे की कानूनी पहचान के लिए पिता का नाम अनिवार्य नहीं है. फिर भी सरकारी फॉर्म और प्रशासनिक व्यवस्था अब तक पुराने सामाजिक ढांचे से बाहर नहीं निकल पाए हैं.
साल 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने एबीसी बनाम स्टेट (एनसीटी ऑफ दिल्ली) मामले में फैसला दिया था कि अविवाहित मां अपने बच्चे की अकेली कानूनी अभिभावक हो सकती है और उसे पिता की पहचान बताने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता. अदालत ने इसे महिला की निजता, गरिमा और समानता के अधिकार से जोड़ा था.
फरवरी 2026 में बॉम्बे हाई कोर्ट ने भी इसी सोच को आगे बढ़ाते हुए कहा कि केवल मां के साथ रहने वाले बच्चे पर अनुपस्थित पिता का नाम, उपनाम या जाति थोपना गलत है. अदालत ने स्कूल रिकॉर्ड में बदलाव का आदेश दिया.
कानून आगे बढ़ चुका है, लेकिन सरकारी फॉर्म अब भी वहीं खड़े हैं.
देश में लाखों महिलाएं अकेले बच्चों का पालन-पोषण कर रही हैं. संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में 2019 तक 1.3 करोड़ से अधिक एकल माताओं वाले परिवार थे. इनमें से बड़ी संख्या आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग से आती है. ऐसे परिवारों के लिए हर अतिरिक्त सरकारी चक्कर का मतलब होता है मजदूरी का नुकसान, समय की बर्बादी और मानसिक तनाव.
समस्या यह है कि भारत में ऐसा कोई एक कानून नहीं है जो हर दस्तावेज में पिता का नाम अनिवार्य बनाता हो. लेकिन व्यवहार में लगभग हर जरूरी दस्तावेज इसी मांग पर आधारित है. पैन कार्ड आवेदन फॉर्म में पिता का नाम प्रमुख कॉलम है. पासपोर्ट नियमों में बदलाव होने के बावजूद कई पासपोर्ट सेवा केंद्र अब भी अनौपचारिक रूप से पिता का नाम पूछते हैं. स्कूल एडमिशन फॉर्म, बोर्ड परीक्षा रजिस्ट्रेशन, बैंक खाते और संपत्ति दस्तावेजों में भी पिता की पहचान को प्राथमिक माना जाता है.
जन्म प्रमाणपत्रों में भी यही स्थिति लंबे समय तक बनी रही. 2021 में केरल हाई कोर्ट ने आईवीएफ के जरिए मां बनी एक महिला के मामले में कहा था कि पिता का नाम मांगना महिला के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है. अदालत ने राज्य सरकार को अलग फॉर्म बनाने का निर्देश दिया था.
लेकिन जमीनी हकीकत अब भी नहीं बदली है. अधिकांश महिलाएं अदालत नहीं पहुंच पातीं. वे चुपचाप सरकारी दफ्तरों की कठिन प्रक्रिया झेलती रहती हैं. कई बार स्कूल एडमिशन रुक जाता है. कई बार छात्रवृत्ति आवेदन अटक जाता है. कहीं राशन कार्ड नहीं बनता, तो कहीं स्वास्थ्य योजना का लाभ नहीं मिलता.
बॉम्बे हाई कोर्ट के हालिया मामले में एक दुष्कर्म पीड़िता की 12 वर्षीय बेटी के स्कूल रिकॉर्ड में आरोपी पिता का नाम दर्ज था. मां को बच्ची की कस्टडी मिल चुकी थी, फिर भी स्कूल ने रिकॉर्ड बदलने से इनकार कर दिया. आखिरकार अदालत को हस्तक्षेप करना पड़ा.
यह सिर्फ एक प्रशासनिक समस्या नहीं है. यह उस सोच का प्रतिबिंब है जिसमें अब भी परिवार की पहचान पिता से तय मानी जाती है. जबकि अदालतें स्पष्ट कर चुकी हैं कि मां अपने आप में पूर्ण कानूनी पहचान रखती है.
महाराष्ट्र ने 2024 में कुछ दस्तावेजों में मां के नाम को प्राथमिक पहचान के रूप में स्वीकार करने की पहल की है. लेकिन यह बदलाव अभी सीमित है. केंद्र सरकार के अधिकांश फॉर्म आज भी पुराने ढांचे पर आधारित हैं.
असल सवाल सिर्फ एक कॉलम का नहीं है. सवाल यह है कि क्या राज्य उन परिवारों को बराबरी से स्वीकार करता है जिनकी संरचना पारंपरिक ढांचे से अलग है.
जब तक सरकारी फॉर्म नहीं बदलते, तब तक हर एकल मां को बार-बार यह साबित करना पड़ेगा कि उसका परिवार भी उतना ही वास्तविक है जितना किसी और का.

