टीवीके की जीत का ‘वार रूम’: कैसे तैयार हुई विजय की चुनावी पटकथा

‘वॉइस ऑफ कॉमन्स’ का दफ्तर बना चुनावी कमांड सेंटर

‘द न्यू इंडियन एक्सप्रेस’ के मुताबिक,चेन्नई स्थित “वॉइस ऑफ कॉमन्स” ऑफिस में दाखिल होते ही दीवार पर लिखा एक वाक्य नजर आता है. “अगर आप राजनीति में हस्तक्षेप नहीं करेंगे, तो राजनीति आपके जीवन में हस्तक्षेप करेगी।” ऑफिस की दीवारों पर पेरियार, आंबेडकर, गांधी, भगत सिंह, मार्टिन लूथर किंग जूनियर, कार्ल मार्क्स और चे ग्वेरा जैसे नेताओं की तस्वीरें लगी थीं. सामने संविधान की प्रस्तावना टंगी हुई थी. लेकिन इस वैचारिक माहौल के पीछे एक बेहद संगठित राजनीतिक मशीन काम कर रही थी.

ऑफिस के अंदर पीले और मैरून रंग के वर्कस्टेशन लगे थे, जो टीवीके के रंग माने जाते हैं. दीवार पर विजय का बड़ा कटआउट लगा था. फोन लगातार बज रहे थे, कुछ लोग स्क्रीन पर नजर गड़ाए बैठे थे, जबकि कई लोग घंटों फोन पर बातचीत कर रहे थे. पहली नजर में यह किसी सोशल मीडिया एजेंसी जैसा दिख सकता था, लेकिन वास्तव में यही टीवीके का मुख्य ‘वार रूम’ था.

इस पूरी व्यवस्था की कमान आधव अर्जुना के नेतृत्व वाली “वॉइस ऑफ कॉमन्स” टीम के पास थी. मुख्य रणनीतिकार कपिल साहू थे, जिनके साथ लगभग 40 लोगों की टीम काम कर रही थी. इनमें फील्ड रिसर्चर, ग्राउंड एनालिस्ट, घोस्ट राइटर्स और सोशल मीडिया रणनीतिकार शामिल थे. टीम में ज्यादातर जेन-ज़ी युवा थे, जिनका राजनीति में कोई पुराना अनुभव नहीं था.

द्रविड़ दलों के भीतर असंतोष तलाशने से शुरू हुई रणनीति

टीवीके की रणनीति जून 2025 से शुरू हुई. टीम ने तमिलनाडु की सभी 234 विधानसभा सीटों पर रिसर्च शुरू की. उनका मकसद सिर्फ वोटरों के बीच माहौल समझना नहीं था, बल्कि डीएमके और एआईएडीएमके के भीतर मौजूद नाराजगी को पहचानना भी था.

रणनीतिकारों के मुताबिक, ऊपर से देखने पर ऐसा लग रहा था कि सरकार के खिलाफ कोई खास एंटी-इंकम्बेंसी नहीं है, लेकिन अंदरूनी स्तर पर गहरा असंतोष मौजूद था. इसी भावना को टीवीके ने पकड़ने की कोशिश की.

फील्ड टीमों ने हर सीट पर जाकर स्थानीय गुटबाजी, संभावित उम्मीदवारों, मौजूदा विधायकों की छवि और पार्टी के भीतर के संघर्षों की जानकारी जुटाई. डीएमके और एआईएडीएमके के नाराज कार्यकर्ता खुद आगे बढ़कर जानकारी देने लगे. कई असंतुष्ट नेता बाद में टीवीके के साथ जुड़ गए.

थिरुवेरुम्बुर में नवलपट्टू विजी, जो कभी पूर्व मंत्री अनबिल महेश पोय्यामोझी के करीबी माने जाते थे, उन्हें ऐसे नेता के रूप में पहचाना गया जो अपने पुराने सहयोगी को हराना चाहते थे. कोलाथुर में पूर्व डीएमके विधायक वीएस बाबू भी इसी प्रक्रिया के जरिए टीवीके के संपर्क में आए. इसी तरह कई अन्य नेता भी धीरे-धीरे पार्टी से जुड़े.

जातीय समीकरणों के आधार पर उम्मीदवार चयन

टीवीके ने उम्मीदवार चयन में जातीय समीकरणों को बहुत गंभीरता से लिया. पार्टी ने 37 वन्नियार, 25 मुक्कुलथोर, 12 मुस्लिम और 10 ईसाई उम्मीदवार उतारे, जिनमें दक्षिण तमिलनाडु के पांच ईसाई नाडार उम्मीदवार भी शामिल थे.

रणनीतिकारों का कहना था कि पार्टी ने जातीय संतुलन बनाए रखने की कोशिश की, लेकिन सामान्य सीटों पर दलित उम्मीदवार उतारने से परहेज किया गया. उनका मानना था कि चुनावी गणित के लिहाज से यह जोखिम भरा फैसला हो सकता था.

टीवीके के 120 जिला सचिवों में कम से कम 16 दलित थे. इनमें सेंट्रल चेन्नई (वेस्ट) के एएस पझानी, तिरुवल्लूर के के मणिकंदन और तिरुपथुर के नवीन कुमार जैसे नेता शामिल थे, लेकिन उन्हें टिकट नहीं मिला.

उम्मीदवारों के चयन में जाति के अलावा राजनीतिक प्रभाव और आर्थिक क्षमता को भी ध्यान में रखा गया. अंतिम फैसला विजय लेते थे, लेकिन आधव अर्जुना, एन आनंद और केए सेंगोट्टैयन जैसे नेताओं की भी अहम भूमिका थी.

स्थानीय कारोबारी नेटवर्क ने किया समर्थन

टीवीके को स्थानीय स्तर पर व्यापारिक समुदायों का भी समर्थन मिला. कई ऐसे कारोबारी, जो कथित तौर पर द्रविड़ दलों के शासन से नाराज थे, उन्होंने चुनाव अभियान में मदद की.

कल्लाकुरिची में एक निजी स्कूल ने टीवीके उम्मीदवार सी अरुल विग्नेश को लॉजिस्टिक सपोर्ट दिया. इसके अलावा होटल मालिकों, कपड़ा व्यापारियों, गारमेंट कारोबारियों और स्कूल-कॉलेज संचालकों ने भी स्थानीय स्तर पर पार्टी की मदद की.

2021 में डीएमके के लिए काम कर चुके कुछ लेखक और राजनीतिक रणनीतिकार भी बाद में टीवीके से जुड़ गए. पार्टी ने कुछ स्वतंत्र सामाजिक कार्यकर्ताओं को भी उम्मीदवार बनाया.

सोशल मीडिया और ‘घोस्ट राइटिंग’ पर खास फोकस

टीवीके की सोशल मीडिया रणनीति जॉन अरोकियासामी की टीम संभाल रही थी. पार्टी नहीं चाहती थी कि पारंपरिक आईटी विंग सीधे कंटेंट तैयार करे. इसके बजाय, जॉन की टीम पहले नैरेटिव तय करती थी, फिर उसे सोशल मीडिया नेटवर्क के जरिए फैलाया जाता था.

सूत्रों के मुताबिक, विजय के भाषणों की भाषा, टोन और अवधि तक जॉन की टीम तय करती थी. घोस्ट राइटर्स की मदद से भाषण तैयार किए जाते थे, जिनमें विजय के इनपुट भी शामिल रहते थे.

कम विजय, ज्यादा क्रेज

टीवीके की सबसे चर्चित रणनीति थी — “कम विजय, ज्यादा क्रेज.” पार्टी ने जानबूझकर विजय की सार्वजनिक मौजूदगी सीमित रखी. कई जगह प्रशासन से अनुमति मिलने के बावजूद रैलियां रद्द कर दी गईं.

रणनीतिकारों का मानना था कि विजय की सीमित मौजूदगी ने लोगों के बीच उत्सुकता और आकर्षण दोनों बढ़ाए. साथ ही विरोधी दल, मीडिया और राजनीतिक विश्लेषक लगातार यह मानते रहे कि विजय राजनीति को गंभीरता से नहीं समझते. टीवीके टीम का कहना था कि यही धारणा उनके पक्ष में गई.

करूर हादसे के बाद सुरक्षा को लेकर भी अतिरिक्त सावधानी बरती गई. जेंटूर सिक्योरिटी सर्विसेज के प्रमुख नयीम मूसा अंतिम फैसला लेते थे कि विजय को किसी कार्यक्रम में जाना है या नहीं. टीम के मुताबिक, अगर नयीम ‘ना’ कहते थे, तो विजय भी फैसला नहीं बदलते थे.

करूर का झटका

सितंबर 2025 में करूर में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान भगदड़ मच गई, जिसमें 41 लोगों की मौत हो गई. यह टीवीके के लिए सबसे बड़ा राजनीतिक संकट था और माना जा रहा था कि इससे पार्टी की छवि को भारी नुकसान होगा.

लेकिन पार्टी की टीम ने तुरंत डैमेज कंट्रोल शुरू किया. कार्यकर्ताओं को पीड़ित परिवारों से संपर्क करने और उनकी प्रतिक्रियाएं रिकॉर्ड करने के लिए कहा गया. टीम का दावा था कि हादसे के बाद भी परिवारों में विजय के प्रति गुस्से की बजाय सहानुभूति दिखाई दी.

सोशल मीडिया पर नकारात्मक माहौल को संभालने में विजय के करीबी सहयोगी जगदीश पलानीस्वामी की अहम भूमिका बताई गई. वह लंबे समय से विजय की फिल्मों और पीआर नेटवर्क से जुड़े रहे हैं.

वे लोग जिन्हें जीत पर भरोसा था

टीवीके की जीत पर सबसे ज्यादा भरोसा विजय, आधव अर्जुना और जॉन अरोकियासामी को था. रणनीतिकारों के मुताबिक, बाहर की दुनिया टीवीके की जीत की संभावना को गंभीरता से नहीं ले रही थी, लेकिन पार्टी के अंदर नेतृत्व को पूरा विश्वास था कि वे सरकार बना सकते हैं.

टीम के लोगों का कहना है कि विजय साल भर में कम से कम पांच बार VoC ऑफिस गए. वहां वे सिर्फ बड़े नेताओं से नहीं, बल्कि छोटे कर्मचारियों और युवा कार्यकर्ताओं से भी व्यक्तिगत तौर पर मिलते थे.

एक रणनीतिकार के मुताबिक, विजय ऑफिस से निकलते समय हर व्यक्ति को अलविदा कहना नहीं भूलते थे. अगर कभी किसी से बात छूट जाती, तो अगली बार मिलने पर वह खुद मुस्कुराकर उससे बात करते थे.

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