चीन पर मोदी सरकार की थोपी गई चुप्पी: गलवान संघर्ष पर एक और बॉलीवुड फिल्म ठंडे बस्ते में गई

‘द वायर’ के मुताबिक, जून 2020 में पूर्वी लद्दाख की गलवान घाटी में भारत और चीन की सेनाओं के बीच हुई हिंसक झड़प ने पूरे देश को झकझोर दिया था. इस संघर्ष में कर्नल बी. संतोष बाबू समेत 20 भारतीय सैनिक मारे गए थे. सरकार ने इसे भारतीय सेना की बहादुरी और “मुंहतोड़ जवाब” के रूप में पेश किया. लेकिन छह साल बाद भी देश उस लड़ाई की पूरी कहानी बड़े पर्दे पर नहीं देख पा रहा है.

अब खबरें सामने आ रही हैं कि मोदी सरकार और रक्षा प्रतिष्ठान गलवान संघर्ष पर बनने वाली फिल्मों को या तो रोक रहे हैं या उनकी कहानी बदलवा रहे हैं, ताकि चीन को सीधे तौर पर आक्रामक न दिखाया जाए.

‘द लायन ऑफ गलवान’ ठंडे बस्ते में

गलवान संघर्ष में शहीद हुए वीर चक्र सम्मानित सिपाही गुरतेज सिंह के जीवन पर आधारित फिल्म ‘द  लायन ऑफ गलवान’  इसका ताजा उदाहरण है. निर्माता हिमालय दसानी और अभिनेता अभिमन्यु दसानी की इस फिल्म को अनिश्चितकाल के लिए रोक दिया गया है.

निर्माता हिमालय दसानी ने मीडिया से बातचीत में कहा कि रक्षा मंत्रालय की तरफ से साफ निर्देश मिला है कि “चाइना-बैशिंग” नहीं होना चाहिए.

उनका सवाल बेहद सीधा था — “अगर हमें रक्षा मंत्रालय से क्लियरेंस ही नहीं मिलेगी और हम गलवान की असली कहानी नहीं दिखा सकते, तो फिर ऐसी फिल्म बनाने का क्या मतलब है?”

यह बयान सिर्फ एक फिल्म की मुश्किल नहीं दिखाता, बल्कि उस व्यापक राजनीतिक माहौल की तरफ इशारा करता है जहां चीन के साथ टकराव की वास्तविक तस्वीर को सार्वजनिक विमर्श से नियंत्रित किया जा रहा है.

सलमान खान की फिल्म भी बदली गई

रिपोर्ट्स के मुताबिक बॉलीवुड अभिनेता सलमान खान की बड़ी युद्ध फिल्म बैटल ऑफ गलवान के साथ भी ऐसा ही हुआ. पहले इसका शीर्षक बदला गया और अब इसे “मातृभूमि:मे वार रेस्ट इन पीस” नाम दिया गया है.

फिल्म की रिलीज टाल दी गई और स्क्रिप्ट में बड़े बदलाव किए गए. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार फिल्म से चीन के प्रत्यक्ष संदर्भ हटाए जा रहे हैं. यहां तक कि “चीन” शब्द की जगह अस्पष्ट संकेतों और सामान्य दुश्मन की भाषा इस्तेमाल करने का दबाव बनाया गया.

बताया जा रहा है कि कई हिस्सों की दोबारा शूटिंग करवाई गई ताकि युद्ध और सैन्य संघर्ष की जगह कहानी को “मानवीय भावनाओं” और पारिवारिक रिश्तों की तरफ मोड़ा जा सके.

राष्ट्रवाद बनाम वास्तविकता

यह पूरा घटनाक्रम उस विरोधाभास को सामने लाता है जिसमें एक तरफ भाजपा सरकार लगातार राष्ट्रीय सुरक्षा और राष्ट्रवाद पर आक्रामक राजनीतिक भाषा इस्तेमाल करती है, लेकिन दूसरी तरफ चीन के साथ टकराव को सांस्कृतिक और सार्वजनिक अभिव्यक्ति में सीमित रखने की कोशिश करती दिखाई देती है.

गलवान संघर्ष के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस बयान पर भी लंबे समय तक विवाद रहा था जिसमें उन्होंने कहा था कि “न कोई हमारी सीमा में घुसा है, न कोई घुसा हुआ है.” विपक्ष ने तब आरोप लगाया था कि सरकार चीन के अतिक्रमण की वास्तविकता को कम करके दिखा रही है.

अब फिल्मों को लेकर सामने आ रही खबरें उसी बहस को फिर जिंदा कर रही हैं.

क्या सिनेमा पर अनौपचारिक सेंसरशिप?

भारत में युद्ध आधारित फिल्मों को अक्सर रक्षा मंत्रालय और सैन्य संस्थानों से तकनीकी सहयोग लेना पड़ता है. इसके लिए स्क्रिप्ट की मंजूरी जरूरी होती है. लेकिन आलोचकों का कहना है कि अब यह प्रक्रिया “राष्ट्रीय सुरक्षा” से आगे बढ़कर राजनीतिक नियंत्रण का माध्यम बनती जा रही है.

फिल्मकारों का आरोप है कि अगर वे गलवान संघर्ष की वास्तविक परिस्थितियां, चीन की भूमिका या सीमा विवाद के राजनीतिक पहलुओं को ईमानदारी से दिखाना चाहें, तो उन्हें अनुमति मिलने में मुश्किल होती है.

यानी सेंसर बोर्ड की औपचारिक सेंसरशिप से पहले ही एक “अनौपचारिक सेंसरशिप” काम कर रही है, जहां फिल्म निर्माता खुद कहानी बदलने को मजबूर हो जाते हैं.

असल सवाल सिर्फ दो फिल्मों का नहीं है. सवाल यह है कि क्या जनता को अपने सैनिकों की वास्तविक कहानी जानने और देखने का अधिकार है?

अगर गलवान जैसे संघर्ष पर बनी फिल्मों में दुश्मन का नाम तक लेने से बचा जाएगा, तो इतिहास धीरे-धीरे एक नियंत्रित कथा में बदल जाएगा. जहां राष्ट्रवाद तो होगा, लेकिन असली राजनीतिक और सैन्य सवाल गायब रहेंगे.

भारत में सिनेमा हमेशा सिर्फ मनोरंजन नहीं रहा. युद्ध, राजनीति और इतिहास को समझने का बड़ा माध्यम भी रहा है. लेकिन अगर सत्ता तय करने लगे कि कौन-सी लड़ाई किस तरह दिखाई जाएगी, तो यह सिर्फ फिल्म उद्योग का संकट नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति का भी सवाल बन जाता है.

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