पंजाब को लेकर भी भाजपा के अरमान जागे
पश्चिम बंगाल, असम और पुडुचेरी जैसे राज्यों में मिली चुनावी सफलताओं ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के हौसलों को नई उड़ान दी है. भाजपा अब पंजाब को एक ऐसे अगले 'डोमिनो' (एक के बाद एक गिरने वाली कड़ी) के रूप में देख रही है, जिसे वह अपने पाले में कर सकती है. इसी रणनीति के तहत पार्टी ने एक बड़ा और साहसिक फैसला लिया है. साल 2027 में होने वाले पंजाब विधानसभा चुनावों में भाजपा किसी बैसाखी के बिना, यानी अकेले चुनाव लड़ेगी.
राघव चड्ढा और बड़ी समस्या: नेता-केंद्रित दलों की संरचनात्मक कमजोरी
आम आदमी पार्टी से राघव चड्ढा का बाहर निकलना महज एक सामान्य राजनीतिक उथल-पुथल नहीं है; यह उन कई व्यक्तित्व-आधारित पार्टियों की एक साझा संरचनात्मक कमजोरी को उजागर करता है—जो तेजी से, करिश्मा-प्रेरित लामबंदी को टिकाऊ संगठन में बदलने की कठिनाई से जुड़ी है. अरविंद केजरीवाल के इर्द-गिर्द बनी 'आप', एक शक्तिशाली भ्रष्टाचार विरोधी विमर्श और कड़ाई से केंद्रीकृत नेतृत्व के दम पर उभरी. यह मॉडल उत्थान के चरण में गति और स्पष्टता तो देता है, लेकिन एक बार जब पार्टी 'आंदोलन' से 'शासन' में परिवर्तित होती है, तो गहरी संस्थागत व्यवस्थाओं की कमी दिखाई देने लगती है. ऐसे सिस्टम में विशिष्ट नेताओं का बाहर निकलना, गुटीय तनाव और आंतरिक अनिश्चितता कोई विसंगतियां नहीं हैं; वे अनुमानित परिणाम हैं.

