पंजाब को लेकर भी भाजपा के अरमान जागे
द हिन्दू में विकास वासुदेव की रिपोर्ट है कि पश्चिम बंगाल, असम और पुडुचेरी जैसे राज्यों में मिली चुनावी सफलताओं ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के हौसलों को नई उड़ान दी है. भाजपा अब पंजाब को एक ऐसे अगले 'डोमिनो' (एक के बाद एक गिरने वाली कड़ी) के रूप में देख रही है, जिसे वह अपने पाले में कर सकती है. इसी रणनीति के तहत पार्टी ने एक बड़ा और साहसिक फैसला लिया है. साल 2027 में होने वाले पंजाब विधानसभा चुनावों में भाजपा किसी बैसाखी के बिना, यानी अकेले चुनाव लड़ेगी.
पंजाब में भाजपा का अस्तित्व देश की आजादी के समय से ही रहा है. हालांकि, चुनावी आंकड़े बताते हैं कि पार्टी यहाँ लंबे समय तक एक सीमित दायरे में रही. 1992 से पहले, जब भाजपा (पूर्व में भारतीय जनसंघ) अकेले चुनाव लड़ती थी, तब उसका औसत वोट शेयर 6% से 7% के बीच रहता था. 1997 में जब पार्टी ने शिरोमणि अकाली दल के साथ गठबंधन किया, तो यह वोट शेयर मामूली बढ़त के साथ 8% तक पहुँचा.
दशकों तक भाजपा पंजाब में अकाली दल की 'जूनियर पार्टनर' बनकर रही. गठबंधन के तहत अकाली दल 94 सीटों पर चुनाव लड़ता था, जबकि भाजपा के हिस्से मात्र 23 सीटें आती थीं. पार्टी के राज्य संगठन का मानना था कि इस व्यवस्था ने भाजपा की वृद्धि को रोक रखा है. 2020 में कृषि कानूनों के विवाद के कारण जब अकाली दल ने एनडीए से नाता तोड़ा, तो भाजपा को अपनी जमीन तलाशने का मौका मिल गया. इसी साल मार्च में अमित शाह ने मोगा की ‘बदलाव रैली’ में अकेले चुनाव लड़ने का बिगुल फूंककर पार्टी के इरादे साफ कर दिए.
पंजाब का राजनीतिक गणित वर्तमान में काफी अस्थिर है. सत्ताधारी आम आदमी पार्टी (आप), जो भारी बहुमत के साथ सत्ता में आई थी, अब आंतरिक कलह से जूझ रही है. अप्रैल में सात राज्यसभा सांसदों के इस्तीफे ने पार्टी की छवि को नुकसान पहुँचाया है. साथ ही, मुख्यमंत्री भगवंत मान पर विधानसभा सत्र के दौरान लगे व्यक्तिगत आरोपों ने विपक्ष को हमला करने का मौका दे दिया है.
दूसरी ओर, मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस भी गुटबाजी का शिकार है. पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी द्वारा दलित प्रतिनिधित्व का मुद्दा उठाने और राहुल गांधी द्वारा राज्य इकाई को 'टीम' की तरह काम करने की नसीहत देने से यह साफ है कि कांग्रेस के भीतर सब कुछ ठीक नहीं है. पुराने साथी शिरोमणि अकाली दल की स्थिति भी फिलहाल कमजोर नजर आ रही है.
भाजपा इस खाली होते राजनीतिक स्थान को भरने के लिए 'सोशल इंजीनियरिंग' का सहारा ले रही है. पंजाब की लगभग 32% आबादी अनुसूचित जाति (एससी) है और 25-30% आबादी ओबीसी है. भाजपा अब इन वर्गों के साथ-साथ सिखों के बीच अपनी पैठ बनाने के लिए केंद्र सरकार द्वारा सिखों के हित में किए गए कार्यों (जैसे करतारपुर कॉरिडोर और साहिबजादों की शहादत को सम्मान) का प्रचार कर रही है.
वर्तमान स्थितियों को देखते हुए पंजाब का चुनावी मुकाबला बहुकोणीय होने जा रहा है. जहाँ भाजपा नए जोश में है, वहीं आप और कांग्रेस अपनी आंतरिक समस्याओं से लड़ रही हैं. ऐसे में भाजपा का ‘मिशन पंजाब’ कितना सफल होता है, यह तो भविष्य ही बताएगा.

