योगेंद्र यादव: पश्चिम बंगाल चुनाव में अल्पसंख्यकों को बाहर करने की साज़िश
इंडियन एक्सप्रेस के ओपिनियन कॉलम में स्वराज इंडिया के सदस्य और भारत जोड़ो अभियान के राष्ट्रीय संयोजक योगेंद्र यादव लिखते हैं कि पिछले 10 महीनों में पश्चिम बंगाल में ‘स्पेशल इम्पेडिमेंट रिमूवल’ (एसआईआर) के तहत बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटाना एक सामान्य बात बन गई है. बंगाल का यह मामला मतदाताओं को मताधिकार से वंचित करने का एक असाधारण उदाहरण है.
‘इन तर्कों को ट्रिब्यूनल के समक्ष रखें’: सुप्रीम कोर्ट का उन लोगों की याचिकाओं पर सुनवाई से इनकार, जिनके नाम बंगाल ‘एसआईआर’ के बाद हटाए
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को पश्चिम बंगाल के कई व्यक्तियों द्वारा दायर उन याचिकाओं पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया, जिनमें मतदाता सूची के 'विशेष गहन पुनरीक्षण' (एसआईआर) के बाद उनके नाम हटाए जाने को चुनौती दी गई थी. इन याचिकाकर्ताओं में चुनाव ड्यूटी पर तैनात 65 लोग भी शामिल हैं. अदालत ने उन्हें संबंधित अपीलीय ट्रिब्यूनल के समक्ष राहत पाने का निर्देश दिया.
भाजपा की योजनाओं पर हिटलर की छाप: बेबी ने ‘एसआईआर’ को हिंदुत्व की बड़ी योजना का हिस्सा बताया
माकपा (सीपीएम) पोलित ब्यूरो सदस्य एम.ए. बेबी का मानना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह जिस तरह से नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए), राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी), जनगणना मूल्यांकन प्रक्रिया, मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) और परिसीमन का उपयोग एक "फासीवादी, बहुसंख्यकवादी हिंदू राष्ट्र" स्थापित करने के लिए कर रहे हैं, उसमें एडोल्फ हिटलर के शासनकाल की छाप दिखाई देती है.
शमशेरगंज एक सैंपल: मतदान से पहले ही ‘एसआईआर’ ने बदला चुनावी समीकरण, भाजपा को वोटिंग से पूर्व लाभ
अपर्णा भट्टाचार्य की रिपोर्ट के अनुसार, सामान्यतः मतदाता सूची से नाम ‘एएसडीडी’ (अनुपस्थित, स्थानांतरित, विस्थापित या मृत) श्रेणी के तहत हटाए जाते हैं. शमशेरगंज में इस प्रक्रिया से केवल 16,836 नाम हटाए गए. विलोपन का सबसे बड़ा कारण ‘विचाराधीन’ (अंडर एडजुडिकेशन) प्रक्रिया रही. इस प्रक्रिया के तहत 1,08,400 मतदाताओं को चिन्हित किया गया, जिनमें से लगभग 68.98% (74,775 लोग) के नाम अंततः काट दिए गए.

