शमशेरगंज एक सैंपल: मतदान से पहले ही ‘एसआईआर’ ने बदला चुनावी समीकरण, भाजपा को वोटिंग से पूर्व लाभ

पश्चिम बंगाल का शमशेरगंज निर्वाचन क्षेत्र, जो पिछले वर्ष सांप्रदायिक हिंसा के कारण सुर्खियों में था, आज एक अभूतपूर्व लोकतांत्रिक विवाद के केंद्र में है. इस विवाद का कारण कोई हिंसा नहीं, बल्कि विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के तहत मतदाता सूची से 91,712 मतदाताओं के नाम हटाया जाना है. यह संख्या निर्वाचन क्षेत्र के कुल मतदाताओं का लगभग 36.27% है, जो पूरे पश्चिम बंगाल में सबसे अधिक है.

अपर्णा भट्टाचार्य की रिपोर्ट के अनुसार, सामान्यतः मतदाता सूची से नाम ‘एएसडीडी’ (अनुपस्थित, स्थानांतरित, विस्थापित या मृत) श्रेणी के तहत हटाए जाते हैं. शमशेरगंज में इस प्रक्रिया से केवल 16,836 नाम हटाए गए. विलोपन का सबसे बड़ा कारण ‘विचाराधीन’ (अंडर एडजुडिकेशन) प्रक्रिया रही. इस प्रक्रिया के तहत 1,08,400 मतदाताओं को चिन्हित किया गया, जिनमें से लगभग 68.98% (74,775 लोग) के नाम अंततः काट दिए गए.

हैरानी की बात यह है कि जब 22 अप्रैल को अपीलीय न्यायाधिकरण की पूरक सूची आई, तो 247 मतदान केंद्रों में से केवल एक व्यक्ति (तृणमूल नेता इंजमुल इस्लाम) का नाम बहाल हुआ. यह दर्शाता है कि सुधार की संस्थागत गुंजाइश लगभग समाप्त कर दी गई थी.

शमशेरगंज एक अत्यधिक मुस्लिम बहुल क्षेत्र है. यहाँ के 247 बूथों में से 207 बूथों में मुस्लिम आबादी 50% से अधिक है. आंकड़ों का विश्लेषण करने पर एक गहरा पक्षपात दिखाई देता है:

  • मुस्लिम बहुल बूथ: जिन बूथों में 50% से अधिक मुस्लिम आबादी है, वहाँ प्रति बूथ औसतन 467 मतदाताओं को ‘विचाराधीन’ श्रेणी में डाला गया.

  • अन्य बूथ: जहाँ मुस्लिम आबादी 50% से कम है, वहाँ यह औसत केवल 65 मतदाता प्रति बूथ था.

इसका परिणाम यह हुआ कि मुस्लिम बहुल बूथों में मतदाता आधार में 39% की भारी कटौती हुई, जबकि अन्य बूथों में यह गिरावट मात्र 10% रही. यह सांख्यिकीय अंतर प्रशासनिक त्रुटि से कहीं अधिक एक व्यवस्थित प्रयास की ओर संकेत करता है.

विलोपन के इस पैटर्न का सीधा संबंध राजनीतिक दलों के प्रदर्शन से जुड़ा है. डेटा विश्लेषण से पता चलता है कि:

  • ृणमूल कांग्रेस (टीएमसी): जिन बूथों पर टीएमसी का प्रदर्शन मजबूत रहा है, वहाँ नाम हटाए जाने की दर सबसे अधिक रही. अनुमान है कि 2021 के आंकड़ों के अनुसार टीएमसी ने लगभग 46,040 संभावित मतदाता खो दिए हैं.

  • कांग्रेस: कांग्रेस को भी भारी नुकसान हुआ है क्योंकि उसका मुख्य आधार भी इसी अल्पसंख्यक समुदाय में है. उसे लगभग 32,235 मतदाताओं का घाटा होने का अनुमान है.

  • भाजपा: भाजपा के मजबूत गढ़ों को इस सामूहिक ‘विचाराधीन’ प्रक्रिया से काफी हद तक बख्श दिया गया. भाजपा को केवल 4,882 मतदाताओं का नुकसान होने का अनुमान है.

इस प्रकार, भाजपा को नए वोट हासिल किए बिना ही आनुपातिक लाभ मिल गया है, क्योंकि उसके प्रतिद्वंद्वियों का वोट बैंक बड़े पैमाने पर साफ कर दिया गया है.

शमशेरगंज की सामाजिक स्थिति इस मुद्दे को और अधिक गंभीर बनाती है. यह क्षेत्र बीड़ी मजदूरों, अनौपचारिक श्रमिकों और नदी कटाव से प्रभावित विस्थापितों का है. यहाँ के लोगों के पास अक्सर पक्के दस्तावेजों का अभाव होता है और पते बदलते रहते हैं. ऐसी अस्थिर स्थिति में ‘दस्तावेजी प्रमाण’ की मांग करना गरीब और हाशिए के मतदाताओं को लोकतांत्रिक प्रक्रिया से बाहर करने का एक औजार बन गया है.

रिपोर्ट के मुताबिक, शमशेरगंज में आज 23 अप्रैल को हुआ मतदान केवल एक चुनावी औपचारिकता प्रतीत हो रहा है. प्रशासन का “नियमों के पालन” का तर्क उस समय खोखला नजर आता है जब एक-तिहाई मतदाता, जो मुख्य रूप से एक ही समुदाय और राजनीतिक विचारधारा से जुड़े हैं, मतदान से पहले ही बाहर कर दिए जाते हैं. असली सवाल यह नहीं है कि कौन जीतेगा, बल्कि यह है कि क्या यह चुनाव वास्तव में ‘स्वतंत्र और निष्पक्ष’ कहा जा सकता है, जब मैदान को पहले ही एकतरफा रूप से बदल दिया गया हो. यह स्थिति भारतीय लोकतंत्र की चुनावी शुचिता पर एक गहरा प्रश्नचिन्ह लगाती है.

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