योगेंद्र यादव: पश्चिम बंगाल चुनाव में अल्पसंख्यकों को बाहर करने की साज़िश

इंडियन एक्सप्रेस के ओपिनियन कॉलम में स्वराज इंडिया के सदस्य और भारत जोड़ो अभियान के राष्ट्रीय संयोजक योगेंद्र यादव लिखते हैं कि पिछले 10 महीनों में पश्चिम बंगाल में ‘स्पेशल इम्पेडिमेंट रिमूवल’ (एसआईआर) के तहत बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटाना एक सामान्य बात बन गई है. बंगाल का यह मामला मतदाताओं को मताधिकार से वंचित करने का एक असाधारण उदाहरण है.

यादव के अनुसार, यह पूरी क़वायद बीजेपी द्वारा डिज़ाइन की गई, चुनाव आयोग द्वारा लागू की गई और सुप्रीम कोर्ट द्वारा प्रमाणित की गई थी. इसका मक़सद बंगाल फ़तह करने की बीजेपी की कोशिशों में आ रही जनसांख्यिकीय बाधाओं को दूर करना था.

अक्टूबर 2025 में एसआईआर से पहले बंगाल की मतदाता सूची में 7.66 करोड़ नाम थे, जो कि राज्य की वयस्क आबादी (7.67 करोड़) के लगभग बराबर था. जून-अगस्त 2025 में सिर्फ़ 3.5 लाख नए नाम जोड़े गए और 41% आवेदन ख़ारिज कर दिए गए, जो कि सरकारी मिलीभगत की अफ़वाहों को भी ख़ारिज करता है. ड्राफ़्ट सूची में 58 लाख नाम (7.7%) हटा दिए गए, जो राजस्थान और मध्य प्रदेश जैसे अन्य राज्यों के आंकड़े के क़रीब ही था. लेकिन इसके बाद चुनाव आयोग ने असाधारण क़दम उठाए. बंगाल में 30 रोल ऑब्ज़र्वर, स्पेशल रोल ऑब्ज़र्वर और उनके नीचे 8,000 माइक्रो ऑब्ज़र्वर नियुक्त किए गए, जबकि यूपी में सिर्फ़ चार ऐसे ऑब्ज़र्वर थे. जब इससे मनचाहे नतीजे नहीं मिले, तो चुनाव आयोग ने 2002 के डेटा से “तार्किक विसंगतियों” को हथियार बनाया.

यादव बताते हैं कि चुनाव आयोग ने एक विवाद गढ़ा और सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया. कोर्ट ने 35 दिनों के भीतर 60 लाख विवादित मामलों को निपटाने के लिए एक विशेष तंत्र बनाया, जिसकी प्रक्रिया बिल्कुल भी पारदर्शी नहीं थी. कुछ सौ जजों ने आनन-फ़ानन में फ़ैसले किए और नतीजा यह हुआ कि 27 लाख और नाम काट दिए गए.

सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि हटाए गए इन लोगों ने सभी प्रक्रियाएं पूरी की थीं और उनके पास पैन कार्ड, जन्म प्रमाण पत्र, पासपोर्ट और आधार जैसे वैध दस्तावेज़ थे. यादव का दावा है कि हटाए गए लोगों में से लगभग दो-तिहाई अल्पसंख्यक समुदाय से हैं.

सुप्रीम कोर्ट द्वारा बनाए गए अपीलीय ट्रिब्यूनल भी वक़्त पर काम नहीं कर पाए हैं. सबर (SABAR) इंस्टीट्यूट के विश्लेषण के अनुसार, अब तक “अधिनिर्णय” के लगभग 89 प्रतिशत फ़ैसलों को ट्रिब्यूनल ने पलट दिया है. यादव ने इसे “एक त्रासदी में कॉमेडी का तड़का” और एक मुकम्मल प्रहसन क़रार दिया है.

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