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हरकारा डीप डाइव | सुमित झा| क्या गरीबी का संबंध जाति से है? तेलंगाना सर्वे ने दिया जवाब!

तेलंगाना का ताज़ा जाति सर्वे इस सोच को खारिज करता है कि अगर समाज से जाति खत्म करनी है तो जाति जनगणना की जरूरत नहीं है. आंकड़े साफ दिखाते हैं कि जाति आज भी हर जगह मौजूद है, चाहे गांव में पानी पीने की व्यवस्था हो या शहर में रहने की स्थिति. अनुसूचित जाति के परिवार सामान्य वर्ग की तुलना में लगभग चार गुना ज़्यादा मेडिकल लोन लेते हैं. इसका कारण यह है कि इन समुदायों के लोग अधिकतर असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं, जहां नौकरी की सुरक्षा या स्वास्थ्य बीमा जैसी सुविधाएं नहीं होतीं. बीमारी की स्थिति में इन्हें पहले झोला-छाप डॉक्टरों के पास जाना पड़ता है, और जब हालत बिगड़ती है तो महंगे निजी अस्पतालों में क़र्ज़ लेकर इलाज कराना पड़ता है. यह क़र्ज़ भी अक्सर बैंक से नहीं बल्कि निजी मनीलेंडर्स से लिया जाता है, जिसे चुकाने के लिए कई बार मज़दूरी तक करनी पड़ती है. 

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क्या गरीबी सच में ‘जातिहीन’ है? तेलंगाना सर्वे ने ‘समान हालात’ की सदियों पुरानी दलील तोड़ी

 सामान्य वर्ग के लोग पढ़ाई के लिए अमेरिका, ब्रिटेन और कनाडा जैसे देशों में जाते हैं, जबकि एससी-एसटी समुदाय मुख्य तौर पर पश्चिम एशिया में मज़दूरी के लिए जाते हैं. वहीं, राज्य की 30% कल्याणकारी योजनाओं का लाभ अपेक्षाकृत कम पिछड़े वर्गों को मिल रहा है.  हालांकि आरक्षण से एससी, एसटी और बीसी को सरकारी नौकरियों में कुछ मदद मिली है, लेकिन ग्रुप 1 सेवाओं में उनकी भागीदारी अभी भी कम है. 

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