क्या गरीबी सच में ‘जातिहीन’ है? तेलंगाना सर्वे ने ‘समान हालात’ की सदियों पुरानी दलील तोड़ी

सदियों से भारत की नीतिगत बहसों में यह तर्क हमेशा दिया जाता रहा है कि गरीबी का जाती से कोई लेना देना नहीं है, अगर गरीब इंसान, चाहे वह किसी भी जाती का हो, उसकी स्थिति एक जैसी होती है और सिर्फ आर्थिक हालात बेहतर होने से ही असमानता दूर की जासकती है, लेकिन तेलंगाना सरकार के सोशिओ-इकनोमिक,एचुकेशनल, एम्प्लॉयमेंट, पॉलिटिकल एंड कास्ट (एसईईईपीसी) सर्वे 2024 ने लंबे समय से चले आ रहे तर्क को चुनौती दी है. 

सुमित झा की साउथ फर्स्ट में चार हिस्सों में प्रकाशित रिपोर्ट से साफ पता चलता है कि तेलंगाना में गरीबी जाति से अलग नहीं है, बल्कि यह सामाजिक पहचान से गहराई से जुड़ी हुई है. भारत में गरीबी, शहर, स्वास्थ और अवसर , यह सब जाति ही तय करती है.इस सर्वे में करीब 3.55 करोड़ लोगों और 242 जातियों को शामिल किया गया है. जस्टिस बी. सुधर्शन रेड्डी के नेतृत्व में स्वतंत्र विशेषज्ञ समूह (आईईडब्ल्यूजी) ने इस रिपोर्ट का विश्लेषण किया, जिसमें केवल आय नहीं बल्कि आवास, शिक्षा, रोजगार, भूमि स्वामित्व, वित्तीय पहुंच और सामाजिक भेदभाव जैसे कई आयामों पर असमानताओं को मापा गया. 

समान आय होने के बावजूद अलग-अलग जातियों की स्थिति में बड़ा अंतर बना रहता है. जिन परिवारों की सालाना आय एक लाख रुपये से कम है, उनमे अनुसूचित जाति (एससी) परिवारों का कम्पोज़िट बैकवर्डनेस इंडेक्स स्कोर 49 है, जबकि सामान्य

 वर्ग के परिवारों का स्कोर 16 है. इसका मतलब यह है कि सामान आर्थिक हालात होने के बावजूद एससी परिवारों को ख़राब घर, अंग्रेजी माध्यम शिक्षा की कमी, क़र्ज़ और सामाजिक पाबंदियों का ज़्यादा सामना करना पड़ता है. 

सीबीआई इंडेक्स, 0 से 126 के बीच स्कोर देता है और 42 मानकों पर आधारित है, जैसे शिक्षा, रोज़गार, जीवन स्तर, आय, जायदाद, लिंग, सामाजिक भेदभाव और वित्तीय पहुंच. राज्य का औसत स्कोर 81 है, लेकिन एससी और एसटी समुदायों का पिछड़ापन सामान्य वर्ग से तक़रीबन तीन गुना ज़्यादा है. जबकि ओबीसी 2.7 गुना ज़्यादा पिछड़े हैं. सबसे अधिक पिछड़ा एससी दक्कल और बीसी-ऐ पिचिगुंटला हैं, जबकि सबसे कम पिछड़े समुदायों में ओसी कपु , जैन, राजू और ब्राह्मण शामिल हैं.

आवास और बुनियादी सुविधाओं में भी बड़ा अंतर सामने आया है. जहां शहरी तेलंगाना में 78.4% सामान्य वर्ग पक्के घरों में रहते हैं, वहीं एससी और एसटी समुदायों के लोग झुग्गी झोपड़ियों या कमज़ोर मकानों में ज़्यादा रहते हैं. जहाँ सामान्य वर्ग के 82% घरों में नल का पानी आता है, जानकी एससी परिवारों में सिर्फ 54% घरों में पानी आता है. शिक्षा के क्षेत्र में भी एक बड़ा अंतर देखने को मिलता है, प्राइवेट स्कूल में भी एक तिहाई सीटें सामान्य वर्ग के बच्चों से भरी होती हैं और वहीं एस-सी में यह आंकड़ा 10% से भी कम है. अंग्रेज़ी माध्यम में पढ़ने वाले ज़्यादा तर बच्चे यानी 66.3% सामान्य वर्ग से होते हैं, जबकि एसटी में 36.6% और एससी में 40.7 % है. तेलंगाना में 56%12वीं से आगे नहीं पढ़ पाती और इसका सबसे ज़्यादा असर इन जातिओं से ताल्लुक़ रखने वाले बच्चों पर पड़ता है. 

रोजगार, आय और क़र्ज़ के आंकड़े भी असमानता को दिखाते हैं. एससी के 45.7% और एसटी के 40.6% लोग दिहाड़ी मज़दूरी करते हैं, जबकि सामान्य वर्ग में यह सिर्फ 10.9% है. आय के मामले में भी अंतर है सिर्फ 2.1% एससी -एसटी  परिवार सालाना 5 लाख रुपये से ज़्यादा  कमाते हैं, जबकि सामान्य वर्ग में यह 13.2% है.क़र्ज़ में भी फ़र्क़ है, सामान्य वर्ग बैंक से कम ब्याज पर लोन लेता है, जबकि एससी-एसटी को साहूकारों पर निर्भर रहना पड़ता है.  

सर्वे में माइग्रेशन और सरकारी योजनाओं के लाभ में भी बड़ा अंतर देखने को मिलता है. सामान्य वर्ग के लोग पढ़ाई के लिए अमेरिका, ब्रिटेन और कनाडा जैसे देशों में जाते हैं, जबकि एससी-एसटी समुदाय मुख्य तौर पर पश्चिम एशिया में मज़दूरी के लिए जाते हैं. वहीं, राज्य की 30% कल्याणकारी योजनाओं का लाभ अपेक्षाकृत कम पिछड़े वर्गों को मिल रहा है.  हालांकि आरक्षण से एससी, एसटी और बीसी को सरकारी नौकरियों में कुछ मदद मिली है, लेकिन ग्रुप 1 सेवाओं में उनकी भागीदारी अभी भी कम है. 

स्वास्थ्य के क्षेत्र में यह असमानता और अधिक स्पष्ट रूप से सामने आती है. सर्वे के अनुसार,एससी  परिवार सामान्य वर्ग के मुकाबले लगभग चार गुना अधिक चिकित्सा खर्च के लिए क़र्ज़ लेने को मजबूर हैं।  पूरे राज्य में जहां एससी समुदाय के 10.9% परिवार मेडिकल लोन पर निर्भर हैं, वहीं सामान्य वर्ग में यह आंकड़ा केवल 3% है. शहरी क्षेत्रों में यह अंतर और बढ़ जाता है. 

 चौंकाने वाली बात यह है कि समान आय वाले गरीब वर्ग में भी एससी परिवारों में 12% लोग इलाज के लिए क़र्ज़ लेते हैं, जबकि ओसी में यह केवल 4% है. इसका कारण केवल गरीबी नहीं, बल्कि बचत, पारिवारिक सहयोग और सस्ती वित्तीय सेवाओं तक पहुंच नहीं होना है. 

शहरों को लेकर भी एक बड़ा मिथक इस सर्वे ने तोड़ा है। दशकों से यह माना जाता रहा है कि शहर जाति को खत्म कर देते हैं और सभी को समान अवसर देते हैं. लेकिन तेलंगाना के आंकड़े बताते हैं कि शहर जातिगत असमानता को खत्म नहीं करते, बल्कि कई बार उसे और गहरा कर देते हैं. 

इसके उलट सामान्य वर्ग हालात शहरों में बेहतर हो जाता है. कई समुदायों के लिए शहर अवसर नहीं, बल्कि असुरक्षा का स्थान बन जाता है, जहां उन्हें अजीब ओ गरीब काम, किराए के छोटे घर और सामाजिक भेदभाव का सामना करना पड़ता है. भेदभाव के आंकड़े भी इस बात की पुष्टि करते हैं.  जहां ग्रामीण क्षेत्रों में 3.8% लोगों ने धार्मिक स्थलों पर भेदभाव की बात कही, वहीं शहरों में यह आंकड़ा 8.2% तक पहुंच जाता है. हालांकि शहरों में अंतरजातीय विवाह की दर अधिक है, लेकिन 91% से ज़्यादा लोग अब भी अपनी ही जाति में विवाह करते हैं. यानी सामाजिक ढांचा अभी भी बड़े पैमाने पर अपरिवर्तित है. 

अगर ज़मीन रखने और उनकी मिलकियत की बात की जाए तो इसमें एक दिलचस्प बदलाव देखने को मिला है, एसटी समुदायों के पास औसतन अधिक ज़मीन है, लेकिन उनमे से ज़्यादातर ज़मीन या तो बंजर हैं या सिंचाई रहित, जो आमदनी का ज़रिया नहीं बन सकता है. 

“नो कास्ट” समूह का निष्कर्ष भी दिलचस्प है. यह समूह, जो खुद को जाति से अलग बताता है, सामाजिक और आर्थिक रूप से उम्मीद के मुताबिक़ बेहतर स्थिति में है. लेकिन इनमें से बड़ी संख्या के पास जाति प्रमाणपत्र भी है और उन्होंने आरक्षण का लाभ भी लिया है.  विशेषज्ञों का मानना है कि जाति से दूरी तभी संभव होती है जब व्यक्ति पहले से सुरक्षित और सशक्त स्थिति में हो. भारत में असमानता केवल आर्थिक नहीं, बल्कि गहराई से सामाजिक संरचना में निहित है. तेलंगाना का यह सर्वे यह दिखाता है कि जब तक नीतियां जाति आधारित असमानताओं को ध्यान में रखकर नहीं बनाई जाएंगी, तब तक समानता का लक्ष्य हासिल करना मुश्किल रहेगा. 

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