केन-बेतवा परियोजना के खिलाफ फिर भड़का ‘चिता आंदोलन’, विस्थापितों की मांग- न्याय दो या मरने दो
मध्य प्रदेश के छतरपुर और पन्ना जिलों में महत्वाकांक्षी केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना और अन्य सिंचाई परियोजनाओं से प्रभावित लोगों ने एक बार फिर अपना 'चिता आंदोलन' शुरू कर दिया है. अप्रैल में प्रशासन के आश्वासनों के बाद स्थगित किया गया यह आंदोलन अब पन्ना जिले के कूपी गांव के पास बराना नदी के किनारे "न्याय दो या मृत्यु दो" के नारे के साथ दोबारा शुरू हुआ है.
‘डाउन टू अर्थ’ के मुताबिक, इस बार आंदोलन की अगुवाई आदिवासी महिलाएं कर रही हैं. उनका आरोप है कि पुनर्वास, मुआवजा और राहत पैकेज को लेकर प्रशासन ने जो वादे किए थे, उनमें से एक भी पूरा नहीं किया गया. इसके उलट, बरसात के मौसम में लोगों के घर तोड़ दिए गए, जिससे कई परिवार खुले आसमान के नीचे रहने को मजबूर हो गए हैं.
केन-बेतवा परियोजना के अलावा मझगांव मध्यम परियोजना, रुनझ, नईगांव सिंचाई परियोजना और एनटीपीसी की परियोजना का भी प्रभावित लोग विरोध कर रहे हैं. आंदोलनकारियों का कहना है कि इन परियोजनाओं के कारण हजारों परिवारों के सामने आजीविका और पुनर्वास का गंभीर संकट खड़ा हो गया है.
सामाजिक कार्यकर्ता और आंदोलन के नेता अमित भटनागर ने प्रशासन की कार्यशैली पर गंभीर सवाल उठाए हैं. उनका आरोप है कि प्रशासन के भ्रष्ट और दमनकारी रवैये के कारण करीब 50 हजार लोग बेघर हो गए हैं. उन्होंने कहा कि लोगों से उनकी जल, जंगल और जमीन के साथ-साथ उनकी आजीविका और सांस्कृतिक पहचान भी छीन ली गई है.
अमित भटनागर ने केन-बेतवा परियोजना के पर्यावरणीय प्रभावों को लेकर भी चिंता जताई. उनका कहना है कि इस परियोजना के कारण लगभग 46 लाख पेड़ों की कटाई होगी, पन्ना टाइगर रिजर्व प्रभावित होगा और केन नदी के प्राकृतिक स्वरूप को अपूरणीय क्षति पहुंचेगी. उनके अनुसार विकास के नाम पर पर्यावरण और स्थानीय समुदायों की अनदेखी नहीं की जा सकती.
आंदोलन का नेतृत्व कर रहीं दिव्या अहिरवार और लक्ष्मी आदिवासी ने आरोप लगाया कि अप्रैल में चिता आंदोलन के बाद प्रशासन ने उनकी मांगों को लेकर कई आश्वासन दिए थे, लेकिन उनमें से किसी का पालन नहीं हुआ. उन्होंने कहा कि इसके बजाय प्रभावित लोगों के खिलाफ झूठे मुकदमे दर्ज किए जा रहे हैं, बिना कानूनी प्रक्रिया के बेदखली की जा रही है, बिजली काटी जा रही है और स्कूलों तक को तोड़ा जा रहा है ताकि लोगों में डर का माहौल बनाया जा सके.

