एसआईआर ‘चंद लोगों के लोकतंत्र’ का मार्ग प्रशस्त कर सकता है: परकला प्रभाकर
मतदाता सूची का "विशेष गहन पुनरीक्षण” (एसआईआर) नागरिकों के दो वर्ग तैयार कर देगा—एक वे जो वोट दे सकते हैं और दूसरे वे जो वोट नहीं दे सकते. मौजूदा गति को देखते हुए, अनुमानतः 16 करोड़ लोगों को मताधिकार से वंचित किया जा सकता है. एसआईआर वास्तव में देश के कुछ हिस्सों को लोकतांत्रिक प्रक्रिया से बाहर कर रहा है," अर्थशास्त्री और राजनीतिक विश्लेषक परकला प्रभाकर ने हैदराबाद के डॉ. बी.आर. अंबेडकर मुक्त विश्वविद्यालय में पी.वी. नरसिम्हा राव मेमोरियल व्याख्यान देते हुए यह बात कही.
‘द हिंदू’ के अनुसार, उन्होंने कहा कि राजनीतिक दल मतदाता सूची से नाम हटाए जाने को केवल चुनावी नफा-नुकसान के चश्मे से देख रहे हैं. "वे इस बात को लेकर चिंतित हैं कि जिन लोगों को हटाया जा रहा है वे किस पार्टी के समर्थक हैं. लेकिन लंबे समय में, सभी राजनीतिक दलों का 'भाजपाकरण' हो जाएगा. जैसे-जैसे समाज के कुछ हिस्सों को राजनीतिक रूप से महत्वहीन बनाने के लिए व्यवस्था को नया आकार दिया जाएगा, वैसे-वैसे वे (अन्य दल) तेजी से भाजपा जैसे दिखने लगेंगे," उन्होंने कहा.
विशेष गहन पुनरीक्षण को प्रस्तावित परिसीमन प्रक्रिया से जोड़ते हुए, प्रभाकर ने आरोप लगाया कि अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासी और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग लोकतांत्रिक प्रक्रिया से बाहर धकेले जाने के जोखिम में हैं. उन्होंने कहा, "इसका परिणाम कुछ लोगों का, कुछ लोगों के लिए लोकतंत्र होगा." सूचना के अधिकार (आरटीआई) अधिनियम के तहत प्राप्त जवाबों का हवाला देते हुए उन्होंने दावा किया कि एसआईआर की योजना और क्रियान्वयन बेहद अपारदर्शी तरीके से किया गया था, और इस कवायद को सही ठहराने के लिए सार्वजनिक पटल पर पर्याप्त सामग्री नहीं रखी गई.
उन्होंने कहा, "परिसीमन हिंदू बहुसंख्यकवादी ध्रुवीकरण को आकार देगा और एक हिंदू सवर्ण राजनीतिक व्यवस्था का निर्माण करेगा, क्योंकि यह आखिरी एसआईआर नहीं होने जा रहा है." उन्होंने आगे कहा, "हर विसंगति को सामान्य बनाया जा रहा है. डॉलर की बढ़ती कीमत, पेट्रोल के दाम, मणिपुर, मॉब लिंचिंग (भीड़ द्वारा हत्या), पेपर लीक, नीट, बेरोजगारी और अब एसआईआर तथा मतदाता सूची से नामों को हटाया जाना, इन सबको सामान्य बात बनाया जा रहा है. अल्पसंख्यकों को राजनीतिक रूप से महत्वहीन बना दिया जाएगा." उन्होंने यह दावा भी किया कि भारत "इजरायल जैसे देश" बनने की ओर बढ़ रहा है.
पश्चिम बंगाल में चुनावों की निष्पक्षता पर सवाल उठाते हुए, प्रभाकर ने कहा कि कथित तौर पर लगभग 28 लाख मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए थे और उनमें से कई मामले अभी भी न्यायाधिकरणों के समक्ष लंबित हैं.
इससे पहले, डॉ. बी.आर. अंबेडकर मुक्त विश्वविद्यालय के कुलपति घंटा चक्रपाणि ने कहा: "चुनाव आयोग ने लोगों के एक हिस्से को मतदाता सूची से बाहर करने के लिए अपनी सेना तैनात कर दी है. यह लोकतंत्र का उलटा रूप है जहाँ शासक यह तय कर रहे हैं कि मतदाता कौन होने जा रहा है."

