अयोध्या में संघ परिवार बनाम संघ परिवार: राम मंदिर फंड में ‘चोरी’ के आरोपों से बढ़ा घमासान
अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण भारतीय राजनीति और हिंदुत्व आंदोलन की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में गिना जाता है. दशकों तक चले राम जन्मभूमि आंदोलन, बाबरी मस्जिद विवाद, अदालतों में लंबी कानूनी लड़ाई और अंततः सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद बने भव्य राम मंदिर को संघ परिवार की ऐतिहासिक जीत के रूप में देखा गया. लेकिन मंदिर निर्माण के दो वर्ष बाद अब अयोध्या एक नए विवाद की वजह से चर्चा में है. इस बार सवाल मंदिर आंदोलन के विरोधियों की ओर से नहीं उठ रहे, बल्कि उन लोगों की ओर से उठ रहे हैं जो स्वयं इस आंदोलन का हिस्सा रहे हैं.
राम मंदिर ट्रस्ट पर नकदी, आभूषणों और श्रद्धालुओं के चढ़ावे में कथित अनियमितताओं के आरोप लगे हैं. इन आरोपों की जांच के लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने एक विशेष जांच दल (एसआईटी) का गठन किया है. हालांकि अभी तक कोई एफआईआर दर्ज नहीं हुई है, लेकिन अयोध्या में इस मामले को लेकर असंतोष लगातार बढ़ता दिखाई दे रहा है. साधु-संतों से लेकर स्थानीय भाजपा नेताओं और संघ से जुड़े कार्यकर्ताओं तक, कई लोग खुलकर सवाल उठा रहे हैं.
इन आलोचकों में सबसे प्रमुख नाम महंत धर्म दास का है. धर्म दास अयोध्या के उन संतों में शामिल हैं जिनका राम जन्मभूमि आंदोलन से गहरा संबंध रहा है. उनके गुरु अभिराम दास उन लोगों में थे जिन्होंने 1949 में बाबरी मस्जिद के भीतर रामलला की मूर्ति स्थापित की थी. धर्म दास स्वयं भी कई दशकों तक राम जन्मभूमि मामले में पक्षकार रहे. इसलिए जब वे आज मंदिर ट्रस्ट पर सवाल उठाते हैं तो उनकी बात को गंभीरता से सुना जा रहा है.
धर्म दास का कहना है कि मंदिर के लिए श्रद्धालुओं द्वारा दिया गया धन सुरक्षित नहीं रहा और ट्रस्ट जनता के विश्वास को बनाए रखने में असफल रहा है. उनका आरोप है कि मंदिर से जुड़े आर्थिक मामलों में पारदर्शिता की कमी है और इस पूरे मामले पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ध्यान देना चाहिए. उनका यह भी कहना है कि अयोध्या के अधिकांश साधु-संत इस स्थिति से असंतुष्ट हैं.
लेकिन यह विवाद केवल कथित वित्तीय अनियमितताओं तक सीमित नहीं है. इसके पीछे एक गहरा संगठनात्मक और वैचारिक संघर्ष भी दिखाई देता है. अयोध्या के कई संतों और स्थानीय धार्मिक नेताओं का आरोप है कि राम मंदिर निर्माण के बाद मंदिर और उससे जुड़े निर्णयों पर कुछ चुनिंदा लोगों का नियंत्रण बढ़ गया है. उनका कहना है कि जिन संतों और कार्यकर्ताओं ने वर्षों तक आंदोलन को आगे बढ़ाया, उन्हें अब मंदिर की व्यवस्था और निर्णय प्रक्रिया से दूर कर दिया गया है.
इस विवाद के केंद्र में श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट है, जिसका गठन 2020 में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद किया गया था. ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय इसके सबसे प्रभावशाली चेहरों में माने जाते हैं. विश्व हिंदू परिषद के वरिष्ठ नेता रहे चंपत राय लंबे समय से राम मंदिर आंदोलन से जुड़े रहे हैं और मंदिर निर्माण की पूरी प्रक्रिया में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है. लेकिन अब ट्रस्ट के कामकाज को लेकर उठ रहे सवालों ने उन्हें भी विवाद के केंद्र में ला खड़ा किया है.
दिलचस्प बात यह है कि चंपत राय को लेकर संघ परिवार के भीतर भी अलग-अलग राय दिखाई देती है. कुछ लोग उन्हें ईमानदार और समर्पित कार्यकर्ता बताते हैं, जबकि अन्य का आरोप है कि मंदिर के प्रबंधन में अत्यधिक केंद्रीकरण हुआ है और जवाबदेही की कमी बनी हुई है. अयोध्या के धार्मिक और राजनीतिक हलकों में यह चर्चा लगातार तेज हो रही है कि मंदिर से जुड़े फैसले अब सीमित लोगों के हाथों में केंद्रित हो गए हैं.
पूर्व सांसद और बजरंग दल के संस्थापक विनय कटियार भी उन नेताओं में शामिल हैं जिन्होंने ट्रस्ट की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं. कटियार का कहना है कि राम मंदिर आंदोलन किसी एक व्यक्ति या समूह का नहीं था, बल्कि हजारों कार्यकर्ताओं, संतों और स्वयंसेवकों के दशकों लंबे संघर्ष का परिणाम था. ऐसे में यदि कुछ लोग पूरे आंदोलन का श्रेय और नियंत्रण अपने हाथ में रखने की कोशिश करते हैं तो इससे स्वाभाविक रूप से असंतोष पैदा होगा.
इस पूरे विवाद का एक महत्वपूर्ण राजनीतिक पहलू भी है. राम मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं है. यह भाजपा और संघ परिवार की राजनीतिक पहचान का सबसे बड़ा प्रतीक रहा है. 1990 के दशक में राम मंदिर आंदोलन ने भाजपा को राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. ऐसे में मंदिर प्रबंधन को लेकर उठने वाले सवाल सीधे तौर पर उस राजनीतिक और नैतिक पूंजी को प्रभावित कर सकते हैं जिसे संघ परिवार ने वर्षों की मेहनत से तैयार किया है.
संघ से जुड़े कुछ कार्यकर्ताओं को यह भी चिंता है कि इन आरोपों का असर उन सामाजिक वर्गों पर पड़ सकता है जिन्हें हिंदुत्व की व्यापक राजनीति के साथ जोड़ने की कोशिश की जा रही है. उनका मानना है कि यदि मंदिर में चढ़ावे और दान को लेकर संदेह पैदा होता है तो इससे दलितों, पिछड़े वर्गों और अन्य समुदायों के बीच पहले से मौजूद शंकाएं और मजबूत हो सकती हैं. यही कारण है कि कई लोग इस मामले को केवल एक प्रशासनिक या वित्तीय विवाद नहीं बल्कि व्यापक सामाजिक और राजनीतिक चुनौती के रूप में देख रहे हैं.
यह पहली बार नहीं है जब राम मंदिर ट्रस्ट विवादों में आया हो. 2021 में मंदिर परिसर से जुड़ी जमीन खरीद के कुछ सौदों को लेकर भी सवाल उठे थे. उस समय जांच की बात हुई थी, लेकिन उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की गई. अब नए आरोपों के सामने आने के बाद पुराने विवादों की भी फिर चर्चा होने लगी है.
फिलहाल सभी की निगाहें एसआईटी जांच पर टिकी हैं. लेकिन अयोध्या में जो बहस चल रही है, वह केवल कथित चोरी या वित्तीय अनियमितताओं तक सीमित नहीं है. यह उस संघर्ष की कहानी भी है जो किसी बड़े आंदोलन के अपने लक्ष्य हासिल कर लेने के बाद अक्सर सामने आता है. राम मंदिर निर्माण ने जिन संगठनों, नेताओं और संतों को एक मंच पर खड़ा किया था, आज वही लोग मंदिर के नियंत्रण, प्रभाव और जवाबदेही को लेकर अलग-अलग खेमों में दिखाई दे रहे हैं. अयोध्या में उठे ये सवाल आने वाले समय में न केवल मंदिर ट्रस्ट की विश्वसनीयता बल्कि संघ परिवार की आंतरिक राजनीति और उसके सामाजिक प्रभाव की भी परीक्षा लेने वाले हैं.
यह स्क्रोल में प्रकाशित आयुष तिवारी के लेख का हिंदी में अनूदित अंश है. मूल लेख अंग्रेजी में यहाँ पढ़ा जा सकता है.

