किसका पलड़ा भारी है दो माह से जारी जंग के बाद..

अमेरिका और इज़रायल के हमलों को दो महीने बीत चुके हैं, लेकिन ईरान के ख़िलाफ़ छिड़ी यह जंग एक महँगे गतिरोध में तब्दील हो गई है. पाकिस्तान की मध्यस्थता से नाज़ुक युद्धविराम तो लागू हुआ, मगर होर्मुज़ जलडमरूमध्य अब भी बंद है, सीधी वार्ता ध्वस्त हो चुकी है, और दोनों पक्षों में झुकने के कोई संकेत नहीं हैं.

पिछले सप्ताहांत वाशिंगटन के दूतों ने इस्लामाबाद में आगामी वार्ता के लिए अपना नियोजित दौरा रद्द कर दिया, क्योंकि तेहरान ने साफ़ कह दिया कि जब तक अमेरिकी नौसेना ईरानी बंदरगाहों की नाकेबंदी नहीं हटाती, वह किसी भी बातचीत में शामिल नहीं होगा. ड्रॉप साइट न्यूज़ को एक वरिष्ठ ईरानी अधिकारी ने बताया, "हम अपने ही डिज़ाइन के साथ आगे बढ़ रहे हैं. जब तक अमेरिका समुद्री नाकेबंदी नहीं हटाता, बातचीत का कोई मतलब नहीं."

दोनों पक्षों को अपनी जीत का यक़ीन

बीजिंग में 26 अप्रैल को चाइना एंड ग्लोबलाइज़ेशन फ़ोरम में बोलते हुए निंगशिया विश्वविद्यालय के उपकुलपति और मध्यपूर्व विशेषज्ञ नियू शिनचुन ने कहा, "अमेरिका और ईरान, दोनों को लगता है कि पलड़ा उनकी तरफ़ भारी है." उनके अनुसार अमेरिका सैन्य रूप से श्रेष्ठ है, लेकिन उसने अपने दो प्रमुख लक्ष्य — ईरान की परमाणु क्षमता और सैन्य शक्ति को नष्ट करना — हासिल नहीं किए हैं. दूसरी तरफ़ ईरान भारी नुकसान उठाने के बाद भी टिका हुआ है. "शासन बचा रहा, सेना बची रही, इसलिए ईरान मानता है कि समय उसके पक्ष में है," नियू ने कहा.

साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट के मुताबिक शंघाई स्थित सैन्य विश्लेषक नी लेशियोंग ने दोनों पक्षों की संरचनागत कमज़ोरियों की ओर ध्यान दिलाया. उनके अनुसार अमेरिका की कमज़ोरी यह है कि वह ईरान में सत्ता परिवर्तन के लिए अपने सभी संसाधन झोंकने से हिचकिचाता है — वह क्षेत्रीय दलदल में नहीं फँसना चाहता. "वाशिंगटन वेनेजुएला-शैली का हल चाहता है — तख्तापलट किए बिना दबाव और नियंत्रण. ईरान के कट्टरपंथियों ने अपनी प्रतिरोध-नीति इसी अमेरिकी हिचकिचाहट का फ़ायदा उठाकर बनाई है," नी ने कहा. इसके अलावा अमेरिका के गोला-बारूद भंडार घट रहे हैं, और बढ़ती ईंधन क़ीमतों के कारण साल के अंत में होने वाले मध्यावधि चुनावों से पहले यह संघर्ष घरेलू स्तर पर तेज़ी से अलोकप्रिय हो रहा है. नी की राय है कि अगर अमेरिका दबाव बनाए रखे, तो ईरान अंततः "महत्वपूर्ण रियायतें" देगा, भले ही वह "हारे हुए पक्ष की भूमिका में विजेता बनने का नाटक" करता रहे. होर्मुज़ की नाकेबंदी को नी ने ईरान की "ग़लती" बताया — "इसने अमेरिका के हाथ में पत्ते दे दिए."

ईरान के तीन 'एम': हथियार, बाज़ार और मध्यावधि चुनाव

तेहरान विश्वविद्यालय के एसोसिएट प्रोफ़ेसर और प्रतिष्ठित ईरानी विश्लेषक हसन अहमदियन ने ड्रॉप साइट न्यूज़ को बताया कि ईरान के पास तीन 'म' हैं — मुनिशन्स यानी हथियार, मार्केट्स यानी बाज़ार, और मिडटर्म्स यानी मध्यावधि चुनाव. "ये तीनों चीज़ें ईरान की स्थिति को मज़बूत करती हैं और अमेरिकी स्थिति को कमज़ोर करती हैं. अमेरिका चाहता है कि वह कह सके — हमने ईरान को निचोड़ा और यह हासिल किया. मेरी समझ में ईरान यही नहीं होने देना चाहता."

ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अरागची इस समय रणनीतिक दौरे पर हैं — पाकिस्तान, ओमान और रूस. ड्रॉप साइट न्यूज़ के अनुसार यह दौरा दो परिदृश्यों की तैयारी के लिए है: कूटनीति की वापसी या युद्ध का नया दौर. अरागची ने अमेरिका को वार्ता के ठप होने का ज़िम्मेदार ठहराते हुए कहा, "अमेरिकियों के रवैये ने पिछले दौर की वार्ता को, उसमें हुई प्रगति के बावजूद, लक्ष्य तक नहीं पहुँचने दिया."

अहमदियन ने बताया कि ईरान ने युद्ध समाप्त करने की एक बहु-चरणीय रूपरेखा तैयार की है: पहले पूरे क्षेत्र में — ख़ासकर लेबनान में — वास्तविक युद्धविराम, फिर होर्मुज़ में समझौता, और उसके बाद परमाणु कार्यक्रम तथा दीर्घकालिक अनाक्रामकता समझौते पर व्यापक बातचीत.

ट्रम्प का उलझा कथा-भाष्य

ट्रम्प ने बार-बार दावा किया है कि ईरान झुक रहा है, लेकिन ड्रॉप साइट न्यूज़ के वरिष्ठ ईरानी सूत्र ने इसे ख़ारिज किया. पाकिस्तान में हुई वार्ता को लेकर खूब अटकलें लगाई गईं — ट्रम्प ने कहा कि उपराष्ट्रपति जे.डी. वेंस इस्लामाबाद जा रहे हैं, फिर कहा कि स्टीव विटकॉफ़ और जेरेड कुशनर जाएँगे. लेकिन ईरान ने किसी भी बैठक से इनकार किया. ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माईल बाग़ाई ने कहा, "ईरान और अमेरिका के बीच कोई बैठक होने वाली नहीं है." जब अरागची पाकिस्तान से ओमान चले गए, तो ट्रम्प ने पलटी मारते हुए कहा कि उन्होंने ख़ुद वार्ता रद्द की. "बहुत यात्रा में समय बर्बाद, बहुत काम!" ट्रम्प ने ट्रूथ सोशल पर लिखा. "उनके पास कोई पत्ता नहीं है, सारे पत्ते हमारे पास हैं!"

अहमदियन के अनुसार वास्तव में अव्यवस्था अमेरिकी शिविर में है, जैसा कि ट्रम्प की बदलती बातों, अधूरी धमकियों और इस्लामाबाद भेजे जाने वाले अधिकारियों को लेकर हुई उठापटक से ज़ाहिर होता है. ईरान विटकॉफ़ और कुशनर को "इज़रायल के प्रतिनिधि" मानता है, न कि अमेरिकी हितों के. "यह जैसे फुटबॉल मैच में रग्बी के नियम लेकर आ जाना है," वरिष्ठ ईरानी अधिकारी ने कहा.

रूस, चीन और परमाणु यूरेनियम का सवाल

27 अप्रैल को सेंट पीटर्सबर्ग में बोरिस येल्तसिन प्रेसिडेंशियल लाइब्रेरी में व्लादिमीर पुतिन से मिलने पर रूसी राष्ट्रपति ने ईरानी लड़ाई की "वीरता" की तारीफ़ की और कहा, "रूस ईरान के साथ अपने रणनीतिक संबंध जारी रखेगा." 2015 के परमाणु समझौते में रूस की अहम भूमिका थी; तब ईरान ने अपने 98 प्रतिशत समृद्ध यूरेनियम का भंडार — लगभग 11,000 किलोग्राम — मास्को को भेजा था. अब ईरान के पास अनुमानतः 450 किलोग्राम अत्यधिक समृद्ध यूरेनियम है. ट्रम्प ने हाल ही में झूठा दावा किया कि ईरान ने अमेरिकी सैनिकों को यूरेनियम की हिफ़ाज़त के लिए ईरान में भेजने पर सहमति दी है. ईरान ने यूरेनियम को देश से बाहर भेजने से इनकार कर दिया है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय निगरानी में उसे तनु करने पर सहमति ज़ताई है. अहमदियन ने कहा कि रूस और चीन वे देश हैं जिन पर ईरान किसी भी समझौते में गारंटर के रूप में भरोसा कर सकता है.

थिंगहुआ विश्वविद्यालय की अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा शोधकर्ता जोडी वेन का मानना है कि फ़िलहाल "कार्ड ईरान के हाथ में हैं" — होर्मुज़ से सटा होने के कारण तेहरान कम लागत पर अधिक प्रभाव डाल सकता है. लेकिन उन्होंने चेतावनी दी कि यह स्थिति "विस्फोटक बनी हुई है" और जोखिम तेल क़ीमतों से लेकर वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला तक फैल रहा है. उन्होंने 1973 के वॉर पॉवर्स रेज़ोल्यूशन का भी ज़िक्र किया: 1 मई के बाद ट्रम्प प्रशासन को सैन्य अभियानों के लिए कांग्रेस की मंज़ूरी लेनी होगी.

नियू शिनचुन आने वाले हफ़्तों में "आंशिक, सीमित समझौते" को लेकर आशावादी हैं — होर्मुज़ को 10 साल तक खुला रखने और 2015 जैसे परमाणु समझौते की संभावना देखते हैं. उनके अनुसार अमेरिका संभवतः "ईरान में लड़कर जल्दी निकल जाएगा" और बाद का काम इज़रायल तथा खाड़ी देशों पर छोड़ देगा

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