डीप डाइव विद श्रवण गर्ग | ममता की हार का मतलब देश के लिए क्या होगा?

पश्चिम बंगाल का 2026 का विधानसभा चुनाव अब सिर्फ एक राज्य की सत्ता का संघर्ष नहीं रह गया है, बल्कि यह पूरे देश की राजनीति और लोकतंत्र की दिशा तय करने वाला एक निर्णायक ‘कुरुक्षेत्र’ बन चुका है. ‘हरकारा डीप डाइव’ पर ऑडियो पॉडकास्ट में में, वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग ने इस चुनाव के उन अनछुए पहलुओं पर रोशनी डाली, जो इसे आज़ाद भारत के सबसे जटिल और अभूतपूर्व चुनावों में से एक बनाते हैं.

वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग इस चुनाव की तुलना ‘प्लासी के युद्ध’ से करते हैं. उनका मानना है कि बंगाल में जिस तरह से ‘मीर जाफरों’ और ‘जगत सेठों’ की तलाश की गई है, वह अभूतपूर्व है. ममता बनर्जी के खिलाफ इस बार भयंकर सत्ता विरोधी लहर है. 2021 के मुकाबले इस बार भाजपा ने हिंदू वोटों की नाराज़गी को और गहरा किया है, वहीं 30% वाले मुस्लिम वोट बैंक में भी दरार डालने की कोशिश की है.

क्या राहुल गांधी ममता को हराना चाहते हैं? इस चुनाव का सबसे दिलचस्प पहलू कांग्रेस और विशेषकर राहुल गांधी की भूमिका है. हुगली के श्रीरामपुर जैसी रैलियों में राहुल गांधी ने ममता और मोदी को एक ही सिक्के के दो पहलू बताकर सीधा प्रहार किया है.

लेकिन क्या राहुल सच में ममता को हराना चाहते हैं?

श्रवण गर्ग का विश्लेषण इससे अलग है. उनका मानना है कि राहुल गांधी बंगाल में एक ‘सेफ्टी वाल्व’ की तरह काम कर रहे हैं. कांग्रेस की रणनीतिक कोशिश यह है कि ममता से नाराज़ हिंदू या हुमायूं कबीर जैसे नेताओं से असंतुष्ट मुस्लिम वोटर, भाजपा के खेमे में या ‘नोटा’ में जाने के बजाय कांग्रेस को वोट दे. इसका मुख्य उद्देश्य भाजपा को सीधे ध्रुवीकरण के फायदे से रोकना है. यही कारण है कि तृणमूल कांग्रेस भी राहुल गांधी के तीखे हमलों पर कोई आक्रामक प्रतिक्रिया नहीं दे रही है.

संस्थागत प्रहार: जब चुनाव आयोग और एजेंसियां बनीं प्रतिद्वंद्वी चर्चा में इस बात पर गंभीर चिंता व्यक्त की गई कि यह चुनाव ‘ममता बनाम भाजपा’ के बजाय ‘ममता बनाम व्यवस्था’ बन गया है. चुनाव आयोग की स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (एसआईआर) के तहत बंगाल में करीब 90 लाख से ज्यादा लोगों के नाम वोटर लिस्ट से काट दिए गए हैं, जिनमें बड़ी संख्या टीएमसी समर्थकों की मानी जा रही है. ईडी और सीबीआई जैसी एजेंसियों का लगातार दबाव और भवानीपुर जैसी जगहों पर वोटरों के नाम कटना यह दर्शाता है कि सत्ताधारी पार्टी को घेरने के लिए हर संभव ‘अनुचित’ कदम उठाए जा रहे हैं.

महिलाएं बनाम ‘वॉशिंग मशीन’ बंगाल की यह लड़ाई जेंडर के मोर्चे पर भी लड़ी जा रही है. एक तरफ ममता बनर्जी के नेतृत्व में महुआ मोइत्रा और सायोनी घोष जैसी जुझारू महिलाएं मोर्चे पर डटी हैं, तो दूसरी तरफ भाजपा के पास कोई बड़ा स्थानीय महिला चेहरा नहीं है. भाजपा का नेतृत्व मुख्य रूप से उन नेताओं के हाथ में है जो टीएमसी से निकलकर ‘वॉशिंग मशीन’ के जरिए भाजपा में आए हैं, जैसे सुवेंदु अधिकारी.

2029 की नींव और विपक्ष का भविष्य यह चुनाव प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह के लिए ‘करो या मरो’ का सवाल है. 2024 के लोकसभा चुनाव में बंगाल में 12 सीटों पर सिमटने के बाद, भाजपा 2029 की राह आसान करने के लिए बंगाल फतह करना चाहती है. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बन रहे दबावों और घरेलू राजनीति में विपक्ष को कमज़ोर करने के लिए बंगाल जीतना मोदी सरकार के लिए ऑक्सीजन जैसा है.

इस विशेष चर्चा का लब्बोलुआब यह है कि यदि ममता यह चक्रव्यूह भेदकर जीत जाती हैं, तो यह मोदी-शाह के अजेय होने के तिलिस्म को हमेशा के लिए तोड़ देगा. लेकिन अगर तमाम संस्थागत ताकतों के इस्तेमाल से भाजपा जीतती है, तो शायद देश में चुनाव लड़ने और जीतने की परिभाषा ही बदल जाएगी, जो विपक्ष-मुक्त भारत की दिशा में एक बड़ा और खतरनाक कदम हो सकता है.

Previous
Previous

किसका पलड़ा भारी है दो माह से जारी जंग के बाद..

Next
Next

बिरयानी के बाद तरबूज खाया और फिर 4 मौतें: मुंबई में एक त्रासदी जो 12 घंटों के भीतर घटित हुई