‘गोदी मीडिया हाय-हाय’ से जमीन पर विरोध तक: सीजेपी प्रदर्शन में टीवी पत्रकार निशाने पर क्यों आए
'ऑल्ट न्यूज़' में अनिंद्य और प्रतीक लिखते हैं कि नीट प्रश्नपत्र लीक के खिलाफ शुरू हुआ गुस्सा जब सड़कों पर उतरा, तो प्रदर्शनकारियों ने अपनी तीखी नाराजगी का एक बड़ा हिस्सा टेलीविजन मीडिया के खिलाफ भी जाहिर किया. उनका आरोप था कि मुख्यधारा का मीडिया जनता की आवाज बनने के बजाय सत्ता की आवाज बन गया है.
दिल्ली के जंतर-मंतर और आसपास के प्रदर्शन स्थलों पर टीवी पत्रकारों के पहुंचते ही कई बार ‘गोदी मीडिया हाय-हाय’ के नारे लगाए गए. एनडीटीवी, न्यूज़ एक्स, एबीपी न्यूज़ और टाइम्स नाउ जैसे चैनलों के लोगो वाले माइक या पहचान-पत्र लेकर पहुंचे पत्रकारों को प्रदर्शनकारियों ने घेरकर उनकी रिपोर्टिंग पर सवाल उठाए. कुछ मामलों में पत्रकारों से बदसलूकी हुई और कुछ घटनाएं शारीरिक टकराव तक पहुंच गईं. टाइम्स नाउ के पत्रकार देव कोटक के साथ धक्का-मुक्की का वीडियो भी सामने आया. मुंबई में जी न्यूज़ के एक पत्रकार को बारिश के बीच प्रदर्शनकारियों की हूटिंग का सामना करना पड़ा.
जंतर-मंतर पर लगे एक बैनर ने इस गुस्से को और स्पष्ट किया. इसमें रिपब्लिक के अर्नब गोस्वामी, डीडी के सुधीर चौधरी, एबीपी की चित्रा त्रिपाठी, आज तक की अंजना ओम कश्यप, न्यूज़18 के अमीश देवगन और टाइम्स नाउ नवभारत की रुबिका लियाकत की तस्वीरें थीं. बैनर पर उन्हें “भारत के सबसे बड़े दुश्मन” बताया गया था.
इन घटनाओं ने सवाल खड़ा किया कि युवा प्रदर्शनकारियों ने नेताओं और पुलिस के अलावा टीवी चैनलों को भी अपने विरोध का निशाना क्यों बनाया.
टेलीविजन पत्रकारों के खिलाफ बढ़ता गुस्सा
जून और जुलाई में दिल्ली में हुए प्रदर्शनों ने देशभर के छात्रों और युवाओं को एक मंच पर ला दिया. कॉकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी की शुरुआत नीट-यूजी प्रश्नपत्र लीक और परीक्षा व्यवस्था के खिलाफ व्यंग्यात्मक आंदोलन के रूप में हुई थी. बाद में यह सरकार से जवाबदेही मांगने वाले व्यापक युवा आंदोलन में बदल गया. प्रदर्शन बढ़ने के साथ शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग भी तेज हुई और अंततः जुलाई में उन्हें पद छोड़ना पड़ा.
प्रदर्शन का आकार बढ़ने पर बड़े टेलीविजन चैनलों ने घटनास्थल पर पत्रकार भेजे. लेकिन सामान्य लाइव रिपोर्टिंग के बजाय कई पत्रकारों को भीड़ के खुले विरोध और सवालों का सामना करना पड़ा. प्रदर्शनकारियों का कहना था कि वे पत्रकारों की व्यक्तिगत भूमिका के खिलाफ नहीं, बल्कि उन चैनलों की संपादकीय नीति के खिलाफ हैं, जिनका वे प्रतिनिधित्व कर रहे थे.
इसी वजह से कुछ पत्रकारों ने अपने चैनल के लोगो वाले माइक का इस्तेमाल बंद कर दिया. एनडीटीवी के शिव अरोड़ा और विष्णु सोम तथा इंडिया टुडे की प्रीति चौधरी उन पत्रकारों में शामिल थे, जिन्होंने बिना ब्रांड वाले माइक से रिपोर्टिंग की.
यह विरोध केवल कुछ अलग-अलग घटनाओं तक सीमित नहीं था. दिल्ली के कई स्थानों से सामने आए वीडियो में पत्रकारों और प्रदर्शनकारियों के बीच इसी तरह की बहस और टकराव दिखाई दिए. छोटे चैनलों के पत्रकारों को भी विरोध का सामना करना पड़ा, जिससे संकेत मिलता है कि गुस्सा केवल बड़े टेलीविजन संस्थानों के खिलाफ नहीं, बल्कि एक खास तरह की पत्रकारिता के खिलाफ था.
हालांकि, कई घटनाओं में विरोध और आलोचना की सीमा पार कर पत्रकारों को धमकाने, धक्का देने और शारीरिक रूप से परेशान करने की स्थिति भी बनी. पत्रकारों पर हिंसा को किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं किया जा सकता.
प्रदर्शनकारियों की नाराजगी की वजह
प्रदर्शनकारियों की मुख्य शिकायत थी कि मुख्यधारा के मीडिया ने जनता की आवाज उठाना बंद कर दिया है और वह सत्ता के पक्ष में खड़ा दिखाई देता है. उनके अनुसार, पिछले वर्षों में टेलीविजन चैनलों ने प्रश्नपत्र लीक, भर्ती परीक्षाओं में गड़बड़ी, बेरोजगारी, महंगाई और सार्वजनिक स्वास्थ्य जैसे मुद्दों पर सरकार से पर्याप्त सवाल नहीं पूछे.
इसके उलट, कई चैनलों पर रोजाना सांप्रदायिक बहस और उत्तेजक स्टूडियो कार्यक्रमों को प्रमुखता दी जाती है. प्रदर्शनकारियों का मानना था कि जिन मुद्दों से युवाओं की शिक्षा और भविष्य सीधे प्रभावित होते हैं, उन पर मीडिया उतनी गंभीरता नहीं दिखाता.
आंदोलन की छात्र नेता नेहा बोरा ने कहा कि गोदी मीडिया और आईटी सेल के जरिए सरकार का फैलाया गया नफरत का माहौल लोगों के घरों, व्हाट्सऐप समूहों और निजी जीवन तक पहुंच गया है. उनके अनुसार, मीडिया ने सरकार को सवालों से ऊपर रखने की कोशिश की है.
उन्होंने यह भी कहा कि जमीन पर काम करने वाले कई पत्रकार ईमानदारी से अपनी जिम्मेदारी निभाते हैं. इसलिए प्रदर्शनकारियों से अपील की गई थी कि वे पत्रकारों के साथ दुर्व्यवहार न करें. लेकिन उनके मुताबिक, मुख्यधारा के मीडिया का बड़ा हिस्सा बीजेपी के प्रचार तंत्र जैसा काम करता दिखाई देता है.
प्रदर्शनकारियों के गुस्से को उन खबरों और टिप्पणियों ने भी बढ़ाया, जिनमें सीजेपी आंदोलन को विदेशी साजिश, राष्ट्रविरोधी गतिविधि या सुरक्षा खतरे के रूप में पेश किया गया. कुछ टीवी एंकरों और राजनीतिक समर्थकों ने आंदोलन को चीन, अमेरिका, पाकिस्तान, बांग्लादेश और अन्य ताकतों से जोड़ने की कोशिश की. इससे प्रदर्शनकारियों को लगा कि उनकी वास्तविक मांगों को समझने के बजाय उनकी छवि खराब की जा रही है.
मीडिया की विश्वसनीयता का संकट
ऑल्ट न्यूज़ के अनुसार, यह अविश्वास केवल सीजेपी आंदोलन तक सीमित नहीं है. भारत-पाकिस्तान सैन्य तनाव के दौरान कई चैनलों पर पुराने, असंबंधित और झूठे वीडियो को वास्तविक युद्ध कवरेज के रूप में दिखाने के आरोप लगे. किसान आंदोलन के दौरान भी कई चैनलों ने किसानों और उनके नेताओं के खिलाफ भ्रामक दावों को बढ़ावा दिया.
मुख्यधारा के मीडिया पर सांप्रदायिक बहसों को सामान्य बनाने का आरोप भी लंबे समय से लगता रहा है. कई प्राइम-टाइम कार्यक्रमों में अल्पसंख्यकों के खिलाफ उत्तेजक भाषा और ध्रुवीकरण को जगह दी जाती है. इससे समाचार और प्रचार के बीच की सीमा धुंधली होती दिखाई देती है.
मीडिया की विश्वसनीयता पर सवाल केवल रिपोर्टिंग की सामग्री से नहीं, बल्कि उसके स्वामित्व और आर्थिक ढांचे से भी जुड़े हैं. कई बड़े मीडिया संस्थान बड़े कारोबारी समूहों के स्वामित्व में हैं, जिनके सरकार से करीबी संबंध हैं. टेलीविजन पत्रकारिता महंगी होने के कारण सरकारी विज्ञापनों और बड़े कॉरपोरेट विज्ञापनदाताओं पर निर्भर रहती है. इससे सत्ता के खिलाफ स्वतंत्र और आक्रामक पत्रकारिता की गुंजाइश सीमित हो सकती है.
सरकार के पक्ष में झुकाव हमेशा किसी स्पष्ट निर्देश के रूप में सामने नहीं आता. यह संपादकीय चयन में दिखाई देता है—विपक्ष शासित राज्यों की छोटी घटनाओं को बड़ी खबर बनाना, जबकि केंद्र या बीजेपी शासित राज्यों की गंभीर घटनाओं को कम महत्व देना. इसी तरह, विपक्ष से जुड़ी मामूली विवादित घटनाओं को व्यापक कवरेज मिलती है, जबकि सत्तारूढ़ दल को असहज करने वाले बड़े मुद्दे दब जाते हैं.
विरोध, हिंसा और जवाबदेही
पत्रकारों को बिना डर और दबाव के काम करने का अधिकार है. किसी रिपोर्टिंग से असहमति होने पर शारीरिक हमला या धमकी स्वीकार्य नहीं हो सकती. लेकिन पत्रकारों पर हुए हमलों की निंदा करते हुए उन कारणों की जांच से भी बचा नहीं जा सकता, जिन्होंने जनता के एक हिस्से में इतना गहरा अविश्वास पैदा किया है.
‘गोदी मीडिया हाय-हाय’ के नारे केवल कैमरे के सामने खड़े पत्रकारों के खिलाफ नहीं थे. वे उन संस्थानों के खिलाफ थे, जिन पर प्रदर्शनकारियों को लगता है कि उन्होंने सत्ता से सवाल पूछने की अपनी जिम्मेदारी छोड़ दी है.
यह धारणा पूरी तरह सही है या नहीं, इस पर बहस हो सकती है. लेकिन दिल्ली के प्रदर्शन यह जरूर दिखाते हैं कि युवाओं और मुख्यधारा के टेलीविजन मीडिया के बीच भरोसे की खाई गहरी हो चुकी है. यह खाई एक-दो घटनाओं से पैदा नहीं हुई और इसे भरने के लिए मीडिया संस्थानों को केवल पत्रकारों की सुरक्षा नहीं, बल्कि अपनी रिपोर्टिंग, स्वामित्व, संपादकीय स्वतंत्रता और जवाबदेही पर भी गंभीरता से विचार करना होगा.

