राकेश कायस्थ | देश ने देखी तबाही प्रधानमंत्री ने सुनी सिर्फ गाली!
द्रोण शिष्यों में अर्जुन अकेला था, जिसे केवल चिड़िया की आँख दिखाई दे रही थी. निशाना साधते वक्त बाकी राजकुमारों में किसी को पूरा पेड़ दिखाई दे रहा था, किसी को पेड़ के पीछे बहती नदी भी दिखाई दे रही थी. किसी को नदी में बहने का शोर भी सुनाई दे रहा था. अर्जुन विश्व का सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर था, इसलिए उसे केवल चिड़िया की आँख दिखाई दे रही थी.
प्रधानमंत्री मोदी को पिछले कई महीनों के शोर के बीच सिर्फ गालियां सुनाई दे रही हैं, मोटी-मोटी भद्दी गालियां. हर शब्द के साथ बनते दृश्य और उन दृश्यों के साथ अपने शयन कक्ष में अकेले और बेचैन प्रधानमंत्री. प्रधानमंत्री के धैर्य का बाँध टूटा, उन्होंने मोबाइल उसी तरह उठाया जिस तरह अर्जुन गांडीव उठाता था और लक्ष्य को साधकर दाग दी एक नई रील चिड़िया की आँख पर. विश्वगुरू ऐसा ही करते हैं.
पिछले कई महीनों में इस देश में तरह-तरह के शोर थे. नीट पेपर लीक होने के बाद जिन 20 से ज्यादा बच्चों ने जान दे दी, उनके माता-पिता के कलेजा चीरने वाले चीत्कार गूंज रहे थे. पूरे देश ने ये चीत्कार सुनी लेकिन प्रधानमंत्री ने नहीं सुनी.
जंतर-मंतर पर रात-दिन बैठे नौजवान प्रधानमंत्री और सरकार से कुछ कह रहे थे. वे कह रहे थे कि शिक्षा की संरचना को ध्वस्त करके आप विकसित भारत नहीं बना सकते हैं. छात्र कह रहे थे कि किसी 'बनाना रिपब्लिक' की तरह जीरो एकाउंटेबिलिटी वाला देश बनाकर आप भावी पीढ़ियों का भविष्य बर्बाद कर रहे हैं. देश हित में यह जरूरी है कि सरकार जिम्मेदारी लेना सीखे. पूरे देश ने ये सारी बातें सुनी लेकिन प्रधानमंत्री ने नहीं सुनी.
20 जुलाई को देश के नौजवानों ने शांतिपूर्ण तरीके से संसद की तरफ मार्च शुरू किया. यह एक सर्वविदित सत्य है कि दिल्ली पुलिस ने लगातार इस बात की कोशिश की कि किसी भी तरह यह प्रदर्शन हिंसक हो जाए ताकि इसे रौंद देने का कारण मिल सके. पत्थरों से भरा ट्रक रखवाने की दिल्ली पुलिस की साजिश न्यूजलॉन्ड्री जैसी मीडिया संस्थानों की रिपोर्टिंग में बेनकाब हो चुकी है.
सुरक्षा बलों ने बीजेपी-आरएसएस के गुंडों के साथ मिलकर छात्रों को बेरहमी से पीटा. लड़कियों के कपड़े फाड़े, उन्हें गलत तरीके से छुआ. इतना ही नहीं, उनके प्राइवेट पार्ट में डंडे तक घुसेड़े. पूरे देश ने यह सब कुछ देखा. प्रधानमंत्री ने यह सब नहीं देखा और बेरोजगार युवाओं को कोक्रोच बताने वाले सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्यकांत शर्मा ने यह सब देखने से इनकार कर दिया. वीडियो सबूतों के साथ पेश की गई याचिका को मी लॉर्डशिप ने यह कहते हुए खारिज कर दिया कि मेरे पास वक्त नहीं है.
प्रधानमंत्री जी को गालियां किसने दी? क्या अभिजीत दिपके या सौरव दास ने दी या कोक्रोच पार्टी के किसी अन्य पदाधिकारी ने दी? क्या कांग्रेस, समाजवादी पार्टी या सीपीआई(एमएल) जैसी किसी राजनीतिक पार्टी के किसी नेता ने दी? इनमें से किसी ने भी प्रधानमंत्री को गाली नहीं दी. प्रधानमंत्री को गाली इस देश के आम नौजवानों ने दी.
प्रधानमंत्री जी चाहते हैं कि आम नागरिकों की जिंदगी बर्बाद करने वाले फैसलों की कोई जिम्मेदारी सरकार न ले. छात्रों पर अंधा करने वाले पैलेट गन चलवाने की जिम्मेदारी गृह मंत्री अमित शाह न लें, लेकिन अगर राह चलते या सोशल मीडिया पर किसी ने गालियां दीं तो इसकी पूरी जिम्मेदारी उन लोगों पर आए जो शिक्षा प्रणाली में सुधार के लिए आंदोलन कर रहे हैं. क्या यह अपने आप में अनोखी बात नहीं है?
प्रधानमंत्री ने इंस्टाग्राम पर जो ताजा रील साझा की है, उसका ठीक से विश्लेषण किए जाने की जरूरत है. शिक्षा के घटिया बाजारीकरण और परीक्षा प्रणाली के ध्वस्त होने की जो रफ्तार है, वह आने वाले बरसों में इस देश के युवाओं को किसी काम का नहीं छोड़ेगी. बेहतर होता अगर प्रधानमंत्री को ये बातें परेशान करतीं और वे इस दिशा में कोई कार्य योजना लेकर आते.
दुर्भाग्य यह है कि प्रधानमंत्री ने इन बड़े सवालों पर नहीं बल्कि पिछले कुछ दिनों से सिर्फ गालियों पर मनन किया है. वे कह रहे हैं कि लड़कियों का गालियां देना उनके लिए कल्चरल शॉक है. बीजेपी के इंटेलेक्चुअल सेल के पूर्व प्रमुख और पार्टी के एक बड़े नेता ने कहा कि जंतर-मंतर पर आई लड़कियों और औरतों को बलात्कार करवाने में मजा आता है, इसलिए उनका रेप होना चाहिए. प्रधानमंत्री जी के लिए यह कोई कल्चरल शॉक नहीं था. आखिर क्यों?
ऐसा इसलिए क्योंकि प्रधानमंत्री जानते हैं कि बीजेपी-आरएसएस का कल्चर यही है. गालियां, हिंसा और जान से मारने की धमकी, ये सब बिल्कुल आम है. गालियां हताशा का प्रकटीकरण हैं, एक तरह की शब्दिक हिंसा हैं. बीजेपी-आरएसएस की बुनियाद ही हिंसा पर आधारित है. 1990 के दंगों से लेकर गुजरात तक अगर ये सब न होते, क्या आज मोदी सत्ता में होते? बीजेपी का हर दूसरा नेता आए दिन गांधी-नेहरू परिवार के लिए बेहद भद्दी भाषा का इस्तेमाल करता है. कर्नाटक में बीजेपी के एक सिटिंग विधायक ने धमकी दी कि घर में घुसकर राहुल गांधी के पूरे परिवार को मिटा देंगे. प्रधानमंत्री को कोई कल्चरल शॉक नहीं लगा.
क्या प्रधानमंत्री इस बात से आहत हैं कि देश के नौजवान अब उनसे उसी शैली में बात करने लगे हैं, जिसे उनकी पार्टी के कार्यकर्ता बरसों से हथियार की तरह इस्तेमाल करते आए हैं? रील में प्रधानमंत्री की देहभाषा और शब्दों के चयन पर गौर कीजिए. "क्षमा", "हमारे बच्चे" जैसे शब्दों के बीच उनकी तरफ से एक प्रच्छन्न धमकी भी दिखाई देती है.
वे कह रहे हैं कि बच्चे अदालतों के चक्कर लगाएं, यह अच्छी बात नहीं है. प्रधानमंत्री मोदी का लहजा ठीक वैसा था, जिस लहजे में ट्रंप ने उन्हें संदेश दिया था कि मैं आपका राजनीतिक करियर बर्बाद नहीं करना चाहता. जंतर-मंतर पर चल रहे आंदोलन के वक्त पूरा देश एकजुट लग रहा था. फिलहाल ऐसी कोई सामूहिकता नहीं है और शायद उसकी जरूरत भी नहीं है. इसका फायदा उठाकर सरकारी तंत्र भय का नया माहौल तैयार कर रहा है.
नाबालिग बच्चों की पहचान उजागर करके उन्हें आईटी सेल और ट्रोल आर्मी के हवाले किया जा रहा है. पुलिस घरों पर दबिश दे रही है, ताकि आम भारतीय माता-पिता डर जाएं और आगे कभी सड़क पर उतरने जैसी स्थिति पैदा हो तो वे अपने बच्चों को घर में बंद कर दें. प्रदर्शन में शामिल समूहों को अलग-अलग तरह से चिन्हित करके उन्हें प्रताड़ित किया जा रहा है. आंदोलनकारियों को खाना खिलाने वाले मेरठ के मुस्लिम लड़के के दूर-दराज के रिश्तेदारों तक को उठवा लेना यह बताता है कि सरकार के इरादे क्या हैं.
कोक्रोच आंदोलन के स्थगित या खत्म होने के बाद प्रधानमंत्री का जो व्यवहार है, उससे दो बातें साबित होती हैं. पहला, देश के प्रधानमंत्री बड़े सवालों से परे सिर्फ गालियों पर चिंतन-मनन करते हैं. दूसरा, उन्हें इस बात पर गुस्सा आता है कि उनका हथियार कोई उनके खिलाफ किस तरह इस्तेमाल कर सकता है.
आने वाले दिनों में दमन की छिटपुट कार्रवाइयां देखने को मिलेंगी, ताकि पूरे देश में भय का वातावरण बने. लेकिन जंतर-मंतर पर जो हुआ, उसके बाद देश के नौजवानों का डर उसी वक्त खत्म हो गया. सरकार फिलहाल अपने ही देश के युवाओं के साथ एक तरह का छाया युद्ध लड़ रही है. यह लड़ाई खत्म नहीं होगी.

