चूल्हे पर खुद बैठे मंत्री: बंदी संजय अपने ही संकट को क्यों हवा दे रहे हैं

‘साउथ फर्स्ट’ के मुताबिक,  तेलंगाना भाजपा के नेता और केंद्रीय गृह राज्य मंत्री बंदी संजय कुमार इस समय सिर्फ़ विपक्ष के निशाने पर नहीं हैं, बल्कि अपनी ही राजनीतिक रणनीति के कारण मुश्किलों में घिरते दिखाई दे रहे हैं. उनके बेटे का नाम पॉक्सो मामले में आने के बाद भाजपा जहां इस विवाद से दूरी बनाने की कोशिश कर रही थी, वहीं बंदी संजय लगातार ऐसे कदम उठा रहे हैं जिनसे मामला शांत होने के बजाय और सुर्खियों में आ रहा है.

राजनीतिक गलियारों में अब यह सवाल पूछा जा रहा है कि आखिर बंदी संजय ऐसा क्यों कर रहे हैं.

दो हफ्ते पहले उनके बेटे की गिरफ्तारी के बाद से बंदी संजय लगातार सार्वजनिक बयान दे रहे हैं. कभी बेटे का बचाव, कभी विरोधियों पर हमला और कभी इसे राजनीतिक साज़िश बताने की कोशिश. लेकिन सबसे ज़्यादा चर्चा उनके हालिया भाजपा कार्यालय दौरे की हो रही है.

20 मई को बंदी संजय अचानक हैदराबाद स्थित भाजपा तेलंगाना कार्यालय पहुंचे. यह दौरा न तो पार्टी कार्यक्रम का हिस्सा था और न ही इसकी कोई औपचारिक ज़रूरत थी. लेकिन इस यात्रा ने पार्टी के भीतर उनकी राजनीतिक स्थिति को उजागर कर दिया.

बताया गया कि सुबह से ही उनके सहयोगी नेताओं को फोन और संदेश भेज रहे थे कि बंदी संजय पार्टी कार्यालय आएंगे और उनकी मौजूदगी चाहते हैं. इसके बावजूद पार्टी के बड़े नेता, सांसद, विधायक और महत्वपूर्ण पदाधिकारी वहां नहीं पहुंचे.

राज्य इकाई के अध्यक्ष एन रामचंदर राव दिल्ली में थे. खबरों के मुताबिक़ वह पार्टी नेतृत्व को पूरे मामले पर रिपोर्ट देने गए थे. पार्टी पहले से ही इस विवाद से खुद को अलग दिखाने की कोशिश कर रही थी. ऐसे में बंदी संजय का पार्टी कार्यालय पहुंचकर बेटे के मामले पर बयान देना भाजपा की आधिकारिक लाइन के उलट माना गया.

कार्यालय में बंदी संजय के साथ सिर्फ़ कुछ समर्थक और निचले स्तर के कार्यकर्ता दिखाई दिए. समर्थक नारे लगा रहे थे और माहौल ऐसा बनाया जा रहा था मानो कोई राजनीतिक विजय हासिल हुई हो. लेकिन पार्टी के भीतर इस पूरे घटनाक्रम को असहजता के साथ देखा गया.

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि वरिष्ठ नेताओं की अनुपस्थिति अपने आप में एक संदेश थी. सामान्य परिस्थितियों में पार्टी कार्यालय में कई पदाधिकारी मौजूद रहते हैं, लेकिन इस बार दूरी साफ़ दिखाई दी.

इसी दौरान बंदी संजय ने पत्रकारों से कहा, “क्या आपने कभी किसी पिता को अपने बेटे को पुलिस के हवाले करते देखा है?”

उनका यह बयान सहानुभूति हासिल करने की कोशिश माना गया, लेकिन इसने नए सवाल भी खड़े कर दिए. विपक्ष ने पलटकर पूछा कि क्या पहले कभी किसी केंद्रीय मंत्री के बेटे का नाम पॉक्सो जैसे गंभीर मामले में आया है.

आलोचकों का कहना है कि अगर बंदी संजय चुप रहते तो शायद मामला धीरे-धीरे राजनीतिक बहस से बाहर हो जाता. लेकिन लगातार बयानबाज़ी ने विवाद को ज़िंदा रखा.

दिलचस्प बात यह है कि शुरुआती दिनों में आक्रामक रुख अपनाने वाली बीआरएस ने भी बाद में अपने हमले धीमे कर दिए थे. पार्टी के भीतर यह राय बनी कि मामला जांच के दायरे में है और ज़्यादा राजनीतिक हमला “विच-हंट” जैसा दिख सकता है.

लेकिन भाजपा और कांग्रेस के कुछ नेताओं के बयान फिर चर्चा का कारण बन गए. भाजपा विधायक राकेश रेड्डी ने पूरे मामले को “पारिवारिक मामला” बताया, जिसके बाद उनकी टिप्पणियां सोशल मीडिया पर वायरल हो गईं.

वहीं कांग्रेस सांसद मल्लू रवि ने बंदी संजय का बचाव करते हुए केसीआर परिवार का उदाहरण दिया. उन्होंने पूछा कि जब कविता की गिरफ्तारी हुई थी तब क्या केसीआर या केटीआर ने इस्तीफा दिया था. हालांकि राजनीतिक विश्लेषकों ने इस तुलना को कमजोर बताया, क्योंकि उस समय केसीआर परिवार सत्ता में नहीं था और जांच को प्रभावित करने की स्थिति में भी नहीं था.

इस पूरे विवाद के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मंत्रिपरिषद बैठक और संभावित कैबिनेट फेरबदल की चर्चा भी तेज़ है. रिपोर्ट्स के मुताबिक़ सरकार दो साल पूरे होने पर मंत्रिमंडल में बड़े बदलाव की तैयारी कर रही है.

ऐसे समय में बंदी संजय पर लगा यह विवाद भाजपा नेतृत्व के लिए असहज स्थिति पैदा कर सकता है. पार्टी पहले ही उन नेताओं से दूरी बनाने की रणनीति पर काम कर रही है जिन पर गंभीर आरोप हैं या जिनकी वजह से राजनीतिक नुकसान की आशंका है.

तेलंगाना भाजपा के भीतर भी यह मामला सिर्फ़ कानूनी संकट नहीं, बल्कि राजनीतिक संकट बन चुका है.

सबसे बड़ा सवाल अब यही है कि क्या बंदी संजय अपनी राजनीतिक लड़ाई खुद मुश्किल बना रहे हैं. जिस समय चुप्पी शायद उनके लिए सबसे सुरक्षित रणनीति हो सकती थी, उसी समय उन्होंने लगातार बयान और सार्वजनिक प्रदर्शन का रास्ता चुना.

राजनीति में कई बार संकट से निकलने का सबसे आसान तरीका पीछे हटना होता है. लेकिन बंदी संजय फिलहाल उल्टा रास्ता चुनते दिखाई दे रहे हैं. ऐसा रास्ता जिसमें आग बुझाने के बजाय खुद चूल्हे पर बैठकर आंच तेज़ कर दी गई हो.

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