ग्रेटर निकोबार परियोजनाओं के खिलाफ दो लाख से अधिक लोगों ने याचिका पर हस्ताक्षर किए

ग्रेटर निकोबार द्वीप पर केंद्र सरकार द्वारा नियोजित परियोजनाओं को वापस लेने का आग्रह करने वाली एक ऑनलाइन याचिका पर गुरुवार रात (21 मई) तक 2.10 लाख से अधिक हस्ताक्षर हो चुके हैं.

‘द वायर’ के अनुसार, यह याचिका उन परियोजनाओं के कारण होने वाले "व्यापक वनों की कटाई" पर प्रकाश डालती है और द्वीप पर विकास के लिए स्थायी व पर्यावरण-अनुकूल विकल्पों को बढ़ावा देने की आवश्यकता पर जोर देती है.

केंद्र सरकार ने अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के सबसे दक्षिणी द्वीप, ग्रेटर निकोबार पर कई बुनियादी ढांचा (इन्फ्रास्ट्रक्चर) परियोजनाओं की योजना बनाई है. इनमें एक अंतरराष्ट्रीय ट्रांसशिपमेंट कंटेनर टर्मिनल, एक ग्रीनफील्ड हवाई अड्डा, एक टाउनशिप और एक पावर प्लांट शामिल हैं. जीवविज्ञानी, सामाजिक वैज्ञानिक, संरक्षणवादी और सेवानिवृत्त सिविल सेवकों सहित नागरिकों ने कई चिंताएं उठाई हैं, जैसे कि परियोजनाओं के लिए काटे जाने वाले पेड़ों की संख्या का सरकार द्वारा कम आकलन करना, एक त्रुटिपूर्ण पर्यावरण प्रभाव आकलन, स्थानीय समुदायों के विरोध को नजरअंदाज करना, और परियोजनाओं के कार्यान्वयन की अनुमति देने के लिए वन अधिकार अधिनियम सहित अन्य कानूनों को दरकिनार करना.

याचिका में इनमें से कई चिंताओं को दोहराया गया है: 9.6 लाख पेड़ों को काटकर 130 वर्ग किलोमीटर के वर्षावन को नष्ट करना (हालांकि कुछ विशेषज्ञ इस संख्या को लगभग दस लाख बताते हैं). बंदरगाह परियोजना से द्वीप के दक्षिण-पूर्वी हिस्से में स्थित 'गलथिया खाड़ी' की जैव विविधता को खतरा होना. परियोजनाओं के कारण वहां की मूल जनजातियों (शौम्पेन और निकोबारी) का विस्थापित होना और उन पर बुरा असर पड़ना. परियोजनाओं में गहन प्रभाव आकलनों (पारिस्थितिक, सामाजिक और पर्यावरणीय) की कमी होना. इन परियोजनाओं को एक ऐसे क्षेत्र में प्रस्तावित किया गया है जो अत्यधिक भूकंपीय गतिविधि का गवाह है और सूनामी के प्रति संवेदनशील है.

याचिका में कहा गया है, “इस परियोजना में आवासीय टाउनशिप और होटलों के माध्यम से शहरी विकास शामिल है, जो व्यावसायिक और आर्थिक लाभों को उजागर करता है. हालांकि, आर्थिक विकास पर यह ध्यान गंभीर पारिस्थितिक और सामाजिक प्रभावों की कीमत पर आ रहा है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है.”

पूर्व राष्ट्रपति ए.पी.जे. अब्दुल कलाम द्वारा प्रस्तावित एक स्थायी ग्रामीण विकास रणनीति द्वारा शुरू की गई यह याचिका राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, तथा केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय के तहत राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड को संबोधित है.

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