सेवंती नाइनन | सत्ता का दबाव और मीडिया का अटूट साहस

सेवंती नाइनन के अनुसार, राज्य (सरकार) द्वारा मीडिया को अपने पक्ष में करने के कथित लंबे सिलसिले के बाद, पिछले महीने 'द इंडियन एक्सप्रेस' द्वारा भारत के निर्वाचन आयोग पर किए गए खुलासों ने भारतीय मीडिया से जुड़े आख्यान (नैरेटिव) को पहले की तुलना में अधिक सूक्ष्म और बहुआयामी बना दिया है. चूंकि केंद्र सरकार बड़े और छोटे मुद्दों को लेकर लगातार आलोचनाओं का सामना कर रही है, इसलिए कई मीडिया संस्थान न केवल इसका पर्दाफाश करने बल्कि ऐसा लगातार करते रहने की भी कीमत चुका रहे हैं.

सेवंती का मानना है कि भारत के राज्यों में चुनाव, परिणाम को लेकर अनिश्चित रहने वाली सत्ताधारी पार्टी के लिए तेजी से चुनौतीपूर्ण होते जा रहे हैं. यही वजह है कि चुनावी प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने और उसके बाद होने वाले संभावित विरोध का जोखिम उठाने की होड़ देखी जा रही है. कुशासन और शासन की अनुपस्थिति के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करने के लिए उभरी ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के आगमन ने, मतदाता सूचियों में सरकार के संशोधन का विरोध करने के स्तर (डेसिबल लेवल) को और बढ़ा दिया है. इससे विपक्षी दलों और मीडिया दोनों को रोजाना की खुराक मिल रही है.

विरोध प्रदर्शनों और खुलासों का मुकाबला करने के क्रम में, मीडिया को प्रतिबंधित करना और उसकी साख को कमतर करना सरकार की बड़ी रणनीति का हिस्सा बन गया है. लेकिन प्रिंट और डिजिटल मीडिया संस्थानों की व्यापक उपस्थिति को देखते हुए, उनका मुकाबला करना आसान नहीं है. इस महीने की शुरुआत में मुर्शिदाबाद और पूर्व मेदिनीपुर जिलों में क्रमशः रेजीनगर और नंदीग्राम विधानसभा उपचुनाव, इस बात का परीक्षण थे कि चुनावी प्रक्रिया में राज्य के हस्तक्षेप से सत्ताधारी पार्टी को क्या हासिल हो सकता है. सुप्रीम कोर्ट ने इन्हें "केवल उपचुनाव" बताते हुए हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया. लेकिन विभिन्न मीडिया संस्थानों के पत्रकार चुनावी प्रक्रिया को कमजोर करने में राज्य की भारी-भरकम भूमिका को दर्ज (दस्तावेजीकृत) करने के लिए मौके पर मौजूद थे. ‘स्क्रॉल.इन’ के एक वीडियो में पुलिस को पत्रकारों से यह पूछते हुए रिकॉर्ड किया गया कि वे लोगों से बात करने के लिए उनके घरों में क्यों घुस रहे हैं, जिन्हें वे जानते तक नहीं हैं.

रेजीनगर से ‘स्क्रॉल.इन’ की हेडलाइन ने सब कुछ बयां कर दिया: "ग्राउंड रिपोर्ट: बंगाल उपचुनाव में मुस्लिम मतदाताओं को रोका गया, विपक्ष गिरफ्तार, पत्रकारों पर पाबंदी." 'द टेलीग्राफ' ने भी रिपोर्ट दी कि बंगाल के रेजीनगर और नंदीग्राम उपचुनावों में मतदाताओं की उंगलियों पर स्याही तो लगाई गई, लेकिन उन्हें वोट डालने की "अनुमति नहीं दी गई".  ‘स्क्रॉल.इन’ की रिपोर्ट में एक महत्वपूर्ण विवरण यह था कि रेजीनगर में पुलिस द्वारा इस्तेमाल की गई तीसरी रणनीति, मतदान से पहले वाले पूरे सप्ताह के दौरान कई प्रमुख स्थानीय पत्रकारों के सोशल मीडिया पेजों को ब्लॉक (प्रतिबंधित) करना था. इसमें कहा गया कि उनमें से कई पेजों को मतदान समाप्त होने के बाद ही अनब्लॉक किया गया. ‘ऑल्टन्यूज़’ ने भी इस बात की पुष्टि की कि मुर्शिदाबाद के स्थानीय पत्रकारों द्वारा चलाए जा रहे कम से कम एक दर्जन फेसबुक पेजों को अस्थायी रूप से प्रतिबंधित किया गया था—मेटा की मदद से की गई यह एक तरह की पूर्व-सेंसरशिप (प्री-सेंसरशिप) थी. 'मुर्शिदाबाद टुडे' और 'मुर्शिदाबाद न्यूज़ टाइम' दोनों के प्रकाशकों को (जिनके फेसबुक पर लाखों फॉलोअर्स थे) मेटा से टेकडाउन (सामग्री हटाने के) नोटिस मिले; इनमें से पहले को देर रात के अभियानों में पुलिस द्वारा 'आम जनता उन्नयन पार्टी' के कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिए जाने से जुड़े विशिष्ट वीडियो के लिए नोटिस मिला था. अत्यंत स्थानीय रिपोर्टिंग पर बारीक नजर रखना—जो मतदान की अनियमितताओं को उजागर कर सकती थी—स्थानीय चुनावी रणनीति का हिस्सा बन गया.

लेकिन जब पुलिस और चुनाव प्रबंधक आम पत्रकारों के आमने-सामने होते हैं, तो वे अक्सर यह भूल जाते हैं कि मीडिया की यह जांच-पड़ताल काफी अटूट और अडिग हो सकती है, जो चुनाव का शोर और धूल शांत होने के बाद भी समाप्त नहीं होती. उपचुनाव खत्म हो चुका है, लेकिन रिपोर्टें लगातार आ रही हैं. महज दो दिन पहले, 'द वायर' ने एक लंबी और विस्तृत रिपोर्ट प्रकाशित की कि कैसे चुनाव आयोग के सॉफ्टवेयर ने बिना कोई कारण बताए ऑटो-जनरेटेड अस्वीकृतियों के जरिए बंगाल के 5.38 लाख मतदाताओं के नाम हटा दिए. यदि अदालतें अंततः घटना के बाद न्याय देने का फैसला करती हैं, तो साक्ष्य लगातार एकत्र हो रहे हैं.

पिछले महीने दिल्ली में हुए विरोध प्रदर्शनों के दौरान पत्रकारों पर कई शारीरिक हमलों की खबरें आईं, साथ ही सोशल मीडिया पर रिपोर्टिंग को बदनाम करने के सरकार के प्रयास भी देखे गए. पुलिस की कथित ज्यादतियों पर याचिकाओं की सुनवाई के दौरान, सॉलिसिटर-जनरल तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि अधिकारियों को एक रील-मेकर और एक वास्तविक स्वतंत्र (फ्रीलांस) पत्रकार के बीच अंतर करने में संघर्ष करना पड़ता है. ‘सीएनएन-न्यूज़18’ जैसे मुख्यधारा के टेलीविजन चैनलों के अपमानजनक आख्यानों ने इस विषय को और बढ़ावा दिया है; उन्होंने ओपन-सोर्स इंटेलिजेंस के सबूतों का हवाला देते हुए उन रकमों का उल्लेख किया जो बिना किसी विशिष्ट ठोस सबूत के नुकसानदेह रिपोर्ट पोस्ट करने के लिए कथित तौर पर व्यक्तियों को दी गई थीं. 'कंटेंट क्रिएटर' शब्द अब विरोध प्रदर्शनों की रिपोर्टिंग से जुड़ी हेडलाइंस में दिखाई देने लगा है—जैसे कि "सीजेपी के विरोध प्रदर्शनों के बीच दिल्ली में सुरक्षा सख्त होने पर प्रदर्शनकारी और कंटेंट क्रिएटर्स हिरासत में" (रिपब्लिक वर्ल्ड).

मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ विरोध प्रदर्शन की इस पूरी अवधि के दौरान पत्रकारों ने जो काम नहीं किया, वह था उसी समय पूरे भारत में विभिन्न कारणों से हो रहे अन्य विरोध प्रदर्शनों को पर्याप्त स्थान न देना—जैसे कृषि ऋण माफी, छात्रों के लिए हॉस्टल सुविधाएं, बेहतर सड़कें, ध्वनि प्रदूषण, महाराष्ट्र लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित परीक्षा जैसी सरकारी भर्ती परीक्षाओं में अनियमितताएं और पेपर लीक, तथा चुनाव आयोग के कामकाज को लेकर राज्यों में हो रहे प्रदर्शन. महाराष्ट्र में गन्ने के किसान विरोध प्रदर्शन कर रहे थे और पुणे-बेंगलुरु राष्ट्रीय राजमार्ग को बाधित कर रहे थे. उत्तर प्रदेश में, एमबीबीएस डॉक्टरों ने वेतन विसंगति और लंबित बकाया वेतन को लेकर विरोध प्रदर्शन किया और काम का बहिष्कार करने की घोषणा की. उत्तर प्रदेश के ही बिजनौर में किसानों ने गन्ने के लंबित बकाए और तेंदुए के खौफ को लेकर विरोध जताने के लिए पुलिस बैरिकेड्स तोड़ दिए.

अंग्रेजी मीडिया के लिए कौन से विरोध प्रदर्शन खबर बनते हैं, इसका एक वर्ग-संबंधी पहलू भी है, लेकिन शासन करने वाले फिर भी व्यापक असंतोष के पैमाने और भविष्य के चुनावों पर इसके संभावित प्रभाव से अच्छी तरह वाकिफ हैं, जिसमें अगले साल उत्तर प्रदेश में होने वाले चुनाव भी शामिल हैं. राजनीतिक विश्लेषक यह सुझाव देते रहे हैं कि यदि सरकार का राजनीतिक भविष्य दांव पर है, तो वह मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के मुद्दे पर पीछे नहीं हटेगी. लेकिन इसी वजह से, देश भर के विभिन्न स्तरों के पत्रकार जोखिमों के बावजूद जांच-पड़ताल जारी रखने के लिए प्रेरित होंगे.

(सेवंती नाइनन एक मीडिया टिप्पणीकार हैं और TheHoot.org की संस्थापक संपादक रही हैं. वह सबस्टैक पर 'वर्कर वेब' नाम से एक न्यूज़लेटर और इसी नाम से एक व्हाट्सएप चैनल चलाती हैं. उनका यह लेख हिंदी में अनूदित किया गया है.)

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