नदीम खान | कानून का चयनात्मक इस्तेमाल कब तक मुसलमानों के खिलाफ होगा?
'हरकारा डीप डाइव' के लाइव एपिसोड में निधीश त्यागी एवं एपीसीआर के नेशनल सेक्रेटरी नदीम खान के साथ सहारनपुर में मस्जिद पर हुई बुलडोजर कार्रवाई और देश के अलग-अलग हिस्सों में धार्मिक स्थलों पर हो रही कार्रवाई के पैटर्न पर विस्तार से चर्चा हुई. बातचीत का केंद्रीय सवाल यह रहा कि क्या ये घटनाएं अलग-अलग स्थानीय विवाद हैं या इनके पीछे एक व्यापक और संगठित राजनीतिक रणनीति काम कर रही है.
सहारनपुर की घटना का जिक्र करते हुए नदीम खान ने कहा कि यहां मामला सिर्फ संपत्ति के विवाद तक सीमित नहीं है, बल्कि "ड्यू प्रोसेस" का सवाल सबसे महत्वपूर्ण है. उनके अनुसार, अदालत के आदेश में कार्रवाई का उल्लेख था, लेकिन सीधे ध्वस्तीकरण का आदेश नहीं था. इसके बावजूद अपील का पर्याप्त अवसर दिए बिना सुबह बुलडोजर की कार्रवाई की गई. उन्होंने सवाल उठाया कि जब किसी संपत्ति को लेकर कानूनी विवाद चल रहा हो तो संबंधित पक्ष को ऊपरी अदालत में जाने का अवसर क्यों नहीं दिया गया.
बातचीत में धार्मिक स्थलों के खिलाफ कार्रवाई के व्यापक संदर्भ पर भी चर्चा हुई. मस्जिदों के साथ दरगाहों और मदरसों पर हुई कार्रवाई का उल्लेख करते हुए नदीम खान ने गुजरात, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश और राजस्थान के कई मामलों को एक बड़े पैटर्न से जोड़कर देखा. उन्होंने आरोप लगाया कि कई मामलों में अदालत के आदेश आने से पहले ही स्थानीय प्रशासन कार्रवाई के लिए तैयार दिखाई देता है. सहारनपुर में बड़ी संख्या में पुलिस बल की मौजूदगी को भी इसी संदर्भ में सवालों के घेरे में रखा गया.
चर्चा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा न्यायपालिका की भूमिका को लेकर रहा. नदीम खान ने 1991 के पूजा स्थल अधिनियम का उल्लेख करते हुए कहा कि धार्मिक स्थलों से जुड़े विवादों में इस कानून की भावना और प्रावधानों का पालन होना चाहिए. उन्होंने निचली अदालतों में आने वाले सर्वे और अन्य आदेशों तथा उच्च न्यायपालिका की भूमिका पर भी गंभीर सवाल उठाए. उनके अनुसार, यदि सर्वोच्च न्यायालय दिशानिर्देश जारी करता है तो उन दिशानिर्देशों के पालन की जवाबदेही भी सुनिश्चित होनी चाहिए.
बातचीत में यह भी सामने आया कि ऐसी कार्रवाइयों का असर केवल धार्मिक स्थलों तक सीमित नहीं रहता. विरोध करने वाले स्थानीय लोगों और सामाजिक कार्यकर्ताओं पर भी मुकदमे दर्ज होने या उन्हें गिरफ्तार किए जाने की बात कही गई. नदीम खान के मुताबिक, इससे प्रभावित पक्षों पर इतना दबाव बन जाता है कि वे कानूनी लड़ाई आगे बढ़ाने से भी पीछे हटने लगते हैं.
बुलडोजर कार्रवाई के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों और उनके कथित उल्लंघन पर भी चर्चा हुई. नदीम खान ने कहा कि व्यक्तिगत मामलों में प्रभावित लोगों के पास अदालत तक पहुंचने के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं होते. ऐसे में कानूनी सहायता और दस्तावेजीकरण बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है. उन्होंने न्यायिक जवाबदेही और लोकतांत्रिक जन आंदोलनों को आगे की लड़ाई के महत्वपूर्ण रास्तों के रूप में बताया.
बातचीत के अंतिम हिस्से में सहारनपुर और उत्तर प्रदेश के राजनीतिक संदर्भ पर चर्चा हुई. नदीम खान ने कहा कि प्रभावित समुदाय में गुस्सा और दुख जरूर है, लेकिन साथ ही इस बात की समझ भी है कि हिंसा की ओर धकेलना एक राजनीतिक जाल हो सकता है. उन्होंने दावा किया कि सहारनपुर में अब तक लोगों ने उकसावे के बावजूद हिंसा का रास्ता नहीं अपनाया.
पूरी बातचीत का निष्कर्ष यह रहा कि धार्मिक स्थलों पर कार्रवाई को केवल अलग-अलग घटनाओं के रूप में देखने के बजाय उसके कानूनी, प्रशासनिक और राजनीतिक संदर्भ को समझना जरूरी है. हरकारा डीप डाइव का उद्देश्य इन्हीं घटनाओं को उत्तेजना के बजाय दस्तावेजों, सवालों और व्यापक संदर्भ के साथ देखने की कोशिश है.
पूरी बातचीत हरकारा रोज़ाना के यूट्यूब चैनल पर सुन सकते हैं.

