पहलगाम: एक साल बाद भी, मोदी सरकार ने उन ‘चूक’ पर स्थिति स्पष्ट नहीं की जिनके कारण हमला हुआ

पहलगाम आतंकवादी हमले के एक साल बाद भी, भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने अभी तक उन “चूक” को स्पष्ट नहीं किया है, जिनकी वजह से बंदूकधारियों के एक समूह ने जम्मू-कश्मीर में नागरिकों पर अब तक के सबसे घातक हमलों में से एक को अंजाम दिया. सरकार ने यह भी नहीं बताया है कि इसके बाद क्या उपचारात्मक कदम उठाए गए और क्या किसी की जवाबदेही तय की गई है.

जहांगीर अली की रिपोर्ट के अनुसार, न तो किसी अधिकारी की जिम्मेदारी तय की गई है और न ही भविष्य के लिए किए गए सुधारात्मक उपायों का खुलासा किया गया है. जबकि 24 अप्रैल 2025 को हुई सर्वदलीय बैठक में गृह मंत्रालय ने स्वीकार किया था कि सुरक्षा में भारी चूक हुई थी, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं दिखी है.

हमले से पहले खुफिया एजेंसियों ने पर्यटकों को निशाना बनाए जाने की चेतावनी दी थी. हालाँकि, यह स्थान स्पष्ट नहीं था, लेकिन सुरक्षा विशेषज्ञों का तर्क है कि बैसरन जैसे लोकप्रिय और संवेदनशील स्थान को पूरी तरह असुरक्षित छोड़ना अक्षम्य है. हमले से महज 15 दिन पहले गृह मंत्री अमित शाह ने श्रीनगर में ‘यूनिफाइड कमांड’ (यूसी) की बैठक की थी, लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि पर्यटकों की सुरक्षा पर वहां कोई चर्चा हुई या नहीं. पूर्व वार्ताकार राधा कुमार का कहना है कि सरकार सुरक्षा तंत्र की विफलता के लिए सीधे दोषी भले न हो, लेकिन वह जवाबदेही से बच नहीं सकती.

एनआईए की जांच से पता चला कि ‘ऑपरेशन महादेव’ में मारे गए तीनों हमलावर नरसंहार से दो दिन पहले से ही पहलगाम में डेरा डाले हुए थे. इनमें से एक आतंकी, सुलेमान, पहले भी जेड-मोड़ सुरंग हमले में शामिल रहा था. राधा कुमार ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार का कश्मीरियों के प्रति “अविश्वास का रवैया” सुरक्षा में बड़ी दरारें पैदा कर रहा है. स्थानीय पुलिस और खुफिया तंत्र के साथ उचित समन्वय और परामर्श की कमी के कारण आतंकियों की गतिविधियों का पता नहीं चल सका. गृह मंत्रालय का यह तर्क कि बैसरन को खोलने के लिए “पुलिस अनुमति नहीं ली गई थी”, विशेषज्ञों द्वारा हास्यास्पद बताया गया है, क्योंकि ऐसी अनुमति की परंपरा पहले कभी नहीं रही.

सैन्यीकरण के बावजूद सुरक्षा की कमी

पहलगाम एक अत्यधिक सैन्यीकृत क्षेत्र है, जहाँ अमरनाथ यात्रा के कारण सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम रहते हैं. बैसरन के 10 किमी के भीतर सेना का कैंप और 5 किमी पर सीआरपीएफ की चौकी होने के बावजूद, पर्यटकों के रास्ते पर कोई सुरक्षाकर्मी तैनात नहीं था. चौंकाने वाली बात यह है कि बैसरन के लिए निर्धारित सीआरपीएफ की दो कंपनियों में से एक को हमले से ठीक पहले कहीं और तैनात कर दिया गया था. इसके अतिरिक्त, पुलिस द्वारा जारी किए गए हमलावरों के स्केच भी बाद में एनआईए द्वारा गलत पाए गए, जो जांच और जमीनी स्तर के समन्वय की कमजोरी को उजागर करता है.

अनुच्छेद 370 और शांति के दावों पर सवाल

इस हमले ने केंद्र सरकार के उन दावों की हवा निकाल दी है कि अनुच्छेद 370 के हटने के बाद घाटी में पूर्ण शांति लौट आई है. विपक्षी दलों और सुरक्षा विशेषज्ञों ने ‘यूनिफाइड कमांड’ की भूमिका पर सवाल उठाए हैं, जिसके प्रमुख उपराज्यपाल (एलजी) होते हैं. वरिष्ठ पत्रकार आदित्य सिन्हा के अनुसार, इतनी बड़ी चूक के बाद उपराज्यपाल को हटाया जाना चाहिए था, लेकिन वे अब भी पद पर बने हुए हैं. रिपोर्ट बताती है कि जवाबदेही तय करने के बजाय, सरकार अक्सर ‘दमनकारी नीतियों’ का सहारा लेती है, जो अल्पकालिक शांति तो ला सकती हैं, लेकिन दीर्घकालिक असंतोष को जन्म देती हैं.

जनसंपर्क और खुफिया तंत्र का क्षरण

राधा कुमार का तर्क है कि प्रभावी खुफिया तंत्र स्थानीय लोगों के साथ अच्छे संबंधों पर निर्भर करता है. सरकार द्वारा कश्मीरी युवाओं को संदिग्ध मानकर हिरासत में लेना या घरों को नष्ट करना जनता को और अधिक अलग-थलग कर रहा है. डिजिटल सर्विलांस के दौर में भी मानवीय खुफिया जानकारी का कोई विकल्प नहीं है, जो केवल भरोसे के माहौल में ही मिल सकती है.

पहलगाम की बरसी पर यह रिपोर्ट एक कड़वा सच बयां करती है कि भारत में सुरक्षा चूक के मामलों में आंतरिक सुधार और जवाबदेही की संस्कृति का अभाव है. 2008 के मुंबई हमलों के बाद तत्कालीन गृह मंत्री शिवराज पाटिल का इस्तीफा जवाबदेही का अंतिम बड़ा उदाहरण था. वर्तमान में, सरकार की “हार्ड सिक्योरिटी अप्रोच” और संवाद की कमी ने कश्मीर में सुरक्षा अंतराल को और गहरा कर दिया है. जब तक स्थानीय स्तर पर विश्वास बहाली और अधिकारियों की जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक पहलगाम जैसी त्रासदियों का खतरा बना रहेगा.

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