श्रवण गर्ग | अमित शाह के गुस्से के पीछे क्या है?

‘हरकारा डीप डाइव’ के लाइव एपिसोड में निधीश त्यागी ने वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग के साथ अमित शाह के हालिया बयानों, संसद में उनके टकराव और सरकार की बदलती राजनीतिक स्थिति पर चर्चा की.

15 अगस्त के बाद अमित शाह का सोनिया गांधी पर वंदे मातरम को लेकर हमला राजनीतिक बहस का नया केंद्र बन गया है. श्रवण गर्ग के मुताबिक, इस बयान को सिर्फ एक राजनीतिक हमला मानकर नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि इसके पीछे सरकार की मौजूदा बेचैनी को भी समझना जरूरी है. उनका कहना है कि अमित शाह इस समय काफी नाराज और गुस्से में दिखाई दे रहे हैं और 20 जुलाई के बाद उनके चेहरे और बॉडी लैंग्वेज में बदलाव साफ नजर आता है.

श्रवण गर्ग का सवाल है कि आखिर गृह मंत्री को गुस्सा किस बात का है. उनके मुताबिक, संसद में जिन महत्वपूर्ण विधेयकों को अमित शाह को पेश करना था, उनमें से कुछ दूसरे मंत्रियों को पेश करने पड़े. यहां तक कि वंदे मातरम से जुड़ा विधेयक भी वह खुद पेश नहीं कर पाए. इसी पृष्ठभूमि में सोनिया गांधी पर उनके हमले को देखा जाना चाहिए.

वंदे मातरम विवाद पर श्रवण गर्ग का कहना है कि अगर अमित शाह का आरोप सही है तो इसकी जांच होनी चाहिए. लेकिन उनका बड़ा सवाल इससे आगे है. उनके मुताबिक, सरकार को असल समस्या कहीं और है और कांग्रेस तथा सोनिया गांधी पर हमला उस समस्या का "रेफर्ड पेन" है. वह कहते हैं कि पिछले 12 वर्षों में सत्ता की राजनीति विपक्ष को खत्म करने की दिशा में बढ़ती गई, लेकिन सरकार यह समझ नहीं पाई कि राजनीतिक विपक्ष कमजोर होने के बाद जनता खुद विपक्ष में बदल सकती है.

श्रवण गर्ग के मुताबिक, छात्रों के आंदोलन और उसके बाद गृह मंत्री के कार्यक्रमों में विरोध इस बदलाव का संकेत हैं. वह सवाल उठाते हैं कि आखिर आम लोगों और युवाओं में गृह मंत्री को काले झंडे दिखाने की हिम्मत कहां से आई. उनके अनुसार, पहली बार विपक्ष को यह महसूस हुआ है कि जनता उसके साथ खड़ी हो सकती है और पहली बार भाजपा को भी यह एहसास हुआ है कि जनता उसके खिलाफ जा सकती है.

वहीं, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह की प्रतिक्रियाओं में अंतर भी श्रवण गर्ग को महत्वपूर्ण लगता है. उनका कहना है कि प्रधानमंत्री ने 15 अगस्त के भाषण में छात्रों पर हुई कार्रवाई को लेकर कोई स्पष्ट बचाव नहीं किया. इसके उलट अमित शाह लगातार कांग्रेस पर हमला कर रहे हैं. श्रवण गर्ग के मुताबिक, "अमित शाह के लिए दांव पर ज्यादा है प्रधानमंत्री के मुकाबले और वो ज्यादा हिले हुए हैं."

इसी राजनीतिक बेचैनी को वह परिसीमन विधेयक से भी जोड़ते हैं. उनके मुताबिक, जिस राजनीतिक परियोजना की तैयारी नई संसद की इमारत बनने के समय से चल रही थी, वह अब अटकती दिखाई दे रही है. उनका तर्क है कि अगर यह योजना आगे नहीं बढ़ती, तो सरकार के सामने राजनीतिक चुनौती और बड़ी हो सकती है.

आखिर में श्रवण गर्ग का निष्कर्ष है कि सरकार अपनी लोकप्रियता और साख बचाने की जितनी कोशिश कर रही है, उतना ही मामला उल्टा पड़ता दिखाई दे रहा है. वह कहते हैं, "सरकार के पैरों के नीचे से जमीन खिसकती हुई नजर आ रही है." अब सवाल सिर्फ अमित शाह के गुस्से का नहीं, बल्कि उस राजनीतिक बदलाव का है जिसे सरकार अभी स्वीकार करने की स्थिति में दिखाई नहीं देती. पूरी बातचीत यहां सुन सकते हैं. 

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