युवा आंदोलनों से भाजपा क्यों डरती है? विरोध से निपटने की चार-स्तरीय रणनीति की पड़ताल

‘द क्विंट’ के मुताबिक,6 जून को जंतर-मंतर पर हुए कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के प्रदर्शन की सबसे दिलचस्प बात सिर्फ युवाओं की मौजूदगी नहीं थी, बल्कि केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस का रवैया भी था. प्रदर्शन को अनुमति मिली, लोगों को पहुंचने से नहीं रोका गया और पुलिस की ओर से किसी बड़े टकराव की खबर भी नहीं आई.

क्या इसका मतलब यह है कि नरेंद्र मोदी सरकार परोक्ष रूप से इस आंदोलन का समर्थन कर रही है? जरूरी नहीं.

फिलहाल इससे सिर्फ इतना संकेत मिलता है कि सरकार ने इस विरोध प्रदर्शन को होने दिया. इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं. पहला, पेपर लीक को लेकर बढ़ते जनाक्रोश को एक नियंत्रित रास्ता देना. दूसरा, यह दिखाना कि भारत में लोकतांत्रिक विरोध के लिए जगह मौजूद है. तीसरा, सोशल मीडिया से बाहर सीजेपी की वास्तविक ताकत का आकलन करना.

पिछले एक दशक का राजनीतिक इतिहास बताता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह युवा आंदोलनों को बेहद गंभीरता से लेते हैं. उनकी सबसे बड़ी चिंता यह रही है कि युवाओं का असंतोष कहीं राजनीतिक चुनौती में न बदल जाए. इसी वजह से भाजपा ने समय-समय पर अलग-अलग रणनीतियां अपनाई हैं. इन्हें मोटे तौर पर चार शब्दों में समझा जा सकता है—दमन, समायोजन, विभाजन और वैधता पर सवाल.

इन रणनीतियों का इस्तेमाल उन नेताओं और आंदोलनों के खिलाफ देखा गया है, जिनमें युवाओं को आकर्षित करने की क्षमता थी.

राहुल गांधी और उनकी युवा ब्रिगेड

2011 के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन और 2014 के लोकसभा चुनावों के दौर को याद कीजिए. उस समय राहुल गांधी के खिलाफ एक बड़ा राजनीतिक और डिजिटल अभियान चलाया गया. उन्हें व्यवस्था की तमाम खामियों का प्रतीक बताने की कोशिश की गई.

दिलचस्प बात यह थी कि उस समय राहुल गांधी सरकार का हिस्सा नहीं थे. वे कांग्रेस संगठन में सक्रिय थे और उनके आसपास युवा नेताओं की एक पूरी पीढ़ी मौजूद थी. भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ नहीं चाहते थे कि बदलाव की राजनीति कांग्रेस के भीतर नेतृत्व परिवर्तन तक सीमित रह जाए. इसलिए राहुल गांधी को एक वैकल्पिक युवा नेता के रूप में उभरने से पहले ही कमजोर करने की कोशिश हुई.

बाद के वर्षों में राहुल गांधी की युवा टीम के कई चेहरे कांग्रेस छोड़कर भाजपा या अन्य दलों में चले गए. इससे कांग्रेस की उस युवा राजनीतिक धारा को भी झटका लगा, जिसे कभी भविष्य का नेतृत्व माना जाता था.

हार्दिक पटेल और अल्पेश ठाकोर

2017 के गुजरात विधानसभा चुनाव में भाजपा को सबसे बड़ी चुनौती हार्दिक पटेल, अल्पेश ठाकोर और जिग्नेश मेवाणी जैसे युवा नेताओं से मिली.

हार्दिक पटेल ने पाटीदार आंदोलन के जरिए भाजपा के एक मजबूत सामाजिक आधार को चुनौती दी. आंदोलन के दौरान उन पर और उनके सहयोगियों पर कई मामले दर्ज हुए. लेकिन कुछ वर्षों बाद राजनीतिक परिस्थितियां बदलीं और हार्दिक पटेल भाजपा में शामिल हो गए. अल्पेश ठाकोर भी इससे पहले भाजपा का हिस्सा बन चुके थे.

यह उदाहरण बताता है कि कई बार सत्ता विरोधी आंदोलनों से निकले नेताओं को बाद में राजनीतिक व्यवस्था का हिस्सा बना लिया जाता है. वहीं जो नेता समझौते का रास्ता नहीं चुनते, वे लगातार संघर्ष की स्थिति में बने रहते हैं.

असम के सीएए विरोधी आंदोलनकारी

असम में नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ आंदोलन देश के बाकी हिस्सों से अलग था. यहां आंदोलन का नेतृत्व मुख्य रूप से असमिया युवाओं ने किया था. इसलिए यह भाजपा के लिए एक अलग तरह की चुनौती बन गया.

भाजपा ने यहां भी दोहरी रणनीति अपनाई. आंदोलन से जुड़े कुछ नेताओं को अपने साथ जोड़ लिया गया. दूसरी ओर आंदोलन के प्रमुख चेहरों में शामिल अखिल गोगोई को लंबे समय तक जेल में रहना पड़ा. अन्य नेताओं को भी हिरासत और दबाव का सामना करना पड़ा.

इससे यह संकेत मिलता है कि सत्ता उन आंदोलनों को सिर्फ कानून-व्यवस्था के नजरिए से नहीं, बल्कि उनके राजनीतिक प्रभाव के आधार पर भी देखती है.

युवा असंतोष और राजनीति

भारत का युवा आज कई तरह की परेशानियों से घिरा हुआ है. बेरोजगारी एक बड़ी समस्या बनी हुई है. उच्च शिक्षा प्राप्त युवाओं को रोजगार नहीं मिल रहा. कैंपस प्लेसमेंट कमजोर हुए हैं. शुरुआती वेतन में खास बढ़ोतरी नहीं हुई है. अग्निवीर जैसी नीतियों ने भी कुछ क्षेत्रों के युवाओं में असंतोष पैदा किया है.

ऐसे माहौल में पेपर लीक की घटनाएं युवाओं के गुस्से को और बढ़ा देती हैं. यह उस युवा के लिए बड़ा झटका है जो वर्षों की तैयारी के बाद किसी परीक्षा में सफलता की उम्मीद कर रहा हो.

आलोचकों का तर्क है कि सरकार इन समस्याओं के मूल कारणों पर काम करने के बजाय उनके राजनीतिक असर को नियंत्रित करने में अधिक रुचि रखती है. जब तक विरोध किसी विशेष मुद्दे तक सीमित रहता है, उसे सहन किया जाता है. लेकिन जैसे ही वह व्यापक राजनीतिक बदलाव की मांग करने लगता है, सत्ता का रवैया बदल सकता है.

सबके लिए एक जैसी नीति नहीं

लेख में यह भी तर्क दिया गया है कि यह रणनीति सभी पर समान रूप से लागू नहीं होती. कुछ नेताओं के लिए राजनीतिक मुख्यधारा में लौटने के रास्ते खुले रहते हैं, जबकि कुछ दूसरे नेताओं को लंबे समय तक कानूनी और राजनीतिक दबाव का सामना करना पड़ता है.

इसी वजह से आलोचक कहते हैं कि अलग-अलग सामाजिक और राजनीतिक समूहों के साथ सत्ता का व्यवहार भी अलग-अलग दिखाई देता है.

सीजेपी के लिए इसका क्या मतलब है?

फिलहाल भाजपा ने सीजेपी के प्रति खुला टकराव नहीं अपनाया है. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नेताओं ने भी कहा है कि अलग-अलग विचारों के लिए लोकतंत्र में जगह होनी चाहिए. जंतर-मंतर प्रदर्शन के दौरान प्रशासन का रवैया भी इसी दिशा में दिखाई देता है.

लेकिन बहुत जल्द सीजेपी के सामने एक बड़ा सवाल होगा. यदि उसे सरकार से अपनी मांगों पर ठोस कार्रवाई चाहिए, तो उसे अपने आंदोलन को अगले स्तर तक ले जाना होगा. और यदि ऐसा होता है, तो उसे भारतीय राजनीति की उन रणनीतियों का सामना करने के लिए भी तैयार रहना पड़ सकता है जिनका इस्तेमाल पहले कई युवा आंदोलनों और नेताओं के खिलाफ किया जा चुका है.

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