भारतीय पासपोर्ट नागरिकता का प्रमाण क्यों नहीं है. और क्यों कोई एक दस्तावेज़ पर्याप्त नहीं है
वह बयान जिसने नई बहस छेड़ दी
स्क्रोल के मुताबिक, मतदाता सूची की विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया के बीच विदेश मंत्रालय के एक बयान ने देशभर में नागरिकता को लेकर नई बहस छेड़ दी है. मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि भारतीय पासपोर्ट एक यात्रा दस्तावेज़ है, नागरिकता का अंतिम और निर्णायक प्रमाण नहीं. यह बयान ऐसे समय आया है जब नागरिकता, मतदाता सूची और पहचान से जुड़े सवाल राजनीतिक बहस के केंद्र में हैं.
कानूनी रूप से यह कोई नई बात नहीं है. पासपोर्ट अधिनियम, 1967 की धारा 20 के तहत केंद्र सरकार कुछ विशेष परिस्थितियों में गैर-नागरिकों को भी भारतीय पासपोर्ट जारी कर सकती है. इसी वजह से पासपोर्ट को नागरिकता का निर्णायक प्रमाण नहीं माना जाता.
हालांकि व्यवहार में पासपोर्ट को नागरिकता का मजबूत संकेत माना जाता है, क्योंकि यह सरकार द्वारा जारी किया जाता है और आमतौर पर नागरिकों को ही दिया जाता है.
1950 की संवैधानिक व्यवस्था
जब 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू हुआ, तब नागरिकता का प्रश्न संविधान के अनुच्छेद 5, 6 और 7 के माध्यम से तय किया गया. ये प्रावधान विभाजन और भारत-पाकिस्तान के बीच हुए बड़े पैमाने के पलायन की पृष्ठभूमि में तैयार किए गए थे.
हालांकि यह एक अस्थायी संवैधानिक व्यवस्था थी. बाद में नागरिकता का पूरा ढांचा नागरिकता अधिनियम, 1955 के तहत संचालित होने लगा और संसद ने समय-समय पर इसमें महत्वपूर्ण संशोधन किए.
कैसे बदलते गए भारत में जन्म से नागरिकता पाने के नियम
पहला चरण: 1950 से 1987 तक
इस अवधि में भारत में जन्म लेने वाला हर व्यक्ति स्वतः भारतीय नागरिक माना जाता था. माता-पिता की नागरिकता या कानूनी स्थिति का कोई महत्व नहीं था. इसे "जस सोली" यानी जन्मस्थान आधारित नागरिकता कहा जाता है.
दूसरा चरण: 1987 से 2004 तक
1986 के संशोधन के बाद नियम बदले गए. 1 जुलाई 1987 से यह शर्त लागू कर दी गई कि बच्चे के कम से कम एक माता-पिता का भारतीय नागरिक होना आवश्यक होगा.
इस बदलाव की पृष्ठभूमि में असम आंदोलन, असम समझौता और बांग्लादेश से अवैध प्रवासन को लेकर बढ़ती चिंताएं थीं.
तीसरा चरण: 2004 से अब तक
3 दिसंबर 2004 से लागू संशोधन ने नियमों को और सख्त कर दिया. अब भारत में जन्म लेने वाला बच्चा तभी नागरिक माना जाएगा जब दोनों माता-पिता भारतीय नागरिक हों, या एक भारतीय नागरिक हो और दूसरा अवैध प्रवासी न हो.
यदि माता-पिता में से कोई एक अवैध प्रवासी है, तो भारत में जन्म लेने के बावजूद बच्चे को नागरिकता नहीं मिलेगी.
जब कानून नागरिकताविहीनता का खतरा पैदा करता है
यहीं से एक जटिल मानवीय प्रश्न पैदा होता है. मान लीजिए किसी बच्चे का पिता भारतीय नागरिक है, लेकिन मां को अवैध प्रवासी माना जाता है. ऐसी स्थिति में बच्चे को जन्म के आधार पर भारतीय नागरिकता नहीं मिलेगी.
यदि दूसरे देश भी उसे अपना नागरिक स्वीकार न करें, तो उसके सामने नागरिकताविहीन होने का खतरा पैदा हो सकता है. सीमावर्ती राज्यों पंजाब, राजस्थान, पश्चिम बंगाल और असम में प्रशासन को ऐसे मामलों का सामना करना पड़ा है.
सुप्रीम कोर्ट ने अवैध प्रवासन को रोकने की आवश्यकता को स्वीकार किया है, लेकिन नागरिकताविहीनता के जोखिम से जुड़े सवाल आज भी पूरी तरह हल नहीं हुए हैं.
तिब्बती शरणार्थियों के मामलों ने क्या बताया?
नागरिकता कानून की सबसे चर्चित व्याख्याओं में तिब्बती शरणार्थियों से जुड़े मामले शामिल हैं.
दिल्ली हाईकोर्ट ने 2010 और 2016 के महत्वपूर्ण फैसलों में कहा कि 30 जून 1987 से पहले भारत में जन्मे तिब्बती भारतीय नागरिकता के पात्र हैं, क्योंकि उस समय जन्म आधारित नागरिकता का नियम लागू था.
इसके बाद चुनाव आयोग और विदेश मंत्रालय ने भी ऐसे तिब्बतियों के अधिकारों को मान्यता दी. इन मामलों ने दिखाया कि कानून में केवल एक दिन का अंतर भी नागरिकता की स्थिति को पूरी तरह बदल सकता है.
एसआईआर ने जिस सच्चाई को सामने ला दिया
बिहार में चल रही विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया ने पहली बार बड़े पैमाने पर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि भारतीय नागरिकता साबित कैसे की जाए.
चुनाव आयोग का कहना है कि मतदाता सूची में केवल भारतीय नागरिकों के नाम होने चाहिए. लेकिन इसी प्रक्रिया ने यह भी उजागर कर दिया कि अधिकांश भारतीयों के पास ऐसा कोई दस्तावेज़ नहीं है जिसे हर परिस्थिति में नागरिकता का अंतिम प्रमाण माना जा सके.
मई 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि चुनाव आयोग नागरिकता तय नहीं कर सकता. उसका अधिकार केवल मतदाता सूची की पात्रता तक सीमित है. नागरिकता से जुड़े विवादों का फैसला केवल कानून के तहत सक्षम प्राधिकारी ही कर सकता है.
आधार, वोटर आईडी और पासपोर्ट की सीमा
इस पूरे विवाद ने यह भी स्पष्ट किया है कि कई लोकप्रिय दस्तावेज़ों की कानूनी सीमाएं हैं.
आधार कार्ड पहचान और निवास का प्रमाण है, नागरिकता का नहीं.
वोटर आईडी यह दिखाती है कि किसी व्यक्ति का नाम मतदाता सूची में दर्ज है, लेकिन यह भी नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं है.
पासपोर्ट यात्रा के अधिकार से जुड़ा दस्तावेज़ है, हालांकि व्यवहार में इसे नागरिकता के मजबूत प्रमाण के रूप में देखा जाता है.
आखिर भारतीय नागरिकता साबित क्या करती है?
यही वह प्रश्न है जिसका सीधा और सार्वभौमिक उत्तर आज भी उपलब्ध नहीं है.
विशेषज्ञों के अनुसार नागरिकता पंजीकरण प्रमाणपत्र और प्राकृतिककरण प्रमाणपत्र सबसे मजबूत दस्तावेज़ हैं. लेकिन ये केवल सीमित संख्या में लोगों के पास होते हैं.
इसके अलावा जन्म प्रमाणपत्र, माता-पिता के दस्तावेज़, भूमि रिकॉर्ड, स्कूल प्रमाणपत्र, पुराने मतदाता रिकॉर्ड और अन्य पारिवारिक अभिलेख नागरिकता साबित करने में मदद कर सकते हैं.
असम में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) की प्रक्रिया के दौरान भी ऐसे "लीगेसी दस्तावेज़ों" का उपयोग किया गया था.
दुनिया में क्या हो रहा है?
भारत अकेला देश नहीं है जिसने जन्म आधारित नागरिकता के नियमों को सख्त किया है. कई देशों में प्रवासन और नागरिकता को लेकर बहसें तेज हुई हैं.
अमेरिका अब भी बड़े पैमाने पर जन्म आधारित नागरिकता को मान्यता देता है, हालांकि वहां भी इस व्यवस्था को सीमित करने की राजनीतिक कोशिशें होती रही हैं.
भारत में नागरिकता कानून में बदलाव संसद के माध्यम से अपेक्षाकृत आसानी से किए जा सकते हैं, इसलिए यहां जन्म आधारित नागरिकता का ढांचा समय के साथ बदलता गया.
आगे की चुनौतियां
इस पूरे विवाद ने तीन बड़े सवाल सामने रख दिए हैं.
पहला, ऐसे बच्चों के लिए क्या व्यवस्था होगी जो नागरिकताविहीन होने के खतरे में हैं.
दूसरा, क्या भारत को सभी नागरिकों के लिए एक सार्वभौमिक और अंतिम नागरिकता दस्तावेज़ की आवश्यकता है.
तीसरा, नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) और भविष्य में संभावित नागरिकता रजिस्टर जैसे मुद्दों के बीच भारत अपने नागरिकता ढांचे को किस दिशा में ले जाएगा.
विदेश मंत्रालय के बयान का असली मतलब
विदेश मंत्रालय ने कोई नई कानूनी व्याख्या नहीं दी है. उसने केवल उस वास्तविकता को दोहराया है जो दशकों से कानून में मौजूद है.
लेकिन इस बयान ने एक महत्वपूर्ण प्रश्न को फिर से केंद्र में ला दिया है. अगर पासपोर्ट, आधार और वोटर आईडी नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं हैं, तो आम भारतीय नागरिक अपनी नागरिकता किस दस्तावेज़ से सिद्ध करेगा?
जब तक इस प्रश्न का स्पष्ट, सरल और सार्वभौमिक उत्तर नहीं मिलता, तब तक पहचान और नागरिकता के बीच का यह भ्रम बना रहेगा. एसआईआर विवाद ने केवल उस समस्या को उजागर किया है जो लंबे समय से भारतीय प्रशासनिक और कानूनी व्यवस्था के भीतर मौजूद है.

