इंदु भूषण पांडे | यही रामलला इन्हें शीर्ष पर ले गए हैं और लोग अब चर्चा कर रहे हैं कि यही रामलला इन्हें मिट्टी में भी मिला सकते हैं.
‘हरकारा डीप डाइव’ के इस लाइव एपिसोड में निधीश त्यागी ने अयोध्या के वरिष्ठ पत्रकार इंदु भूषण पांडे से राम मंदिर में चढ़ावे और दान से जुड़े कथित अनियमितताओं पर विस्तार से चर्चा की. बातचीत का केंद्र केवल चोरी या घोटाले के आरोप नहीं थे, बल्कि उससे जुड़े बड़े सवाल थे कि जवाबदेही किसकी है, जांच की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी है और इतने दिनों बाद भी एफआईआर क्यों दर्ज नहीं हुई है.
इंदु भूषण पांडे ने कहा कि अयोध्या का महत्व केवल एक धार्मिक स्थल के रूप में नहीं बल्कि एक राजनीतिक और वैचारिक केंद्र के रूप में भी रहा है. उनके अनुसार राम मंदिर आंदोलन और उसके बाद सुप्रीम कोर्ट के फैसले से बने ट्रस्ट ने इस पूरे ढांचे को संभाला है. ऐसे में यदि चढ़ावे में गड़बड़ी या चोरी के आरोप सामने आते हैं तो सबसे पहली जिम्मेदारी ट्रस्ट की बनती है कि वह एफआईआर दर्ज करे और पूरी प्रक्रिया को सार्वजनिक करे. लेकिन अब तक ऐसा नहीं हुआ है.
चर्चा में यह भी सामने आया कि जांच एसआईटी को सौंप दी गई है, लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि जांच का दायरा क्या है और किन बिंदुओं पर जांच हो रही है. पांडे ने सवाल उठाया कि जब तक जांच की शर्तें और प्रक्रिया सार्वजनिक नहीं होती तब तक पारदर्शिता पर सवाल बने रहेंगे. उन्होंने यह भी कहा कि यह असामान्य स्थिति है कि जिस संस्था के भीतर कथित गड़बड़ी हुई है उसी के अनुरोध पर जांच शुरू हुई है.
बातचीत के दौरान ट्रस्ट से जुड़े कई नामों का उल्लेख हुआ. निर्माण प्रभारी नृपेंद्र मिश्रा के उन बयानों का संदर्भ दिया गया जिनमें उन्होंने इस मामले को साधारण चोरी नहीं बल्कि गंभीर लापरवाही और डकैती जैसा बताया है. इसके अलावा चढ़ावे की गणना और प्रबंधन से जुड़े रहे कुछ लोगों के सार्वजनिक आरोपों का भी जिक्र हुआ जिन्होंने कहा है कि दान और वस्तुओं के रिकॉर्ड में गंभीर अनियमितताएं हैं.
निधीश त्यागी ने इस पूरे मामले को राजनीतिक संदर्भ में रखते हुए सवाल उठाया कि जब राम मंदिर आंदोलन को भाजपा और संघ परिवार ने अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत किया तो अब इस विवाद पर शीर्ष नेतृत्व की चुप्पी क्यों है. उन्होंने कहा कि जब श्रेय लेने की बात होती है तो पूरा तंत्र सक्रिय दिखता है लेकिन जवाबदेही के समय मौन दिखाई देता है.
चर्चा में केंद्र और राज्य सरकार की भूमिका पर भी बात हुई. यह तर्क सामने आया कि ट्रस्ट का गठन केंद्र सरकार द्वारा किया गया था इसलिए प्राथमिक जिम्मेदारी भी उसी की बनती है. वहीं दूसरी ओर यह धारणा भी सामने आई कि लोगों को उम्मीद है कि उत्तर प्रदेश सरकार विशेषकर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ इस मामले में कठोर कार्रवाई करेंगे.
अंत में चर्चा इस निष्कर्ष पर पहुंची कि राम मंदिर से जुड़ा यह विवाद केवल चढ़ावे या दान की अनियमितताओं तक सीमित नहीं है. यह पारदर्शिता, संस्थागत जवाबदेही और सत्ता तथा धार्मिक संस्थानों के बीच संबंधों पर गंभीर प्रश्न खड़ा करता है. आने वाले समय में एसआईटी की रिपोर्ट और सरकार की कार्रवाई यह तय करेगी कि यह मामला एक प्रशासनिक जांच बनकर समाप्त होता है या एक बड़े राजनीतिक और संस्थागत विवाद में बदलता है. पूरी बातचीत यहाँ देख सकते हैं.

