तमिलनाडु की राजनीति में उलटफेर; अन्नामलाई दिल्ली में, बीजेपी से यह कहने कि “साथ यहीं तक था”

वे एक ऐसे नेता थे जिन्होंने दो बड़े द्रविड़ दलों के वर्चस्व वाले कठिन राजनीतिक परिदृश्य में बीजेपी की दृश्यता और साख को बढ़ाया, लेकिन अंततः उन्हें दरकिनार कर दिया गया क्योंकि व्यावहारिक राजनीति के तकाजों ने पार्टी को उनकी इच्छाओं के खिलाफ जाने और अन्नाद्रमुक (एआईएडीएमके) के साथ गठबंधन करने पर मजबूर कर दिया. ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ में अरुण जनार्दनन के अनुसार, सोमवार को, तमिलनाडु बीजेपी के पूर्व अध्यक्ष के. अन्नामलाई अपने पार्टी आकाओं को धन्यवाद देने और उन्हें यह बताने के लिए दिल्ली पहुँचे कि वे उनसे अलग हो रहे हैं.

पिछले कई हफ्तों से अन्नामलाई के राजनीतिक भविष्य को लेकर अटकलें तेज थीं, जिसका उन्होंने कभी स्पष्ट खंडन नहीं किया. बीजेपी के आंतरिक हलकों में बहस इस बात पर केंद्रित हो गई थी कि आखिर वे चाहते क्या हैं. राष्ट्रीय नेतृत्व को उनका संदेश स्पष्ट था: या तो उन्हें कम से कम सात वर्षों के लिए पूर्ण स्वायत्तता (ऑटोनॉमी) के साथ राज्य में नेतृत्व का अधिकार मिले, या फिर उन्हें अलग राजनीतिक रास्ता चुनने की अनुमति दी जाए. पांच वर्षों से अन्नामलाई को तमिलनाडु में बीजेपी के भविष्य के रूप में देखा जा रहा था. उनकी ऊर्जा और संगठनात्मक क्षमता के आलोचक भी कायल थे, लेकिन उनकी पहचान बीजेपी के पारंपरिक वैचारिक ढांचे में पूरी तरह फिट नहीं बैठती थी. कट्टरपंथी राजनीति के विपरीत, उनके भाषण तमिल पहचान, सुशासन, भ्रष्टाचार और प्रशासनिक सुधारों के इर्द-गिर्द केंद्रित थे. विश्लेषक उनके इस दृष्टिकोण को शास्त्रीय हिंदुत्व के बजाय महत्वाकांक्षी द्रविड़ राजनीति के अधिक करीब मानते हैं. समर्थकों का तर्क है कि उनकी प्राथमिकता वैचारिक कट्टरता नहीं, बल्कि एक नया राजनीतिक विकल्प तैयार करने के लिए पर्याप्त स्वतंत्रता हासिल करना रही है.

पार्टी के भीतर एक धड़े का मानना है कि केंद्रीय नेतृत्व ने चुनाव के दौरान तमिलनाडु की जमीनी हकीकत को समझने में चूक की. यदि अन्नामलाई को अधिक प्रमुखता और स्वायत्तता दी गई होती, तो शायद जोसेफ विजय राज्य में राजनीतिक बदलाव के इकलौते निर्विवाद प्रतीक बनकर नहीं उभरते. चुनावों से ठीक पहले दरकिनार किए जाने के बावजूद, अन्नामलाई एनडीए के सबसे लोकप्रिय प्रचारकों में से एक रहे और भीड़ जुटाने में अन्नाद्रमुक के शीर्ष नेताओं को टक्कर देते दिखे.

बहरहाल, एक नई राजनीतिक जमीन तैयार करना जोखिम भरा है.  राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सूत्रों का मानना है कि नई पार्टी के गठन के लिए अत्यधिक वित्तीय और सांगठनिक संसाधनों की आवश्यकता होती है. इसके अलावा, विजय की पार्टी टीवीके पहले ही सत्ता-विरोधी नैरेटिव पर मजबूत पकड़ बना चुकी है.

यदि अन्नामलाई स्वतंत्र राह चुनते हैं, तो वे पीएमके, डीएमडीके और वामपंथियों जैसे स्थापित क्षेत्रीय दलों को कड़ी टक्कर दे सकते हैं. विशेषकर पश्चिमी तमिलनाडु के ओबीसी-गौंडर बाहुल्य क्षेत्रों में—जिस समुदाय से वे स्वयं आते हैं—वे अन्नाद्रमुक के वोट बैंक में बड़ी सेंध लगा सकते हैं.

कुछ समय पहले तक अन्नामलाई के सामने चुनौती तमिलनाडु में बीजेपी का विस्तार करने की थी, लेकिन आज उनकी चुनौती इसके ठीक उलट है. अब उन्हें अपनी ऊर्जा और महत्वाकांक्षा के लिए एक ऐसा राजनीतिक माध्यम तलाशना है जो उनके कद के अनुकूल हो. जैसा कि उनके करीबियों का मानना है—वे राजनीति के उस मोड़ पर हैं जहाँ नेता उस कमरे से भी बड़ा होने लगता है, जिसमें उसने कभी पहला कदम रखा था.

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