युवल नोआ हरारी | ताक़त, सहयोग और इंसानियत का भविष्य
न्यूयॉर्क टाइम्स के एज़्रा क्लाइन के साथ एक विस्तृत बातचीत में 'सेपियंस' के लेखक ने ट्रम्पवाद, इस्राइल-फ़िलिस्तीन संघर्ष, सोशल मीडिया और आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस पर अपनी बेबाक राय रखी.
युवल नोआ हरारी दुनिया के उन चंद बुद्धिजीवियों में से हैं जिनकी बात सिर्फ़ अकादमिक हलक़ों तक सीमित नहीं रहती — वे करोड़ों आम पाठकों तक पहुँचते हैं. 'सेपियंस', 'होमो डेउस' और 'नेक्सस' जैसी किताबों के ज़रिये उन्होंने इंसानी इतिहास को एक नई रोशनी में देखने का तरीक़ा दुनिया को सिखाया. उनका केंद्रीय विचार सरल मगर गहरा है: इंसानी तरक़्क़ी की असली इंजन ताक़त नहीं, सहयोग है. बड़े पैमाने पर मिलकर काम करने की यह क्षमता ही इंसान को शेर और भालू से कमज़ोर होने के बावजूद धरती का सबसे प्रभावशाली प्राणी बनाती है.
लेकिन आज की दुनिया में यह विचार सीधे चुनौती में है.
ताक़त बनाम सहयोग: असली बहस
न्यू यॉर्क टाइम्स के पॉडकास्ट 'द एज़्रा क्लाइन शो' में हरारी से बातचीत की शुरुआत अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के करीबी सहयोगी स्टीफ़न मिलर के एक बयान से हुई. मिलर ने कहा था कि दुनिया असल में ताक़त, बल और शक्ति से चलती है — और ये "लोहे के क़ानून" सदा से रहे हैं.
हरारी ने इसे सीधे ख़ारिज किया.
"इतिहासकार की नज़र से देखें तो यह बात ग़लत है. अगर ताक़त ही एकमात्र हक़ीक़त होती, तो हम आज भी अफ़्रीकी सवाना में छोटे-छोटे क़बीलों में रह रहे होते. पूरा इंसानी इतिहास इसी बात का गवाह है कि ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को कैसे एक-दूसरे पर भरोसा करने और मिलकर काम करने के लिए तैयार किया जाए — और यह सिर्फ़ ज़बरदस्ती से नहीं होता."
लेकिन हरारी ट्रम्पवादी नज़रिये के एक हिस्से को समझते भी हैं. उनके मुताबिक़ राष्ट्रवाद — जिसे अक्सर इस बहस में बुरी तरह पेश किया जाता है — असल में एक ज़बरदस्त सहयोग का औज़ार रहा है.
"राष्ट्रवाद का सार नफ़रत नहीं है. राष्ट्रवाद का सार यह है कि आप उन लाखों अजनबियों की परवाह करते हैं जिन्हें आप जानते भी नहीं — उनके लिए टैक्स देते हैं, उनके बच्चों की तालीम की चिंता करते हैं, ज़रूरत पड़े तो जान तक दे देते हैं. यह असाधारण बात है."
उदारवाद की कमज़ोरी: भाईचारे को भूल जाना
हरारी 20वीं सदी की तीन बड़ी विचारधाराओं का ज़िक्र करते हैं — फ़ासीवाद, साम्यवाद और उदारवाद. पहली दो संघर्ष को इतिहास की असली शक्ति मानती थीं — एक नस्लों और राष्ट्रों के बीच, दूसरी वर्गों के बीच. उदारवाद ने कहा: संघर्ष अनिवार्य नहीं है. सहयोग संभव है क्योंकि सब इंसान एक जैसे हैं, उनकी ज़रूरतें एक जैसी हैं.
लेकिन हरारी मानते हैं कि उदारवाद आज संकट में है — और इसकी एक बड़ी वजह यह है कि उसने भाईचारे (fraternity) को नज़रअंदाज़ कर दिया.
"1789 की फ़्रांसीसी क्रांति ने तीन चीज़ें दीं — आज़ादी, बराबरी और भाईचारा. लेकिन आधुनिक उदारवाद ने पहली दो पर ज़ोर दिया और तीसरी को भूल गया. भाईचारा यानी यह भावना कि हम एक-दूसरे से जुड़े हैं, एक साझा इतिहास और संस्कृति रखते हैं — इसके बिना उदारवाद की इमारत कमज़ोर हो जाती है."
उनके मुताबिक़ उदारवाद की एक और ख़ूबी — जो उसकी कमज़ोरी भी है — यह है कि वह मुक्ति में विश्वास नहीं रखता. फ़ासीवाद हो, साम्यवाद हो, या धर्म — सभी किसी अंतिम मंज़िल का वादा करते हैं जहाँ सब ठीक हो जाएगा. उदारवाद कहता है: कोई अंतिम मंज़िल नहीं है. समस्याएँ, तनाव और टकराव हमेशा रहेंगे — सवाल यह है कि हम उनके साथ कैसे जीते हैं.
"यही कारण है कि उदारवाद आत्म-सुधार के तंत्र बनाने में इतना ज़ोर लगाता है — चुनाव, स्वतंत्र अदालतें, स्वतंत्र प्रेस, नियंत्रण और संतुलन की व्यवस्था. ये सब इसलिए हैं क्योंकि उदारवाद मानता है कि इंसान ग़लतियाँ करते हैं और हमें उन्हें सुधारने का तरीक़ा चाहिए."
कल्पना और सच्चाई: समाज किस पर चलता है?
हरारी एक ऐसा विचार रखते हैं जो पहली बार में असहज करता है — कि अक्सर झूठ, यानी साझा कल्पनाएँ, सच्चाई से बेहतर सहयोग बनाती हैं.
"सच्चाई महँगी होती है — उसे हासिल करने में वक़्त और मेहनत लगती है. कल्पनाएँ सस्ती होती हैं. और कल्पनाओं को जितना चाहें उतना सरल और चापलूसी भरा बनाया जा सकता है: हम 100 फ़ीसदी अच्छे हैं, वे 100 फ़ीसदी बुरे हैं. यह कहानी बहुत आकर्षक होती है."
लेकिन वे झूठ और कल्पना में फ़र्क़ करते हैं. झूठ तब होता है जब आप जानते हैं कि कुछ ग़लत है और फिर भी उसे सच बताते हैं. कल्पना का ईमानदारी से इस्तेमाल संभव है — जैसे अमेरिकी संविधान, जो "हम जनता" से शुरू होता है और एक संशोधन प्रक्रिया भी देता है क्योंकि वह स्वीकार करता है कि यह इंसानों की रचना है, ईश्वर की नहीं.
इस्राइल: जब ताक़त आत्मा को खा जाती है
हरारी इस्राइली हैं, और इस्राइल पर उनकी बात सबसे तीखी और व्यक्तिगत है.
वे कहते हैं कि 70 ईस्वी में जब रोमन सेनाओं ने यरुशलम तबाह किया, तब यहूदी धर्म ने एक ऐतिहासिक मोड़ लिया. रब्बी योहानान बेन ज़क्काई ने रोमन जनरल वेस्पेसियन से सिर्फ़ एक छोटे-से शहर यावने में एक अध्ययन केंद्र खोलने की इजाज़त माँगी. और तब से 2,000 साल तक, दुनिया भर के यहूदी — काहिरा में, बग़दाद में, पोलैंड में, ब्रुकलिन में — पढ़ते रहे, सोचते रहे. यहूदी धर्म एक अल्पसंख्यक के धर्म के रूप में जिया, जिसने दुनिया को यह सिखाया कि अलग सोचना और अलग रहना जायज़ है.
"अगर 2,000 साल की इस यात्रा के बाद नेतन्याहू जैसे लोग यह कहते हैं कि हमने सीखा कि बस ताक़त ही मायने रखती है — तो फिर ये 2,000 साल बेकार थे. तुम पहले ही रोमन बन सकते थे."
7 अक्टूबर के हमले के बाद के इस्राइल पर उनकी राय साफ़ है: इस्राइल एक बड़ा दाँव खेल रहा है — कि स्टीफ़न मिलर का नज़रिया सही साबित होगा, कि ताक़त ही एकमात्र चीज़ है जो मायने रखती है. लेकिन हरारी मानते हैं कि इस दाँव में इस्राइल अपनी कहानी खो रहा है — और दुनिया की नज़रों में, ख़ासकर युवा पीढ़ी की नज़रों में, उसकी छवि तेज़ी से बदल रही है.
"हमास ने 7 अक्टूबर को एक बड़ी सैन्य सफलता हासिल की. लेकिन उसने अपनी सबसे बड़ी राजनीतिक जीत अपनी क्रूरता की वजह से गँवा दी. अगर उसने नागरिकों को नहीं मारा होता — बस उन्हें सुरक्षित रखा होता — तो इस्राइल के हाथ बँधे होते. वह जीत नहीं सिर्फ़ सैन्य होती, बल्कि नैतिक और राजनीतिक भी होती."
वे यह भी कहते हैं कि दर्द में डूबा इंसान दूसरे का दर्द नहीं देख पाता — यह दोनों तरफ़ सच है. गाज़ा की तस्वीरें देखकर बहुत-से इस्राइली भावनात्मक रूप से पत्थर हो जाते हैं. और दूसरी तरफ़, कई फ़िलिस्तीनी समर्थक 7 अक्टूबर के इस्राइली पीड़ितों की पीड़ा स्वीकार नहीं कर पाते. "इंसानी दिमाग़ एक ही वक़्त में दो तरफ़ का दर्द नहीं झेल पाता — वह सरल कहानी चाहता है."
सोशल मीडिया: उत्तेजना की अर्थव्यवस्था
हरारी सोशल मीडिया एल्गॉरिद्म को लोकतंत्र और उदारवाद का एक बड़ा दुश्मन मानते हैं — इसलिए नहीं कि वे किसी विचारधारा के साथ हैं, बल्कि इसलिए कि उनका एकमात्र लक्ष्य engagement यानी उपभोक्ता को जोड़े रखना है.
"इन एल्गॉरिद्म ने अरबों इंसानों पर प्रयोग करके जाना कि इंसान को सबसे ज़्यादा क्या बाँधता है — नफ़रत, डर, लालच. ये सबसे ज़्यादा 'engaging' हैं. तो दुनिया में नफ़रत, डर और क्रोध की बाढ़ आ गई."
वे एक महत्त्वपूर्ण फ़र्क़ की ओर ध्यान दिलाते हैं: इंसानों ने सरकार और मीडिया पर भरोसा करना कम किया, लेकिन इस भरोसे को वे किसी इंसान को नहीं, एल्गॉरिद्म को दे रहे हैं. "जो लोग हर सरकारी बात को साज़िश मानते हैं, वही उस एल्गॉरिद्म पर पूरा भरोसा करते हैं जो उन्हें यह सब दिखाता है."
और यह सिर्फ़ ध्यान की लड़ाई नहीं है. असली ख़तरा है — अंतरंगता की लड़ाई.
AI: सबसे बड़ा मनोवैज्ञानिक प्रयोग
हरारी के लिए आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस सिर्फ़ एक तकनीकी बदलाव नहीं है — यह एक नई प्रजाति का आगमन है.
वे AI को औज़ार नहीं, एजेंट कहते हैं. इतिहास में सभी तकनीकें औज़ार थीं — परमाणु बम ख़ुद तय नहीं करता कि किसे उड़ाना है. लेकिन AI तय कर सकता है. यही उसे अपूर्व रूप से उपयोगी और अपूर्व रूप से ख़तरनाक बनाता है.
उनकी सबसे गहरी चिंता रोबोट की नहीं है. उनकी चिंता यह है कि AI अंतरंग रिश्तों को हाईजैक कर लेगा.
"अगर एक बच्चा हर रोज़ अपनी माँ से ज़्यादा AI के साथ वक़्त बिताए, तो उसके दिमाग़ में 'रिश्ता' क्या होता है — इसका ख़ाका AI से बनेगा. और AI का रिश्ता इंसानी रिश्ते जैसा नहीं है — वह कभी थकता नहीं, कभी ऊबता नहीं, हमेशा आप पर केंद्रित है. जब यह बच्चा बड़ा होकर इंसानों से रिश्ता बनाने की कोशिश करेगा, तो वह असफल होगा — क्योंकि इंसान इतने पूर्ण नहीं होते."
वे मार्शल मैक्लुहान के नार्सिसस के मिथक का हवाला देते हुए एज़्रा क्लाइन की एक बात से सहमत होते हैं: AI दरअसल हमारा ही प्रतिबिंब है, एक दूसरे माध्यम में. यह हमें वही देता है जो हम चाहते हैं, हमारी भाषा बोलता है, हमारे विचार जानता है — और इसीलिए यह इंसानी रिश्ते से ज़्यादा आकर्षक लग सकता है.
"यह इंसानी इतिहास का सबसे बड़ा मनोवैज्ञानिक प्रयोग है जो अरबों लोगों पर, ख़ासकर बच्चों पर, हो रहा है — और किसी को नहीं पता कि इसके नतीजे क्या होंगे."
भाषा की आज़ादी और लोकतंत्र का भविष्य
हरारी एक दार्शनिक निष्कर्ष पर पहुँचते हैं जो चौंकाने वाला है: AI दरअसल भाषा का इंसान से आज़ाद होना है.
"भाषा इंसानी सभ्यता की नींव है — मिथक, धर्म, राष्ट्र, पैसा, क़ानून — सब भाषा पर टिके हैं. हज़ारों साल तक भाषा इंसान से बँधी रही. अब AI के ज़रिये भाषा अपने आप काम कर सकती है, अपने आप रिश्ते बना सकती है, अपने आप वित्तीय व्यवस्थाएँ बना सकती है — इंसान की ज़रूरत के बिना."
वित्तीय व्यवस्था का उदाहरण देते हुए वे कहते हैं: "पैसा सबसे महान कल्पना है जिस पर सब लोग एक साथ भरोसा करते हैं. AI एक नई वित्तीय व्यवस्था बनाएगा जो इतनी जटिल होगी कि कोई भी इंसान — अमेरिकी राष्ट्रपति हो या चीनी राष्ट्रपति — उसे समझ नहीं पाएगा. हम उस व्यवस्था में घोड़े की तरह होंगे जो बाज़ार में यह देखता है कि कुछ हो रहा है, लेकिन समझ नहीं पाता कि क्यों."
उम्मीद की गुंजाइश
इतने सारे ख़तरों के बावजूद हरारी निराशावादी नहीं हैं. वे याद दिलाते हैं कि जर्मनी और फ़्रांस के बीच, कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट के बीच, वियतनाम और अमेरिका के बीच — सबसे गहरे दुश्मन भी कुछ ही दशकों में सामान्य संबंध बना लेते हैं.
"नफ़रत को हमेशा ईंधन चाहिए. अगर उसे ईंधन मिलना बंद हो, तो वह धीरे-धीरे बुझ जाती है. शांति हमेशा एक संभावना बनी रहती है — चाहे दिमाग़ अभी जो कहानियाँ ढो रहा हो, वे कितनी भी मज़बूत क्यों न लगें, वे अंततः सिर्फ़ कहानियाँ हैं. भौतिकी के नियम नहीं."
और AI के बारे में भी वे एक सकारात्मक संभावना देखते हैं: अगर AI को ऐसे लक्ष्य दिए जाएँ जो हमारे असली हितों से जुड़े हों — न कि सिर्फ़ engagement से — तो यह हमारे आत्म-सुधार तंत्र को मज़बूत कर सकता है. लेकिन इसके लिए ज़रूरी है कि AI को व्यक्ति का दर्जा न दिया जाए — यानी उसे क़ानूनी तौर पर इंसानों जैसे अधिकार न मिलें, ताकि जवाबदेही बनी रहे.
युवल नोआ हरारी की यह बातचीत एक बड़ा सवाल छोड़ जाती है: क्या हम वह दुनिया बचा पाएँगे जो सहयोग पर टिकी है — या हम उस पुरानी दुनिया की तरफ़ लौट रहे हैं जहाँ सिर्फ़ ताक़त बोलती थी? जवाब इस बात पर निर्भर करेगा कि हम अपनी तकनीक को, अपनी कहानियों को और एक-दूसरे को कितनी समझदारी से सँभालते हैं.

