हिंदी पट्टी के राज्यों में सरकारी स्कूल शिक्षा का बुरा हाल; नई संसद और नया पीएम आवास बन सकता है तो स्कूल क्यों नहीं?

उत्तर और मध्य भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में सरकारी स्कूली शिक्षा गंभीर बुनियादी और ढांचागत चुनौतियों से जूझ रही है. चाहे वह प्रत्येक स्कूल में शिक्षकों की संख्या की बात हो या उस इमारत की स्थिति की जिसमें बच्चे पढ़ते हैं. चार प्रमुख राज्यों—बिहार, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश—के सरकारी स्कूल शिक्षा की ‘द हिंदू’ के रिपोर्टरों अमरनाथ तिवारी, आशना बुटानी, मयंक कुमार और मेहुल मालपानी ने पड़ताल की है.

10 अगस्त को, कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके ने एक वीडियो में कहा कि आजादी के बाद से कोई भी सरकार ग्रामीण क्षेत्रों के छात्रों को वैसी सुविधाएं नहीं दे पाई है जैसी शहरी क्षेत्रों के छात्रों को मिलती हैं. उन्होंने महाराष्ट्र के अपने गृह जिले हिंगोली के स्कूलों का निरीक्षण शुरू करने और स्थिति में सुधार के लिए सरपंचों से अनुरोध करने का संकल्प लिया.

उन्होंने सवाल उठाया, "हमने एक नई संसद और प्रधानमंत्री के लिए एक नया आवास बनाया है. फिर हम अपने गांवों में नए स्कूल क्यों नहीं बना पा रहे हैं? क्या हम किसानों और मजदूरों के बच्चों को अपने देश का भविष्य नहीं मानते?"

‘द हिंदू’ में चारों राज्यों में सरकारी स्कूलों की स्थिति का विस्तृत विवरण दिया गया है, जिसका सारांश कहता है कि कमोबेश हालात एक जैसे हैं.  

बिहार: जर्जर इमारतें और संसाधनों का अभाव

मुजफ्फरपुर (डुमरी केवट टोला): प्राथमिक विद्यालय की इमारत का प्लास्टर गिर रहा है. 119 छात्र दो जर्जर कमरों में बकरियों और शिक्षकों की मोटरसाइकिलों के बीच पढ़ने को मजबूर हैं. स्कूल में न तो चारदीवारी है, न शौचालय और न ही मध्याह्न भोजन रखने की जगह.

बुधनगरा जगन्नाथ मलिकाना टोला: 283 छात्रों और 10 शिक्षकों वाले इस मध्य विद्यालय में केवल दो कमरे हैं. कक्षा 8 के बच्चे बरामदे में और कक्षा 1 व 2 के बच्चे पेड़ के नीचे बैठते हैं. भोजन की गुणवत्ता बेहद खराब है.

वैशाली (मीरपुर पाठड़): प्राथमिक विद्यालय की अपनी कोई इमारत ही नहीं है. यह 2014 से एक सामुदायिक भवन के सिंगल रूम में चल रहा है, जहाँ 91 बच्चे अलमारियों और बर्तनों के बीच बैठते हैं. जगह कम पड़ने पर बच्चों को पास के बरगद के पेड़ के नीचे बैठाया जाता है.

राजस्थान: खतरनाक रास्ते और मूलभूत सुविधाओं की कमी

डीग जिला (उंचकी गाँव): स्कूल जाने के लिए कोई सार्वजनिक रास्ता नहीं है; बच्चों को कब्रिस्तान और दलदली कीचड़ भरे रास्ते से होकर जाना पड़ता है. शौचालय न होने के कारण बच्चे दोपहर में घर लौटने को मजबूर हैं.

अमरूका व बस बोलखेड़ा: बिजली न होने से बच्चे बाहर गलियारे में बैठते हैं. कई जगह दो कक्षाओं को एक साथ पढ़ाया जाता है. शिक्षकों की भारी कमी है और कई बार अस्थायी व्यवस्था से काम चलाया जाता है.

शिक्षकों व स्थानीय लोगों की व्यथा: अधिकारी बजट की कमी का हवाला देकर नए कमरों के निर्माण से मना कर देते हैं. निजी स्कूलों की फीस (₹18,000 वार्षिक) अत्यधिक होने के कारण गरीब परिवार बच्चों को खराब स्थिति वाले सरकारी स्कूलों में ही भेजने को मजबूर हैं.

उत्तर प्रदेश: स्वास्थ्य जोखिम और निजी स्कूलों की ओर पलायन

लखनऊ (ग्वारी): सरकारी स्कूलों के अस्वच्छ शौचालयों के कारण बच्चों के स्वास्थ्य पर गंभीर असर पड़ रहा है. एक कैब ड्राइवर की 11 साल की बेटी को स्कूल के गंदे शौचालय के उपयोग से 'यूरिनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन' (यूटीआई) हो गया.

पानी की समस्या: पीने का पानी अनियमित आता है और शौचालयों में पानी न होने के कारण बच्चों को आसपास के घरों से पानी लाना पड़ता है.

आर्थिक दबाव: खराब बुनियादी ढांचे से तंग आकर अभिभावक अपनी कम कमाई के बावजूद अतिरिक्त ₹1,000 प्रति माह का आर्थिक बोझ उठाकर बच्चों को निजी स्कूलों में भेजने पर विचार कर रहे हैं.

मध्य प्रदेश: उपेक्षित ढांचा और नीतियों का असंतुलन

सीहोर (हीरापुर गाँव): 22 छात्रों के लिए बने चार कमरों के इस स्कूल की इमारत अत्यंत जर्जर है. यहाँ छात्रों के लिए बेंच नहीं हैं और छत से पानी टपकता है. एक ही कार्यशील शौचालय होने से छात्र-छात्राओं दोनों को एक ही टॉयलेट इस्तेमाल करना पड़ता है. परिसर में शराबियों का जमावड़ा और आवारा पशु घूमते रहते हैं. स्व-सहायता समूह द्वारा भोजन बंद किए जाने पर शिक्षक खुद राशन खरीद रहे हैं.

भोपाल (सरवर गाँव): बारिश में छत टपकने से शॉट-सर्किट के डर से बिजली काट दी गई है. स्विच बोर्ड हटा दिए गए हैं, जिससे उमस और अंधेरे में पढ़ाई बाधित होती है. 5 साल से मरम्मत का बजट नहीं मिला है.

सरकारी नीतियों में विषमता: शिक्षा विभाग के अधिकारियों के अनुसार, सरकार का पूरा ध्यान केवल चुनिंदा मॉडल/उत्कृष्ट (एक्सीलेंस/सांदीपनि) स्कूलों पर है, जिससे सामान्य ग्रामीण स्कूल बुनियादी सुविधाओं के लिए भी तरस रहे हैं.

कुलमिलाकर हर जगह बुनियादी ढांचे का संकट है. चारदीवारी, चालू शौचालय, पीने के पानी, बिजली और पर्याप्त कक्षाओं की भारी कमी है. जर्जर छतों के गिरने की घटनाएं होती हैं, अस्वच्छ शौचालयों से बीमारियाँ होती हैं और असुरक्षित परिसर हैं. सरकारी बजट का बड़े मॉडल स्कूलों की तरफ केंद्रित होना भी बड़ा कारण है, इससे ग्रामीण व गरीब पृष्ठभूमि के बच्चों की शिक्षा प्रभावित हो रही है.

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