सैकड़ों करोड़ का चंदा, दफ्तरों पर ताले: ‘बीबीसी’ ने गुजरात की छह छोटे स्तर की राजनीतिक पार्टियों की पड़ताल की

गुजरात में पंजीकृत छह गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों ने वित्त वर्ष 2023-24 में चंदे से लगभग ₹1,700.78 करोड़ की कमाई की. यह भाजपा को छोड़कर अन्य पांच राष्ट्रीय दलों की कुल आय से कम से कम ₹200 करोड़ अधिक है, जबकि ये छह पार्टियां शायद ही कभी अपने उम्मीदवार मैदान में उतारती हैं.

‘बीबीसी हिंदी’ की एक जांच रिपोर्ट ने 'एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स' (एडीआर) द्वारा जताई गई शंकाओं की पुष्टि की है. एडीआर ने पिछले साल रिपोर्ट दी थी कि पूर्व वित्त वर्ष 2022-23 में ऐसी पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक पार्टियों की आय में 223 प्रतिशत का उछाल आया था.  18 जुलाई 2025 को प्रकाशित एडीआर की रिपोर्ट में कहा गया था कि इन गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों में से पांच गुजरात आधारित थे और 2019 से 2024 के बीच इनकी कुल आय ₹2,316 करोड़ थी.

इसके अलावा, देश में पंजीकृत लगभग 2,800 गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों में से 73 प्रतिशत ने अपने वित्तीय रिकॉर्ड प्रकाशित ही नहीं किए थे. भाजपा को छोड़कर पांच राष्ट्रीय दलों—कांग्रेस, माकपा (सीपीएम), आप, बसपा और नेशनल पीपुल्स पार्टी—की कुल आय 2023-24 में ₹1,480.43 करोड़ थी.

बीबीसी ने इनमें से चार पार्टियों का पता अहमदाबाद में लगाया, जबकि दो अन्य का मुख्यालय गुजरात के अन्य हिस्सों में है. शुभांगी मिश्रा की बीबीसी हिंदी रिपोर्ट में कहा गया है कि वह इन छह पार्टियों पर किसी वित्तीय गड़बड़ी का आरोप नहीं लगा रही है, लेकिन इस असामान्य स्थिति की ओर ध्यान आकर्षित कर रही है.

2023-24 में सबसे अधिक चंदा प्राप्त करने वाली पार्टी 'आम जनमत पार्टी' थी, जिसे ₹620 करोड़ मिले. यह पिछले वित्त वर्ष में मिले ₹216 करोड़ की तुलना में बड़ा उछाल था. इस पार्टी ने 2024 के लोकसभा चुनाव में केवल एक उम्मीदवार उतारा था. पार्टी की स्थापना 2020 में पटना में अनामिका पासवान को अध्यक्ष बनाकर की गई थी. पासवान वर्तमान में भाजपा की बिहार इकाई की उपाध्यक्ष हैं और खबरों के मुताबिक उन्होंने बीबीसी को बताया कि ‘आम जनमत पार्टी’ के अहमदाबाद स्थानांतरित होने के बाद उन्होंने इस्तीफा दे दिया था.

गुजरात के आनंद में स्थित ‘सत्यवादी रक्षक पार्टी’ को चंदे में ₹330.55 करोड़ मिले हैं और वह इस सूची में दूसरे स्थान पर है. पार्टी द्वारा निर्वाचन आयोग को सौंपी गई ऑडिट रिपोर्ट के अनुसार, उसने लोकसभा चुनाव प्रचार पर ₹8.48 करोड़ और सामाजिक कल्याण परियोजनाओं पर ₹316 करोड़ खर्च किए. सत्यवादी रक्षक पार्टी ने लोकसभा चुनाव में एक उम्मीदवार उतारा था.

अन्य चार पार्टियां हैं—स्वतंत्रता अभिव्यक्ति पार्टी (₹219.69 करोड़), न्यू इंडिया यूनाइटेड पार्टी (₹200.69 करोड़), भारतीय नेशनल जनता दल (₹191.61 करोड़) और गरीब कल्याण पार्टी (₹138 करोड़).

बीबीसी को इनमें से अधिकांश पार्टियों के दफ्तर बंद मिले और उनके पदाधिकारी या तो गायब थे या बोलने को तैयार नहीं थे. बीबीसी की जांच से पता चला कि इन पार्टियों ने मिलकर 2024 के लोकसभा चुनाव में केवल 15 उम्मीदवार उतारे थे. इसके विपरीत, भाजपा को छोड़कर पांचों राष्ट्रीय दलों ने 893 उम्मीदवार उतारे थे.

बीबीसी की जांच की पुष्टि एडीआर की उस रिपोर्ट से भी होती है जिसमें कहा गया था कि गुजरात की पांच पार्टियों (जिनमें से अधिकांश 2018 के बाद बनी थीं) ने 2019 से 2024 के बीच आयोजित दो लोकसभा चुनावों और एक विधानसभा चुनाव में कुल 17 उम्मीदवार उतारे थे.

एडीआर रिपोर्ट के अनुसार, उत्तर प्रदेश में सबसे अधिक 744 पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल हैं, इसके बाद दिल्ली में 240 और तमिलनाडु में 230 हैं.

अर्नब गांगुली की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में ऐसी सबसे प्रसिद्ध पार्टी 'नेशनल सिटीजन्स पार्टी ऑफ इंडिया' (एनसीपीआई) है, जिसके पास इस गर्मी में हुए बंगाल विधानसभा चुनावों के बाद तृणमूल कांग्रेस में हुई टूट के कारण लोकसभा में 20 सांसद हैं. हालांकि, बीबीसी की जांच में एनसीपीआई को शामिल नहीं किया गया था.

यहां यह उल्लेखनीय है कि सत्ता से बाहर हुई तृणमूल कांग्रेस के संसदीय और विधायी दोनों दलों में विभाजन हो गया है. 2024 में पार्टी द्वारा जीती गई 29 लोकसभा सीटों में से कुल 20 सांसदों ने इस गुमनाम संगठन एनसीपीआई में अपने विलय की घोषणा की और खुद को भाजपा के साथ जोड़ लिया.

तृणमूल के लोकसभा सांसद और अधिवक्ता कल्याण बंद्योपाध्याय ने सवाल उठाया कि ये पार्टियां अपना फंड कहां खर्च कर रही हैं.  बंद्योपाध्याय ने कहा, "उनके पास कोई सांसद या विधायक नहीं है, तो वे अपना पैसा कहां खर्च कर रहे हैं? इससे भी बड़ा सवाल यह है कि क्या ये पार्टियां दूसरों के लिए पर्दे के पीछे से काम कर रही हैं."

आरजेडी के राज्यसभा सांसद और राष्ट्रीय प्रवक्ता मनोज कुमार झा ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय को तुरंत हस्तक्षेप करना चाहिए. झा ने बताया, "इस मामले को आयकर विभाग, प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) और सीबीआई पर नहीं छोड़ा जा सकता. सुप्रीम कोर्ट को इस पर स्वतः संज्ञान लेना चाहिए और निर्देश देने चाहिए."

झा ने कहा, "एक पार्टी जो चुनाव नहीं लड़ती है, उसे चंदे में ₹620 करोड़ मिलते हैं. उनकी कमाई पंजीकृत राजनीतिक दलों की शुद्ध आय से अधिक है. यह हवाला लेनदेन को वैध बनाने का एक जरिया लगता है." उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी इस मुद्दे पर अदालत का रुख करने के बारे में चर्चा करेगी.

केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) ने पिछले साल दिसंबर में इस मुद्दे को उठाया था. 13 दिसंबर 2025 को जारी एक प्रेस विज्ञप्ति में सीबीडीटी ने कहा था कि पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों या धर्मार्थ संस्थानों को दिए गए दान के माध्यम से आयकर रिफंड के भारी फर्जी दावे किए गए थे.

सीबीडीटी की विज्ञप्ति में कहा गया, "प्रवर्तन कार्रवाई से एकत्र किए गए साक्ष्यों से संकेत मिलता है कि गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों या धर्मार्थ संस्थानों—जिनमें से कई रिटर्न दाखिल नहीं कर रहे थे, अपने पंजीकृत पतों पर चालू नहीं थे और किसी भी राजनीतिक गतिविधि में शामिल नहीं थे—का उपयोग फंड ट्रांसफर करने, हवाला लेनदेन, सीमा पार धन भेजने और दान के लिए फर्जी रसीदें जारी करने के माध्यम के रूप में किया जा रहा था."

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