श्रवण गर्ग | 20 जुलाई के बाद की घटनाएं बताती हैं कि देश में भरोसे का संकट गहराता जा रहा है 

हरकारा डीप डाइव के इस एपिसोड में निधीश त्यागी ने वरिष्ठ पत्रकार और अपने पुराने मित्र श्रवण गर्ग के साथ भारत की मौजूदा स्थिति पर चर्चा की. बातचीत का केंद्र 20 जुलाई के बाद सामने आईं वे घटनाएं रहीं, जिनमें सरकार के नियंत्रण, पुलिस की भूमिका, नागरिक अधिकारों और राजनीतिक जवाबदेही को लेकर सवाल उठे हैं.

श्रवण गर्ग के मुताबिक, इन घटनाओं को अब तक अलग-अलग तरीके से देखा जाता रहा है. किसी घटना को कानून-व्यवस्था का मामला माना गया, किसी को राजनीतिक विवाद और किसी को प्रशासनिक चूक. लेकिन जब इन्हें एक साथ रखकर देखा जाता है, तो पूरे सिस्टम में गहराते संकट का संकेत मिलता है. उनके अनुसार, 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद सरकार के रवैये में बदलाव दिखाई देता है. चुनाव परिणामों ने उस धारणा को चुनौती दी कि विपक्ष कमजोर हो चुका है और जनता पूरी तरह सरकार के साथ है. इसके बाद जनता की नाराजगी को समझने के बजाय विपक्षी दलों को कमजोर करने और विरोध की आवाजों पर कार्रवाई करने की कोशिशें बढ़ती दिखाई दीं.

चर्चा में स्वतंत्र भारद्वाज का मामला प्रमुखता से सामने आया. आरोप है कि उन्होंने एक नाबालिग दलित बच्ची के पिता पर हमला किया और सोशल मीडिया पर इस घटना को लेकर आपत्तिजनक दावे किए. उनके राजनीतिक नेताओं के साथ तस्वीरें साझा करने और सत्ता के करीब होने के प्रदर्शन पर भी सवाल उठे. इस मामले में कार्रवाई के लिए चंद्रशेखर आजाद समेत कई नेताओं को दबाव बनाना पड़ा. सवाल यह है कि क्या राजनीतिक संरक्षण का भरोसा किसी व्यक्ति को कानून से ऊपर होने का एहसास दे सकता है.

इसके अलावा, 4 पीएम चैनल से जुड़ी दो महिला पत्रकारों के साथ दिल्ली के साकेत इलाके में कथित दुर्व्यवहार और मारपीट का मामला भी चर्चा में आया. आरोप है कि पुलिस ने उनकी धार्मिक पहचान पूछने के बाद उनके साथ कार्रवाई की. श्रवण गर्ग ने इस घटना को 2023 में ट्रेन के भीतर आरपीएफ कांस्टेबल चेतन सिंह द्वारा यात्रियों की कथित तौर पर धर्म पूछकर हत्या किए जाने की घटना से जोड़कर देखा. उनका सवाल था कि धर्म के आधार पर हिंसा की मानसिकता जब किसी सरकारी संस्था में दिखाई देती है, तब उस पर समान गंभीरता से सवाल क्यों नहीं उठाए जाते.

जंतर-मंतर पर प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज मामलों और चेहरे की पहचान करने वाली निगरानी व्यवस्था को लेकर भी सवाल उठे. यदि पुलिस के अनुसार गंभीर अपराधों के आरोपी प्रदर्शन स्थल पर मौजूद थे, तो वे वहां पहुंचे कैसे? और यदि कुछ लोग जेल में बंद थे, तो उनकी मौजूदगी कैसे दर्ज हुई? इससे निगरानी तंत्र की विश्वसनीयता और पुलिस-जेल प्रशासन के बीच समन्वय पर सवाल खड़े होते हैं.

बातचीत में जीडीपी के आंकड़ों, हल्द्वानी में कथित शुद्धिकरण, एसआईआर के तहत मतदाता सूची से करोड़ों नाम हटाए जाने और विपक्षी दलों के खिलाफ केंद्रीय जांच एजेंसियों के इस्तेमाल पर भी चर्चा हुई. श्रवण गर्ग ने कहा कि जनता की नाराजगी को केवल विपक्ष की राजनीति कहकर खारिज नहीं किया जा सकता.

अंत में उन्होंने पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु का उदाहरण देते हुए कहा कि लंबे समय तक सत्ता में रहने वाली सरकारें जब जनता के समर्थन को स्थायी मान लेती हैं और संवाद के बजाय दमन का रास्ता चुनती हैं, तो राजनीतिक प्रतिक्रिया सामने आती है. इस चर्चा का मुख्य सवाल यही रहा कि क्या 20 जुलाई के बाद की घटनाएं अलग-अलग असंतोष नहीं, बल्कि व्यापक नागरिक आक्रोश का संकेत हैं. पूरी बातचीत यहां सुन सकते हैं.

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