रंजन सोलोमन | भागवत के विदेशों में दिए बयान और भारत में मुसलमानों की हकीकत

'काउंटरकरंट्स' में रंजन सोलोमन ने आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के हालिया विदेशी दौरों में दिए बयानों और भारत में मुसलमानों की वास्तविक स्थिति के बीच विरोधाभास को रेखांकित किया है. अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन में भागवत ने धार्मिक विविधता, सामाजिक सद्भाव और मुसलमानों के भारत में अधिकारों की बात की. न्यूयॉर्क में उन्होंने कहा कि जो हिंदू मानता है कि मुसलमानों के लिए भारत में कोई जगह नहीं है, वह हिंदू नहीं रह सकता. लंदन में उन्होंने आरएसएस की मूल भावना को "शुद्ध निस्वार्थ प्रेम" बताया और वसुधैव कुटुंबकम की बात की.

विदेशों में समावेश का संदेश, भारत में हिंसा का सवाल

इन बयानों की वास्तविक परीक्षा भारत में उनकी प्रतिध्वनि से होती है. इंडिया परसीक्यूशन ट्रैकर के अनुसार, 2026 के पहले सात महीनों में मुस्लिम विरोधी घृणा अपराधों में 44 मुसलमानों की मौत दर्ज की गई. इनमें 25 मौतों के लिए हिंदू चरमपंथी गैर-राज्य तत्वों और 19 के लिए राज्य तत्वों को जिम्मेदार बताया गया. यह सरकारी आंकड़ा नहीं है और इसे देशभर की कुल मौतों का अंतिम आंकड़ा नहीं माना जा सकता, लेकिन दर्ज और सत्यापित मामलों के आधार पर यह हिंसा की गंभीरता को सामने रखता है.

समस्या केवल अलग-अलग घटनाओं की नहीं है. भीड़ हिंसा, मुस्लिम परिवारों का विस्थापन, दुकानों पर हमले, धार्मिक पहचान के कारण मारपीट और राज्य की कठोर कार्रवाई जैसी घटनाएं मिलकर एक व्यापक राजनीतिक वातावरण की तस्वीर पेश करती हैं.

घृणा भाषण और राजनीतिक जिम्मेदारी

इंडिया हेट लैब ने 2025 में धार्मिक अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने वाले 1,318 प्रत्यक्ष घृणा भाषण कार्यक्रम दर्ज किए. इनमें 1,289 यानी करीब 98 प्रतिशत कार्यक्रम मुसलमानों को अकेले या ईसाइयों के साथ निशाना बना रहे थे. 308 भाषणों में हिंसा और 136 में हथियार उठाने का आह्वान दर्ज किया गया. आर्थिक और सामाजिक बहिष्कार तथा मस्जिदों को हटाने या नष्ट करने की मांग भी सामने आई.

संगठन के अनुसार, 88 प्रतिशत ऐसे कार्यक्रम भाजपा शासित राज्यों, भाजपा नेतृत्व वाली गठबंधन सरकारों या भाजपा प्रशासित केंद्रशासित प्रदेशों में हुए. ये आंकड़े यह साबित नहीं करते कि भाजपा ने हर भाषण का आदेश दिया या उसके सभी समर्थक ऐसी गतिविधियों में शामिल हैं. लेकिन वे राजनीतिक माहौल और संस्थागत प्रतिक्रिया को लेकर गंभीर सवाल जरूर उठाते हैं.

मुद्दा यह नहीं है कि हर हिंसा का आदेश आरएसएस नेतृत्व ने दिया. असली सवाल यह है कि किसी राजनीतिक विचारधारा से जुड़े वातावरण में बार-बार अल्पसंख्यक विरोधी भाषा सामने आने पर संगठन और राजनीतिक नेतृत्व क्या करते हैं. क्या ऐसी भाषा की स्पष्ट निंदा होती है या विवाद खत्म होने तक चुप्पी रहती है?

विस्थापन और भेदभाव की चिंता

ह्यूमन राइट्स वॉच और एमनेस्टी इंटरनेशनल की रिपोर्टों में भारत में मुसलमानों के खिलाफ भेदभाव, विस्थापन और उत्पीड़न को लेकर चिंता जताई गई है. असम में बंगाली भाषी मुस्लिम परिवारों के विस्थापन और बांग्लादेश भेजे गए लोगों के मामलों का भी उल्लेख हुआ है.

मेघालय में दो बंगाली मुस्लिम युवकों, खैरुल इस्लाम और अशरफुल इस्लाम की मौत तथा मुस्लिम घरों और कारोबारों पर हमलों ने भी धार्मिक और जातीय पहचान की संवेदनशीलता को सामने रखा. उत्तर प्रदेश में सड़क दुर्घटना के बाद कथित हमले में 27 वर्षीय मोहम्मद अजीम की मौत का मामला भी इसी व्यापक माहौल में सवाल खड़े करता है.

संवैधानिक समानता बनाम बहुसंख्यक स्वीकृति

भागवत के बयानों की सबसे महत्वपूर्ण परीक्षा यह है कि क्या उनका समावेशी संदेश भारत के भीतर राजनीतिक व्यवहार में दिखाई देता है. किसी मुस्लिम नागरिक को भारत में रहने और अपने अधिकार पाने के लिए बहुसंख्यक समुदाय की स्वीकृति की जरूरत नहीं होनी चाहिए. वह नागरिक है और उसके अधिकार संविधान से आते हैं.

यही संवैधानिक समानता और बहुसंख्यकवादी "उदारता" के बीच मूल अंतर है. वसुधैव कुटुंबकम की बात तभी सार्थक होगी जब मुस्लिम नागरिकों को अपनी पहचान, भाषा, खान-पान, धार्मिक आस्था या राजनीतिक विचारों के कारण असुरक्षित महसूस न करना पड़े.

असली परीक्षा भारत में होगी

आरएसएस प्रमुख का विदेशों में यह कहना कि मुसलमान भारत का हिस्सा हैं, महत्वपूर्ण है. लेकिन इसकी विश्वसनीयता इस बात से तय होगी कि भारत में घृणा भाषण, आर्थिक बहिष्कार, भीड़ हिंसा और मुस्लिम विरोधी लामबंदी के खिलाफ क्या ठोस कदम उठाए जाते हैं.

भाजपा केंद्र की सत्तारूढ़ राजनीतिक शक्ति है और कई राज्यों में भी सत्ता में है. इसलिए उसकी जिम्मेदारी केवल कानून-व्यवस्था पर बयान देने तक सीमित नहीं हो सकती. मुस्लिम विरोधी हिंसा के मामलों में तत्काल, स्पष्ट और निष्पक्ष राजनीतिक प्रतिक्रिया जरूरी है.

भारत को ऐसे संदेश की जरूरत नहीं है जिसे विदेशों में जाकर यह साबित करना पड़े कि मुसलमान यहां सुरक्षित हैं. जरूरत ऐसे राजनीतिक और सामाजिक वातावरण की है जिसमें हर नागरिक की सुरक्षा और समानता व्यवहार में सुनिश्चित हो. भागवत की नई समावेशी भाषा की असली परीक्षा विदेशों में मिलने वाली तालियों से नहीं, बल्कि भारत में मुसलमानों के अनुभव से होगी.

(रंजन सोलोमन राजनीतिक टिप्पणीकार, लेखक और शोधकर्ता हैं. यह उनके अंग्रेजी  लेख का हिंदी में अनूदित अंश है.)

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