राकेश कायस्थ | मैं 12 साल से कह रहा हूं, प्रधानमंत्री लाल किले से भारत के प्रधानमंत्री की तरह कब बोलेंगे?
15 अगस्त को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लाल किले से देश को संबोधित करेंगे. लेकिन इस बार सवाल सिर्फ यह नहीं है कि प्रधानमंत्री क्या बोलेंगे, बल्कि यह भी है कि किन मुद्दों पर चुप रहेंगे. हरकारा डीप डाइव में निधीश त्यागी ने लेखक और व्यंग्यकार राकेश कायस्थ के साथ इसी सवाल पर चर्चा की.
राकेश कायस्थ ने पिछले प्रधानमंत्रियों के स्वतंत्रता दिवस भाषणों को याद करते हुए कहा कि उनके भाषणों में देश के सामने मौजूद वास्तविक चुनौतियों और भविष्य की दिशा की स्पष्ट तस्वीर दिखाई देती थी. नरसिम्हा राव ने आर्थिक सुधारों की घोषणा की, देवेगौड़ा ने सामाजिक न्याय की बात की, गुजराल ने भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान का संकल्प लिया, अटल बिहारी वाजपेयी ने "जय जवान, जय किसान, जय विज्ञान" कहा और मनमोहन सिंह ने कहा, "हम वादे करने नहीं आए हैं वादे निभाने आए हैं."
इसके बरक्स राकेश कायस्थ का सवाल है कि नरेंद्र मोदी के 12 वर्षों के भाषणों से ऐसी कौन सी बात याद रह गई जो देश की दिशा तय करती हो. उनका कहना था, "मैं इस हेडलाइन का इंतजार कर रहा हूं कि भारत के प्रधानमंत्री लाल किले से भारत के प्रधानमंत्री की तरह कब बोलेंगे? यह इंतजार मैं 12 साल से कर रहा हूं."
इस बातचीत में शिक्षा, रोजगार, राष्ट्रीय एकता, सामाजिक सद्भाव और विदेश नीति को उन बड़े सवालों के तौर पर रखा गया, जिन पर प्रधानमंत्री से जवाब की उम्मीद की जाती है. कायस्थ के मुताबिक प्रधानमंत्री के भाषणों से प्रेम, करुणा, भाईचारा और सहिष्णुता जैसे शब्द लगभग गायब हैं. उनका आरोप है कि राष्ट्रीय एकता की जगह विभाजनकारी राजनीति को ज्यादा जगह मिली है.
शिक्षा और युवाओं के सवाल पर जंतर-मंतर के प्रदर्शन और पुलिस कार्रवाई का संदर्भ आया. रोजगार के पुराने वादों और शिक्षा व्यवस्था की स्थिति पर सवाल उठाते हुए कायस्थ ने कहा कि प्रधानमंत्री को देश के युवाओं के भविष्य पर बात करनी चाहिए, लेकिन पिछले 12 वर्षों के अनुभव से उन्हें इसकी उम्मीद नहीं है.
विदेश नीति पर अमेरिका और डोनाल्ड ट्रंप के साथ भारत के रिश्तों का सवाल भी अहम रहा. वहीं राम मंदिर से जुड़े आरोप, किसानों के सवाल, अल्पसंख्यकों की स्थिति और संसद में सरकार की जवाबदेही को लेकर भी प्रधानमंत्री से स्पष्ट जवाब की अपेक्षा रखी गई.
राकेश कायस्थ ने कहा, "बिना कारण के दहाड़ सकते हैं मोदी जी, उनको कोई कारण नहीं चाहिए होता दहाड़ने का." यानी इस बार भी भाषण में आक्रामक तेवर और राजनीतिक पलटवार की संभावना है, लेकिन असली सवाल यह होगा कि क्या उन मुद्दों पर जवाब मिलेगा जिनसे सरकार इस समय घिरी हुई है.
15 अगस्त का भाषण इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि प्रधानमंत्री को सिर्फ उपलब्धियां नहीं गिनानी हैं, बल्कि यह भी बताना है कि देश किस दिशा में जा रहा है. अगर रोजगार, शिक्षा, लोकतंत्र, सामाजिक एकता और विदेश नीति जैसे सवालों पर जवाब नहीं मिलता, तो सवाल यही रहेगा कि लाल किले से दिया गया भाषण देश की वास्तविक चिंताओं का जवाब था या एक बार फिर राजनीतिक दावों का झुनझुना. पूरी बातचीत यहां सुन सकते हैं. पूरी बातचीत यहां सुन सकते हैं.

