तेल पर फिसलना बंद करने का समय: नवीकरणीय ऊर्जा भारत को झटकों से बचा सकती है

‘बिजनेस स्टैंडर्ड’ के पूर्व संपादक टी.एन. नाइनन ने लिखा है कि संयुक्त राज्य अमेरिका और ईरान के बीच शुरुआती समझौते की घोषणा से भारत सहित पूरी दुनिया ने राहत की सांस ली है. उम्मीद है कि इससे युद्धविराम बढ़ेगा और जहाजों की आवाजाही के लिए होर्मुज जलडमरूमध्य फिर से खुल जाएगा. हालांकि, समझौते की राह में आगे भी अड़चनें आ सकती हैं, क्योंकि प्रारंभिक समझौते के बाद मुश्किल विवरणों वाले आगामी समझौतों की जरूरत होगी. इसलिए, तनाव कम होने के साथ-साथ लोग अब भी सतर्क हैं.

इस घोषणा से तेल, गैस और यूरिया जैसी महत्वपूर्ण वस्तुओं की कीमतें कम होनी चाहिए. भले ही पूरी तरह समझौता हो जाए, स्थिति को सामान्य होने में महीनों लगेंगे. फिर भी, वैश्विक अर्थव्यवस्था उस गंभीर मंदी से बच जाएगी जिसकी पिछले हफ्ते आशंका थी. तेल, गैस और खाड़ी देशों से आने वाली अन्य वस्तुओं के आयात पर भारी निर्भरता के कारण भारत को इससे बड़ी राहत मिलेगी.

भारत का इतिहास तेल की कीमतों के झटकों से जुड़े आर्थिक और राजनीतिक संकटों से भरा रहा है. अब तक तेल की कीमतों में हुई हर बड़ी बढ़ोतरी ने देश में राजनीतिक बदलाव को प्रेरित किया है: 1973 का पहला झटका: रातों-रात तेल की कीमतें $3 प्रति बैरल से बढ़कर $12 हो गईं। महंगाई 30 प्रतिशत तक पहुंच गई और विपक्ष ने इंदिरा गांधी को बैकफुट पर धकेल दिया, जिसके बाद देश को 'आपातकाल' का सामना करना पड़ा. 1979 का दूसरा झटका: तेल की कीमतें दोगुनी होकर $23.50 (हाजिर बाजार में $40) हो गईं. भारतीय अर्थव्यवस्था में 5 प्रतिशत की ऐतिहासिक गिरावट आई, सरकार गिर गई और श्रीमती गांधी दोबारा सत्ता में आईं. 1990 का तीसरा झटका: सद्दाम हुसैन के कुवैत आक्रमण के कारण पैदा हुआ यह संकट केवल छह महीने चला, लेकिन इसने विदेशी मुद्रा संकट खड़ा कर दिया. इसका सकारात्मक परिणाम यह हुआ कि नई सरकार को व्यापक आर्थिक सुधार (एलपीजी) लागू करने पड़े.

2012 का चौथा झटका: कीमतें $125 प्रति बैरल तक जा पहुंचीं. चालू खाता घाटा तेजी से बढ़ा और रुपया "फ्रेजाइल फाइव" की श्रेणी में आ गया. इसने मनमोहन सिंह सरकार को कमजोर किया और 2014 में नरेंद्र मोदी को सत्ता में लाने में भूमिका निभाई. हालांकि, 2015-16 में कीमतें गिरकर $44 होने से मोदी सरकार को शुरुआती वर्षों में 8 प्रतिशत से अधिक की विकास दर हासिल करने में मदद मिली.

इसी ऐतिहासिक संवेदनशीलता के कारण हालिया अमेरिका-ईरान तनाव से भारतीय नीति-निर्माता चिंतित थे. महंगाई, धीमी विकास दर और राजकोषीय घाटे का संकट अभी टला जरूर है, लेकिन यह भविष्य के लिए एक सबक है. अतीत में घरेलू तेल-गैस खोजने के प्रयास विफल रहे हैं; आज हमारी आयात निर्भरता तेल के लिए 90% और गैस के लिए 50% हो चुकी है.

अब इतिहास में पहली बार, सौर और पवन ऊर्जा एक व्यावहारिक समाधान बनकर उभरे हैं. ये न केवल प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं, बल्कि नए कोयला संयंत्रों की तुलना में काफी सस्ते और प्रतिस्पर्धी भी हैं. वर्तमान में बिजली उत्पादन में नवीकरणीय ऊर्जा की हिस्सेदारी एक-चौथाई है, जिसे 2030 तक 50 प्रतिशत करने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य है.

भारत को व्यापक स्तर पर एक 'इलेक्ट्रो-स्टेट' (विद्युत-राज्य) बनने का लक्ष्य रखना चाहिए. रेलवे का पूरी तरह विद्युतीकरण हो चुका है, लेकिन सड़क परिवहन और घरेलू रसोई (गैस के बजाय बिजली) के विद्युतीकरण की गति तेज करनी होगी. कई औद्योगिक प्रक्रियाओं को भी चीन की तरह बड़े पैमाने पर बिजली पर स्थानांतरित किया जा सकता है. इससे तेल-गैस पर निर्भरता इतनी कम हो जाएगी कि अर्थव्यवस्था पश्चिमी एशिया के झटकों से सुरक्षित हो सके. यह रणनीति सरकार के कोयला आधारित नए प्रयासों (जैसे कोयला गैसीकरण) से बेहतर है, क्योंकि कोयला संयंत्रों के लिए भारी मात्रा में पानी की आवश्यकता होती है, जबकि देश पहले से ही जल-तनाव से जूझ रहा है.

नवीकरणीय ऊर्जा का भारत के बाहरी व्यापार संतुलन पर गहरा प्रभाव पड़ेगा. वर्ष 2025-26 में माल के व्यापार में देश का घाटा जीडीपी का भारी-भरकम 8% था, जिसे सेवाओं के निर्यात (जीडीपी का 5%) ने संभाला. इस प्रकार जीडीपी का जो 3% संयुक्त व्यापार घाटा बचता है, वह पूरी तरह तेल और गैस के आयात के कारण है। यदि इस आयात में कटौती हो जाए, तो यह घाटा समाप्त हो जाएगा.

इससे भारत की विदेशी पूंजी पर निर्भरता कम होगी. पिछले 18 महीनों में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) ने भारतीय बाजार से $45 बिलियन निकाले हैं और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) भी घटा है, जिससे विदेशी मुद्रा भंडार $730 बिलियन के उच्चतम स्तर से गिरकर $688 बिलियन रह गया है. इस कमजोरी ने विदेशी निवेशकों के लिए भारत के आकर्षण को प्रभावित किया है. भारतीय अर्थव्यवस्था को 'हाइड्रोकार्बन-प्रूफ' बनाना देश को एक आकर्षक और मजबूत वैश्विक गंतव्य बनाने की दिशा में सबसे बड़ा कदम होगा.

(टी.एन. नाइनन के अंग्रेजी में प्रकाशित इस लंबे लेख के हिंदी में संपादित अंश यहां प्रस्तुत किए गए हैं) 

Previous
Previous

बलात्कारी राम रहीम को 16वीं बार पैरोल मिली, 30 दिनों के लिए आया जेल से बाहर

Next
Next

मोदी को एक सवाल और व्यंग्य ने क्यों असहज कर दिया