महिला मतदाता का बढ़ता असर: चुनावी राजनीति की धुरी बनीं महिलाएं, लेकिन आर्थिक बराबरी अब भी दूर

इस वर्ष हुए चार प्रमुख विधानसभा चुनावों केरल, तमिलनाडु, असम और पश्चिम बंगाल में महिलाओं ने पुरुषों की तुलना में अधिक मतदान किया. चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार केरल में महिलाओं का मतदान 80.86% रहा, जबकि पुरुषों का 75.01% था. असम में महिलाओं का मतदान 85.96% और पुरुषों का 84.80% दर्ज किया गया. तमिलनाडु में महिलाओं ने 85.76% मतदान किया, जबकि पुरुषों का प्रतिशत 83.57% रहा. पश्चिम बंगाल में महिलाओं की मतदान भागीदारी 93.24% रही, जबकि पुरुषों की 91.74% थी.

‘आर्टिकल 14’ के मुताबिक, ये आंकड़े ऐसे समय में सामने आए हैं, जब देशभर में राजनीतिक दल अपनी कल्याणकारी योजनाओं और चुनावी वादों का केंद्र महिलाओं को बना रहे हैं.

तमिलनाडु में मुख्यमंत्री विजय की तमिलगा वेत्री कझगम ने महिलाओं के लिए मासिक आर्थिक सहायता, मुफ्त सार्वजनिक परिवहन और विवाह सहायता जैसी योजनाओं का वादा किया है. पश्चिम बंगाल में कन्याश्री और लक्ष्मीर भंडार जैसी योजनाएं महिलाओं को आर्थिक सहायता उपलब्ध कराने की राज्य की प्रमुख योजनाएं बन चुकी हैं. असम की ओरुनोदोई योजना निम्न आय वर्ग की महिलाओं तक हर महीने आर्थिक सहायता पहुंचा रही है, जबकि केरल ने स्वास्थ्य, आजीविका और महिला सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में जेंडर बजटिंग का विस्तार किया है.

महिलाओं की बढ़ती चुनावी भागीदारी, उन पर केंद्रित सरकारी खर्च और राजनीतिक दलों की रणनीति इन तीनों का मेल यह संकेत देता है कि महिलाएं अब भारत की सबसे महत्वपूर्ण चुनावी ताकतों में शामिल हो चुकी हैं.

इसके बावजूद एक विरोधाभास भी मौजूद है. महिलाएं चुनावी राजनीति और कल्याणकारी योजनाओं के केंद्र में हैं, लेकिन श्रम बाजार, संपत्ति के स्वामित्व, औपचारिक रोजगार और निर्वाचित संस्थाओं में उनकी भागीदारी अब भी पुरुषों से काफी कम है.

एक नए चुनावी वर्ग के रूप में महिलाएं

पिछले एक दशक में भारतीय चुनावों में महिलाओं की भूमिका सबसे बड़े बदलावों में से एक रही है. पहले महिलाओं का मतदान प्रतिशत पुरुषों से कम होता था, लेकिन अब कई राज्यों में यह अंतर खत्म हो चुका है और महिलाएं अधिक संख्या में मतदान कर रही हैं.

केरल, तमिलनाडु, असम और पश्चिम बंगाल के हालिया आंकड़े इसी व्यापक राष्ट्रीय बदलाव का हिस्सा हैं. राजनीतिक दल और चुनावी रणनीतिकार अब महिलाओं के मतदान व्यवहार को चुनावी नतीजों का निर्णायक कारक मान रहे हैं.

इसी के साथ महिलाओं के लिए विशेष कल्याणकारी योजनाओं का भी तेजी से विस्तार हुआ है. महंगाई, खाद्य असुरक्षा और बिना वेतन वाले घरेलू कार्यों का बोझ सबसे अधिक महिलाओं पर पड़ता है. स्वास्थ्य, पोषण, बच्चों की देखभाल और घरेलू कल्याण से जुड़ी सरकारी सेवाओं पर भी उनकी निर्भरता अधिक रहती है. यही वजह है कि महिलाओं को लक्षित योजनाएं चुनावी रणनीति का अहम हिस्सा बन गई हैं.

केरल ने 2025-26 के जेंडर बजट में 4,840.12 करोड़ रुपये, यानी कुल योजनागत व्यय का 20.79%, महिलाओं से जुड़े कार्यक्रमों के लिए आवंटित किए हैं. तमिलनाडु ने आर्थिक सहायता, मुफ्त परिवहन और रोजगार से जुड़े वादों पर जोर दिया है. असम ने ओरुनोदोई योजना के तहत प्रत्यक्ष नकद हस्तांतरण का दायरा बढ़ाया है, जबकि पश्चिम बंगाल ने कन्याश्री और आनंदधारा जैसी योजनाओं के माध्यम से एक करोड़ से अधिक परिवारों तक अपनी पहुंच बनाई है.

कल्याणकारी योजनाओं की सीमाएं

महिलाओं का राजनीतिक महत्व बढ़ने के बावजूद उनकी आर्थिक भागीदारी उसी गति से नहीं बढ़ी है.

गोल्डमैन सैक्स इंडिया के 2025 के आंकड़ों के अनुसार भारत में महिला श्रम बल भागीदारी लगभग 30% है, जबकि चीन में यह करीब 60% और अमेरिका, जापान तथा यूरोपीय संघ में 50% से अधिक है. भारत में पुरुषों की श्रम भागीदारी लगभग 77% बनी हुई है.

इस अंतर की बड़ी वजह घरेलू कामों का असमान बंटवारा है. भारतीय महिलाएं प्रतिदिन लगभग 280 मिनट घरेलू और देखभाल संबंधी कार्यों में लगाती हैं, जबकि पुरुष केवल लगभग 35 मिनट. विश्व बैंक के अनुसार 2025 में भारत की महिला श्रम बल भागीदारी 32.4% और पुरुषों की 77.6% थी.

हालांकि भारत के आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (PLFS) के अनुसार 2023-24 में महिला श्रम भागीदारी 41.7% तक पहुंची, लेकिन इसका बड़ा हिस्सा असंगठित और असुरक्षित रोजगार में है. करीब 78.2% कामकाजी महिलाएं बिना औपचारिक अनुबंध या सामाजिक सुरक्षा के कार्य करती हैं, जबकि लगभग 60% महिलाएं कृषि और कम उत्पादकता वाले क्षेत्रों में कार्यरत हैं.

बैंक खाते और संपत्ति पर स्वामित्व

भारत में वित्तीय समावेशन तेजी से बढ़ा है. लगभग 89.2% महिलाओं के पास अब बैंक खाता है और जन धन-आधार-मोबाइल (JAM) व्यवस्था के माध्यम से सरकारी सहायता सीधे उनके खातों में पहुंच रही है.

लेकिन वित्तीय पहुंच का मतलब आर्थिक स्वामित्व नहीं है. विश्व बैंक के अनुसार 2021 में 76.4% पुरुषों के पास व्यक्तिगत या संयुक्त रूप से आवास का स्वामित्व था, जबकि महिलाओं के लिए यह आंकड़ा केवल 46.5% था.

भूमि, मकान और व्यवसाय जैसी उत्पादक संपत्तियों पर महिलाओं की हिस्सेदारी अब भी कम है. नीति आयोग का अनुमान है कि यदि वित्त, ऋण और बाजार तक पहुंच की बाधाएं दूर हों, तो महिला उद्यमी 15 से 17 करोड़ तक रोजगार के अवसर पैदा कर सकती हैं. इसके बावजूद लगभग एक-तिहाई महिला-नेतृत्व वाले उद्यम आज भी ऋण प्राप्त करने की बुनियादी शर्तें पूरी नहीं कर पाते.

सामाजिक प्रगति, लेकिन आर्थिक असमानता बरकरार

महिलाओं के लिए चलाई गई योजनाओं के साथ सामाजिक संकेतकों में उल्लेखनीय सुधार हुआ है. वर्ष 2000 में प्रति एक लाख जीवित जन्मों पर मातृ मृत्यु दर 658 थी, जो 2023 तक घटकर 80 रह गई. लड़कियों की शिक्षा में सुधार हुआ है और निम्न माध्यमिक शिक्षा पूरी करने की दर 88.3% तक पहुंच गई है. परिवार के भीतर निर्णय लेने में महिलाओं की भागीदारी भी बढ़ी है.

इसके बावजूद आर्थिक तस्वीर पूरी तरह नहीं बदली है. महिलाएं अब भी असंगठित रोजगार में अधिक हैं, घरेलू कामों का अधिकांश बोझ उठाती हैं और संपत्ति के स्वामित्व तथा राजनीतिक प्रतिनिधित्व में पीछे हैं. देश में महिला मतदाता लगातार निर्णायक भूमिका निभा रही हैं, लेकिन संसद में उनकी हिस्सेदारी अभी भी केवल 13.7% है.

अगला चरण

महिलाओं के लिए बढ़ती कल्याणकारी योजनाओं ने भारत की चुनावी राजनीति और सार्वजनिक नीति दोनों की दिशा बदल दी है. अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या यह बदलाव केवल कल्याणकारी योजनाओं तक सीमित रहेगा या महिलाओं के लिए व्यापक आर्थिक अवसर भी पैदा करेगा.

इसके लिए बाल देखभाल, सुरक्षित परिवहन, कौशल विकास, उद्यमिता, वित्तीय सहायता और औपचारिक रोजगार जैसे क्षेत्रों में निवेश बढ़ाने की जरूरत होगी. महिलाएं आज चुनावी सफलता की सबसे महत्वपूर्ण आधारशिला बन चुकी हैं. अब सरकारों की असली परीक्षा यह होगी कि क्या वे महिलाओं की इस चुनावी ताकत को आर्थिक सशक्तिकरण में बदल पाती हैं. आने वाले वर्षों में यही तय करेगा कि भारत में महिलाओं का उभार केवल मतदान और कल्याणकारी राजनीति की कहानी रहेगा या आर्थिक भागीदारी और वास्तविक सशक्तिकरण की भी.

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